Wednesday, May 18, 2011

कट्टरता की अंधी गली


पाकिस्तान में बढ़ती इस्लामिक कट्टरता पर लेखक की टिप्पणी

पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून का विरोध करने के लिए उदारवादी राजनेताओं सलमान तसीर और शहबाज भट्टी की हत्या ने पाकिस्तानी समाज पर इस्लामी कट्टरपंथियों के बढ़ते प्रभाव को उजागर कर दिया है। परमाणु हथियारों से संपन्न इस देश की सोच जैसे-जैसे उग्रवादी होती जा रही है, वैसे-वैसे कमजोर नागरिक सरकार के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। कट्टरपंथी मौलवियों के गुस्से का निशाना अब सत्ताधारी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की शैरी रहमान बन रही हैं, जिन्होंने हजरत मोहम्मद का अनादर करने की आरोपी एक पाकिस्तानी ईसाई महिला को मौत की सजा दिए जाने के बाद ईशनिंदा कानून में सुधार की मांग की है। दुख की बात यह है कि हजरत मोहम्मद या इस्लाम को बदनाम करने को अपराध घोषित करने वाले इस कानून का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के दमन के लिए किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के दमन के साथ-साथ पाकिस्तान में शिया-सुन्नी हिंसक संघर्ष भी आम हो गया है। पाकिस्तान की करीब 75 प्रतिशत आबादी वाले सुन्नियों और 20 प्रतिशत शियाओं में अकसर टकराव होते रहे हैं। इन झड़पों के लिए मुख्य रूप से सुन्नी उग्रवादी संगठन सिपह-ए-साहबा और सऊदी अरब के समर्थन वाला अलकायदा व ईरान-समर्थित शिया उग्रवादी संगठन तहरीक-ए-जफरिया जिम्मेदार हैं। संयोग से पाकिस्तान एक ऐसा सुन्नी बाहुल्य देश है, जहां अधिकतर उच्च सरकारी पदों पर शिया बैठे हुए हैं। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना शिया मुसलमान थे। इसी प्रकार भुट्टो परिवार, आसिफ अली जरदारी, सैयदा आबिदा हुसैन, इसकदर मिर्जा जैसे शीर्ष राजनेता और जनरल भी शिया हैं। मुहम्मद जिया-उल-हक के शासन काल में पाकिस्तान में, खास तौर से कराची और दक्षिण पंजाब में फिरकापरस्ती ने हिंसक रूप ले लिया था। तभी पाकिस्तानी न्याय प्रणाली का भी इस्लामीकरण शुरू हुआ। 1980 के दशक में पाकिस्तान को सऊदी अरब से भारी मदद मिली और जिया ने शियाओं के प्रति सहनशील स्थानीय सुन्नीवाद की बजाय असहिष्णु सऊदी सुन्नीवाद यानी वहाबवाद की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। गिलगित और स्कार्दू के आस-पास के इलाकों में पुरानी दुश्मनियां फिरकापरस्ती में बदल गईं और ईरानी अ‌र्द्धसैनिक बलों का प्रभाव फैलने लगा। तबसे ही इन दोनों समुदायों के बीच की दरार गहरी होती जा रही है। अमेरिका पर 11 सितंबर के हमले और अफगानिस्तान से तालिबान के खदेड़े जाने के बाद से हिंसा और बढ़ गई है। अनुमान है कि पिछले दो दशकों में पाकिस्तान में गुटीय हिंसा में करीब 4,000 लोग मारे गए हैं। लेकिन क्या इन हालात के लिए राजनेता ही मुख्य तौर पर जिम्मेदार हैं? प्रसिद्घ राजनीतिक विश्लेषक अहमद राशिद इन हालात के लिए सेना को जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं कि सेना के हस्तक्षेप के कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र पूरी तरह जम नहीं पाया है। 1947 में आजादी के बाद से किसी भी नागरिक सरकार को अपना कार्यकाल पूरा ही नहीं करने दिया गया। पाकिस्तान में निर्वाचित प्रतिनिधियों को भारत और अफगानिस्तान के बारे में पाकिस्तान की नीति, परमाणु हथियार कार्यक्रम, रक्षा खर्च, खुफिया व्यवस्था और ऐसे ही अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में निरंतर दबावों का सामना करना पड़ा है। अहमद राशिद के अनुसार, 1947 के बाद से पाकिस्तान की नियति का संचालन करने वाले सैन्य-नौकरशाह अभिजात्य वर्ग को ही पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के स्वरूप के निर्धारण और उनके समाधानों के अधिकार थे, सरकारों, संसद, नागरिक संगठनों या फिर बुद्धिजीवी तबके को नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं  )

Sunday, May 1, 2011

बुर्का का सवाल


भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मेरे कई मुसलमान दोस्तों में से एक भी ऐसा नहीं है जिनके घर में महिलाएं मुंह ढंकने के लिए बुर्का पहनती हों। अब पाकिस्तान के मेरे मिलने वाले बताते हैं कि दस साल पहले की बजाय आज बुर्का पहने औरतें ज्यादा तादाद में दिखाई देती हैं। यह ज्यादातर धार्मिक कट्टरता के उभरने और तालिबान के बढ़ते असर की वजह से है। मेरे लिए यह आघात जैसा है, क्योंकि मैं औरतों के बुर्का पहनने की जहालत समझता हूं। इससे मुसलमान औरतें नौकरी या कामधंधा करने से वंचित रह जाती हैं और अपने ही घर में कैद हो जाती हैं। बुर्का पहनने वाली औरतों के एक उल्लेखनीय चैंपियन डॉ. जाकिर नायक हैं। बुर्का पहनने के उनके तर्क पर मुझे हंसी आती है। उनका कहना है कि मान लो तीन औरतें चहलकदमी कर रही हैं। दो ने बुर्का पहना है और एक ने नहीं। अगर वह सड़कछाप मजनुओं के गैंग के सामने से गुजरती हैं तो वह किसके साथ छेड़खानी करेंगे? जाहिर है जिसने बुर्का नहीं पहना है उससे, क्योंकि वह उसका चेहरा देख सकते हैं बाकी दो का नहीं। इस तरह बुर्के से सुरक्षा मिलती है। अगर आप मामले पर जरा गंभीरता से गौर करें तो आप पाएंगे कि बुर्के ज्यादातर निम्न मध्यम वर्ग की औरतें पहनती हैं। उच्च वर्ग की महिलाएं शिक्षित और पश्चिमी शैली में रहती हैं। सबसे निचला वर्ग खासतौर से जो खेतीबाड़ी में लगा है वह अपने मर्दो के साथ रहती हैं और बुर्का नहीं पहनतीं। केवल निम्न वर्ग की औरतें अपने आप को बुर्के से आजाद नहीं करना चाहती, क्योंकि वह ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं। मुझे उम्मीद थी कि दार-उल-उलूम हिजाब खत्म करने के पक्ष में फतवा जारी करेगा, लेकिन शायद ही संभव हो सके। मुझे यह भी उम्मीद थी कि कैरो में अल अजहर फ्रेंच सरकार के समर्थन में कुछ कहेंगे। जिसने बुर्का पहनने को दंडनीय अपराध करार दिया है। फ्रांस में किसी भी दूसरे यूरोपियन देश से ज्यादा मुसलमान रहते हैं। उनमें से ज्यादातर पुरानी कालोनियां हैं। हिजाब अपराध नहीं है, लेकिन उससे चिढ़ होती है। इस चिढ़ को हटाने के लिए दूसरे तरीके खोजने चाहिए। मुझे तुर्की के अतातुर्क कमाल पाशा की याद आती है जिसने एक ही झटके में ऐसी संस्थाओं को खत्म कर दिया था जो वक्त के साथ नहीं चल रही थीं। उन्होंने खलीफागिरी को समाप्त किया और भारत के खिलाफत आंदोलन की हवा निकाल दी। गांधी ने भारतीय मुसलमानों का समर्थन हासिल करने की उम्मीद में खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया था और इसमें वह असफल रहे। कमाल पाशा ने बुर्का पहनने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। यही वजह है कि तुर्की आज दुनिया का सबसे आधुनिक मुस्लिम देश है। हमें एक और कमाल पाशा चाहिए। हवा खारिज करना : सबके बीच जोर से हवा खारिज करने को ठीक ही गलत समझा जाता है और इसे अशिष्टता माना जाता है। बुरी बात यह है कि वह खराब आदत केवल मर्दो में पाई जाती है। मुझे एक भी ऐसी महिला नहीं मिली जो सबके सामने हवा खारिज करती हो। मेरा सबसे ज्यादा यादगार अनुभव 50 साल पहले हुआ जब मैं काबुल में एक काम के सिलसिले में गया था। मेरे साथ एक सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर थे। शहर में केवल एक ही होटल मिला और हम दोनों को एक कमरे में रहना पड़ा। यह शर्मा बंधु पक्के शाकाहारी थे और दाल या सब्जी के सथ पुलाव तक नहीं खाते थे, लेकिन दूसरी रात को शर्मा का पेट गुब्बारे की तरह फूल गया। मैंने जैसे ही बत्ती बुझाई उन्होंने बम फोड़ने शुरू कर दिए। मैंने कहा भगवान के लिए यह बंद करो, लेकिन इसकी बजाय उसने मुझे लंबा भाषण दे दिया (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)