पाकिस्तान में बढ़ती इस्लामिक कट्टरता पर लेखक की टिप्पणी
पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून का विरोध करने के लिए उदारवादी राजनेताओं सलमान तसीर और शहबाज भट्टी की हत्या ने पाकिस्तानी समाज पर इस्लामी कट्टरपंथियों के बढ़ते प्रभाव को उजागर कर दिया है। परमाणु हथियारों से संपन्न इस देश की सोच जैसे-जैसे उग्रवादी होती जा रही है, वैसे-वैसे कमजोर नागरिक सरकार के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। कट्टरपंथी मौलवियों के गुस्से का निशाना अब सत्ताधारी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की शैरी रहमान बन रही हैं, जिन्होंने हजरत मोहम्मद का अनादर करने की आरोपी एक पाकिस्तानी ईसाई महिला को मौत की सजा दिए जाने के बाद ईशनिंदा कानून में सुधार की मांग की है। दुख की बात यह है कि हजरत मोहम्मद या इस्लाम को बदनाम करने को अपराध घोषित करने वाले इस कानून का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के दमन के लिए किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के दमन के साथ-साथ पाकिस्तान में शिया-सुन्नी हिंसक संघर्ष भी आम हो गया है। पाकिस्तान की करीब 75 प्रतिशत आबादी वाले सुन्नियों और 20 प्रतिशत शियाओं में अकसर टकराव होते रहे हैं। इन झड़पों के लिए मुख्य रूप से सुन्नी उग्रवादी संगठन सिपह-ए-साहबा और सऊदी अरब के समर्थन वाला अलकायदा व ईरान-समर्थित शिया उग्रवादी संगठन तहरीक-ए-जफरिया जिम्मेदार हैं। संयोग से पाकिस्तान एक ऐसा सुन्नी बाहुल्य देश है, जहां अधिकतर उच्च सरकारी पदों पर शिया बैठे हुए हैं। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना शिया मुसलमान थे। इसी प्रकार भुट्टो परिवार, आसिफ अली जरदारी, सैयदा आबिदा हुसैन, इसकदर मिर्जा जैसे शीर्ष राजनेता और जनरल भी शिया हैं। मुहम्मद जिया-उल-हक के शासन काल में पाकिस्तान में, खास तौर से कराची और दक्षिण पंजाब में फिरकापरस्ती ने हिंसक रूप ले लिया था। तभी पाकिस्तानी न्याय प्रणाली का भी इस्लामीकरण शुरू हुआ। 1980 के दशक में पाकिस्तान को सऊदी अरब से भारी मदद मिली और जिया ने शियाओं के प्रति सहनशील स्थानीय सुन्नीवाद की बजाय असहिष्णु सऊदी सुन्नीवाद यानी वहाबवाद की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। गिलगित और स्कार्दू के आस-पास के इलाकों में पुरानी दुश्मनियां फिरकापरस्ती में बदल गईं और ईरानी अर्द्धसैनिक बलों का प्रभाव फैलने लगा। तबसे ही इन दोनों समुदायों के बीच की दरार गहरी होती जा रही है। अमेरिका पर 11 सितंबर के हमले और अफगानिस्तान से तालिबान के खदेड़े जाने के बाद से हिंसा और बढ़ गई है। अनुमान है कि पिछले दो दशकों में पाकिस्तान में गुटीय हिंसा में करीब 4,000 लोग मारे गए हैं। लेकिन क्या इन हालात के लिए राजनेता ही मुख्य तौर पर जिम्मेदार हैं? प्रसिद्घ राजनीतिक विश्लेषक अहमद राशिद इन हालात के लिए सेना को जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं कि सेना के हस्तक्षेप के कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र पूरी तरह जम नहीं पाया है। 1947 में आजादी के बाद से किसी भी नागरिक सरकार को अपना कार्यकाल पूरा ही नहीं करने दिया गया। पाकिस्तान में निर्वाचित प्रतिनिधियों को भारत और अफगानिस्तान के बारे में पाकिस्तान की नीति, परमाणु हथियार कार्यक्रम, रक्षा खर्च, खुफिया व्यवस्था और ऐसे ही अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में निरंतर दबावों का सामना करना पड़ा है। अहमद राशिद के अनुसार, 1947 के बाद से पाकिस्तान की नियति का संचालन करने वाले सैन्य-नौकरशाह अभिजात्य वर्ग को ही पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के स्वरूप के निर्धारण और उनके समाधानों के अधिकार थे, सरकारों, संसद, नागरिक संगठनों या फिर बुद्धिजीवी तबके को नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं )