मदरसों को शिक्षा के अधिकार (आरटीइ) कानून के तहत लाए जाने को लेकर परस्पर विरोधाभासी बयानों से खफा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र सरकार को रमजान के बाद आंदोलन की धमकी दी है। पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी ने सोमवार को कहा कि एक ओर केंद्र कह रहा है कि मदरसा और अन्य धार्मिक संगठनों को आरटीइ एक्ट से के दायरे से बाहर रहेंगे, लेकिन कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि मदरसे स्कूल के दायरे में ही आएंगे यानी उन पर यह अधिनियम लागू होगा। जिलानी ने कहा कि मदरसों को नोटिस देकर कहा गया है कि वे छह कमरों, खेल के मैदान, लाइब्रेरी जैसे मानक पूरे करें। तीन साल के भीतर ऐसा न करने पर मदरसों या अन्य पर जुर्माना या उन्हें बंद करने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि बोर्ड की अक्टूबर या नवंबर में होने वाली बैठक में आगे की रणनीति तय की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि आरटीई एक्ट की धारा 8 और 9 पाठ्यक्रम में बदलाव का अधिकार भी मदरसों से छीनकर केंद्र या स्थानीय संस्थाओं को देने की बात कही गई है। जिलानी ने आरोप लगाया कि मदरसों की प्रबंधन कमेटी में अल्पसंख्यक समुदाय के एक सदस्य को नियुक्त करने का अधिकार भी उनसे छीन लिया गया है।
Wednesday, August 17, 2011
सात साल में पहली बार वेतन संकट में एनसीएमईआइ
नई दिल्ली अल्पसंख्यकों की तालीम और तरक्की के सरकारी दावे अपनी जगह हैं, लेकिन देश में शैक्षणिक संस्थानों का अल्पसंख्यक दर्जा तय करने वाले आयोग के सामने खुद सरकार ने ही नया संकट खड़ा कर दिया है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (एनसीएमइआइ) के गठन के बाद सात साल में पहला मौका है, जब उसके कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं मिल पा रही है। सरकार ने आयोग को हर तिमाही मिलने वाला अनुदान रोक दिया है। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आयोग का जुलाई से सितंबर का अनुदान अब तक नहीं दिया है। नतीजा यह है कि आयोग के लगभग ढाई दर्जन कर्मचारियों को अगस्त में मिलने वाली तनख्वाह नहीं मिल सकी है। यह स्थिति तब है, जब आयोग ने अनुदान की धनराशि न मिलने की स्थिति में अगस्त का वेतन न बंट पाने की बाबत मंत्रालय को जुलाई में ही आगाह कर दिया था। अल्पसंख्यक संस्थानों से जुड़े मामलों के विवादों को निपटाने वाले इस आयोग को मंत्रालय सालाना 2.44 करोड़ का अनुदान देता है। जुलाई से सितंबर की तिमाही के लिए उसे 80 लाख रुपये अनुदान की दरकार है। जानकार सूत्र बताते हैं कि आयोग की इस अनदेखी के पीछे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास कोई ठोस वजह नहीं है। आयोग के लिए रजिस्ट्रार का एक पद स्वीकृत है। वह पद खाली पड़ा है। आयोग स्वायत्तशासी है, लिहाजा उसने तात्कालिक जरूरतों के मद्देनजर एक सलाहकार की नियुक्ति जरूर कर रखी है। मंत्रालय को शायद वह नियुक्ति नहीं पच रही है। इस बारे में आयोग के चेयरमैन जस्टिस एमएसए सिद्दीकी का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हो सके। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग के सालाना खर्चे का आडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) करता है। उसकी रिपोर्ट संसद में पेश होती है। उस स्तर पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई है। गौरतलब है कि आयोग ने इसी साल जामिया विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक होने का फैसला सुनाया है। जबकि बीते महीने ही उसने दिल्ली में सिख समुदाय से संचालित चार कॉलेजों के भी अल्पसंख्यक दर्जे के होने का फैसला दिया है।
Friday, August 12, 2011
IUML accused of riots THIRUVANANTHAPURAM DC CORRESPONDENT
The United Democratic Front government's decision to wind up the M.A. Nissar commission probing the Kasargod firing incident has generated further controversy with two police officers deposing before the panel that the Indian Union Muslim League activists had conspired to set off communal riots in the entire Malabar region.
The police officers including the then Kasargod SP, Mr Ramdass Pothen, to the commission, alleged that Muslim League had hatched the conspiracy in connivance with certain extremist elements.
The cops justified the firing saying that the action was initiated to prevent a communal flare up in the region. With the statements of police now becoming public, the UDF government decision to wind up the Nissar commission has raised doubts. It has also added strength to the allegations that the commission had been wound up in the wake of damning revelations against the Muslim League. Stung by the allegations, the Muslim League leadership closed ranks. “We could not have allowed a person who contested as a CPI(M) candidate in a local bodies poll, to continue as the commission,“ said the industry minister, Mr P.K.
Kunhalikutty. “The decision to constitute the commission was itself politically motivated.“
The IUML general secretary, Mr E T Mohammad Basheer, said these were statements of the accused.
“Don't make it weapon for propaganda,“ he said, justifiying the winding up of the commission saying that it had a clear political objective.
Meanwhile, Justice Nissar said in Kozhikode that he had not received any official communication from the government regarding the winding up of the Commission.
He said the commission had only recorded the statements of the police including the then Kasargod SP Ramdass Pothen. The statements of the political leaders had not been recorded yet, he said adding that he had not acted with political bias.
Thursday, August 4, 2011
Wednesday, August 3, 2011
Monday, August 1, 2011
बंगाल में बढ़ेगा मुस्लिम कोटा
कोलकाता मां-माटी-मानुष के नारे के बल पर पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई ममता बनर्जी अब खुद को अल्पसंख्यकों का हमदर्द साबित करने में जुट गईं हैं। उन्होंने एलान किया है कि तृणमूल सरकार अल्पसंख्यकों के विकास और उन्हें उनका वाजिब हक देने के लिए प्रतिबद्ध है। अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने और उनके विकास के लिए विधानसभा में तीन माह के भीतर बिल पेश किया जाएगा। ममता ने अल्पसंख्यकों से जुड़े विशेष प्रावधानों की सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू के लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राजेंद्र सच्चर के साथ चर्चा की। उन्होंने अल्पसंख्यकों को 82 करोड़ रुपये ऋण देने और 122 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति के अलावा 7.5 लाख अल्पसंख्यक छात्रों के लिए शिक्षा ऋण देने की भी घोषणा की। ममता ने अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में 7200 आंगनवाड़ी केंद्रों और इंदिरा आवास योजना के तहत 37,300 मकानों के भी निर्माण की घोषणा की। ममता बनर्जी ने शनिवार को यहां अल्पसंख्यक विकास व वित्त निगम द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा, पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार ने अपने लंबे शासनकाल में मुस्लिमों को गुमराह करते हुए हर क्षेत्र में विकास से वंचित रखा। गत वर्ष विस चुनाव के कुछ पहले फरवरी माह में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के आधार पर ओबीसी कोटे के तहत मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में दस प्रतिशत आरक्षण का लालच दिया था, वह छलावा था। वामो द्वारा तैयार बिल के मसौदे को भ्रामक करार देते हुए उन्होंने पिछली वाममोर्चा सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमानों को लाभ पहुंचाने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 10 फीसदी बढ़ा दिया था। इसमें अल्पसंख्यक समुदाय का स्पष्ट जिक्र नहीं था। वह न तो इसे सही ढंग से तैयार कर सके और न ही राज्यपाल से इस पर मंजूरी की मुहर लगवा सके। ममता ने कहा, हमारी सरकार तय समय में समुदाय के लोगों को उनका वाजिब हक देने पर प्रतिबद्ध है। सरकार पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार के प्रयासों पर नए सिरे से विचार करेगी। उन्होंने कहा, कुछ कानूनी जटिलताएं हैं। चूंकि अल्पसंख्यक और अन्य पिछड़ा वर्ग दो अलग अलग शाखाएं हैं, इसलिए विधेयक को समग्र बनाने के लिए दोनों की सहमति जरूरी है। इसके लिए विशेषज्ञ समिति के गठन के कदम उठाए जा रहे हैं ताकि पूर्व की गलतियों को दूर कर नए प्रावधान शामिल करते हुए विधेयक तैयार किया जा सके। बाद में उन्होंने टाउन हाल में अल्पसंख्यकों के विकास तथा आरक्षण की सिफारिश करने वाले सच्चर कमेटी के अध्यक्ष जस्टिस राजेन्द्र सिंह सच्चर के साथ लंबी बैठक की। एक घंटे चली बैठक के बाद उन्होंने बताया कि सच्चर के साथ मंत्रणा सकारात्मक रही। उन्होंने राज्य में मुसलमानों की शिक्षा-संस्कृति-रोजगार की उपलब्धता आदि मुद्दों पर जानकारी हासिल की तथा मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर खास डाटा तैयार करने का परामर्श दिया। सरकार ने जॉब डाटा बैंक तैयारी समेत उनके अन्य सुझावों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया है।
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