Wednesday, April 20, 2011

जबरन धर्म परिवर्तन


पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की आवाज मुखर हो रही है जबकि बढ़ती हिंसा और धमकियों के बीच मानवाधिकार तथा सहिष्णुता की आवाज अलग-थलग पड़ती जा रही है। यह सचाई वहां के मानव अधिकार आयोग (एचआरसीपी) की हालिया रिपोर्ट का हिस्सा है। पिछले साल की स्थिति पर जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि देश में हिंदू और सिख समुदाय के लोगों की हालत बेहद दयनीय है। हमेशा आशंका, डर और आतंक के साये में जीना उनकी मजबूरी है। अन्य अल्पसंख्यकों की हालत भी कोई अच्छी नहीं है। मजहबी हिंसा की वजह से अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय के 99 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। गौर करने की बात है कि एचआरसीपी की रिपोर्ट उन तथ्यों पर आधारित है जो पाकिस्तान की पुलिस ने दर्ज किए हैं और जिनके आधार पर इस आयोग ने इसे तैयार किया है। इससे असली तस्वीर का अंदाज लगाया जा सकता है। खुद पाकिस्तान सरकार कुबूल कर चुकी है कि उसकी जानकारी में है कि देश में दमन, हिंसा और जोर-जबर्दस्ती के सभी मामले पुलिस एजेंसी के द्वारा दर्ज नहीं किए जाते हैं। एचआरसीपी की रिपोर्ट का दूसरा पहलू और भी खौफनाक तस्वीर पेश करता है। इसमें कहा गया है- हिंदू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है जिससे अल्पसंख्यक समुदाय बहुत चिंतित है। पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन का ढंग कुछ अन्य धर्मो के प्रचारकों की भांति लोभ-लालच से आकर्षित या प्रभावित करके अपने धर्म में खींचने का नहीं है बल्कि यह बहुत आदिम, बर्बर और मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाने वाला है। रिपोर्ट ही कहती है कि नाबालिग और हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया जाता है। बाद में उन्हें धर्म बदलने के लिए विवश किया जाता है। इस तरह के मामले शिकायत के स्तर तक किसी तरह पहुंचते हैं तो 12-13 साल की लड़कियों को भी उनके अभिभावकों के संरक्षण में नहीं छोड़ा जाता। झूठी दलील दी जाती है कि लड़की ने इस्लाम मजहब को कुबूल कर लिया है। उसकी मुस्लिम व्यक्ति से शादी हो गई है तथा वह पुराने धर्म में नहीं लौटना चाहती। वहां की सीनेट की स्थायी समिति ने गत वर्ष अक्टूबर में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस उपाय करने का सरकार से आग्रह किया था मगर उसे अनसुना कर दिया गया। इससे जाहिर है कि सरकार की या तो इस तरह के मामलों में मिलीभगत है, या फिर इसे रोक पाना उसके बस में नहीं है और वह कठमुल्लाओं के समक्ष घुटने टेक चुकी है। लेकिन भारत को क्या इसी बिना पर यह मुद्दा छोड़ देना चाहिए कि यह एक सम्प्रभु देश का आंतरिक मामला है? भारत में इस तरह की कोई घटना होती तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय मामले को सिर पर उठा लेता! संक्षेप में 'पाक' कहे जाने वाले पाकिस्तान में मानवाधिकार विरोधी नापाक हरकतों पर दुनिया, खासकर भारत सरकार तथा यहां धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार चुप क्यों हैं? बहुत जरूरी है कि भारत इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाए तथा ऐसी बर्बरता को रोकने के लिए कूटनयिक स्तर से लेकर सभी जरूरी पहल करे नहीं तो दोनों देशों के रिश्ते कभी पटरी पर नहीं आ सकेंगे!

Tuesday, April 12, 2011

फ्रांस में लागू हुआ बुर्के पर प्रतिबंध, नकाबपोश महिलाएं गिरफ्तार


यूरोप के सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले देश फ्रांस में बुर्का पहनने पर लगाया प्रतिबंध सोमवार से लागू हो गया। अब महिलाएं सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का नहीं पहन सकेंगी। नए कानून के अमल में आने के बाद प्रधानमंत्री निकोलस सरकोजी की जमकर आलोचना हो रही हैं। नए कानून के मुताबिक पुलिस को बुर्का पहनी किसी भी महिला का चेहरा देखने का अधिकार होगा। इंकार करने वाली महिला को साढ़े नौ हजार रुपये जुर्माना देना पड़ेगा। बुर्के पर पाबंदी के खिलाफ शनिवार को प्रदर्शन किया गया था, जिसमें 59 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 19 महिलाएं शामिल थीं। इन्होंने बुर्का पहनकर प्रदर्शन किया। सोमवार से प्रतिबंध लागू होने के बाद भी कई महिलाएं सार्वजनिक स्थलों पर नकाब पहनकर दिखाई थीं। पुलिस ने कानून का उल्लंघन करने के आरोप में अब तक दो महिलाओं को गिरफ्तार किया है|

फाइलों में ही गुम हो गया अल्पसंख्यक एजेंडा


बड़े-बड़े वादे करके दो साल पहले फिर से सत्ता में लौटी सरकार का अल्पसंख्यक एजेंडा सरकारी फाइलों में ही गुम होकर रह गया है। आलम यह है कि वादे के बावजूद न समान अवसर आयोग बना और न ही अवैध कब्जे की गिरफ्त में फंसी हजारों करोड़ की वक्फ संपत्तियों के संरक्षण के लिए कानून। केंद्रीय व राज्य वक्फ बोर्डों को अलग से मदद की योजना भी परवान नहीं चढ़ सकी। सरकार के वादों का ही असर था कि अल्पसंख्यक बहुल 121 जिलों में कांग्रेस को 2004 के मुकाबले 2009 के लोकसभा चुनाव में 30 सीटें ज्यादा मिली थीं। तब उसने पढ़ाई व नौकरियों में वंचित समूहों को तवज्जो के लिए समान अवसर आयोग गठन की बात कही थी। सालभर के भीतर ही उसके विधेयक को भी संसद में पेश करना था। दो साल बीतने को हैं। विधेयक को संसद में पेश होना तो दूर, उसे कैबिनेट तक की मंजूरी नहीं मिल सकी। वजह सिर्फ यह है कि खुद सरकार के मंत्रियों में उसके गठन और अधिकार को लेकर खींचतान है। मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में है। राज्यों के वक्फ बोर्ड आर्थिक रूप से गरीब मुसलमानों की मदद में हाथ बंटाते हैं। लिहाजा केंद्रीय व राज्यों के वक्फ बोर्डों के मदद के लिए नई योजना शुरू होनी थी। बजट में अलग से धन का प्रावधान होना था। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय योजना आयोग इसके लिए राजी ही नहीं हुआ। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सारे सपने धरे के धरे रह गए। देश के लगभग सभी शहरों में हजारों करोड़ की वक्फ संपत्तियां हैं। उन पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे हैं। राज्यसभा के उप सभापति के. रहमान खान की अगुवाई में बनी एक संयुक्त संसदीय समिति उन संपत्तियों को बचाने और बेहतर इस्तेमाल के लिए लगभग तीन साल पहले वक्फ कानून में संशोधन की सिफारिश की थी। उसका विधेयक लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में पारित होने से पहले ही खुद सरकार ने ही उसे प्रवर समिति को सौंपने की पहल कर दी। लगभग सालभर से वह वहीं अटका पड़ा है। वक्फ संपत्तियों की बदइंतजामी का आलम यह है कि खुद सरकार को भी सही-सही नहीं पता कि ये संपत्तियों हैं कितनी। लिहाजा वक्फ संपत्तियों की सही स्थिति व उनके संरक्षण के लिए सारे वक्फ रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण किया जाना था। लगभग दो साल होने को हैं और यह काम भी आधा-अधूरा पड़ा है। केंद्र ने राज्यों से कहा है कि वे वक्फ संपत्तियों को डाटा तैयार करें|

Sunday, April 10, 2011

गर्भ निरोध नहीं, भ्रूण हत्या है गैरइस्लामी


इन उपायों को लेकर इस्लामिक समाज में भी जागरूकता आ रही है। जब व्यक्ति शिक्षित होगा और अपनी जिम्मेदारी को समझेगा तो निश्चित तौर पर ऐसे व्यक्ति का परिवार छोटा ही होगा
कोई महिला गर्भवती न हो, इसके लिए पहले से कोई उपाय किया जाए और किसी बच्चे की गर्भ में ही हत्या कर दी जाए, ये दोनों बिल्कुल अलग- अलग बातें हैं। बर्थ कंट्रोल और एबॉर्शन को एक पलड़े पर रखकर नहीं तौला जा सकता। इस्लाम में कभी इस बात की मनाही नहीं है कि कोई महिला गर्भवती होने से बचने के लिए गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करे। इस्लाम पुरुष की नसबंदी और उसके द्वारा कंडोम के इस्तेमाल की भी इजाजत देता है।
इस्लाम में गर्भपात हराम
यदि महिला एक बार गर्भवती हो जाए, उसके बाद बच्चे को गिराना इस्लाम में हराम है। आज सोनोग्राफी के जरिये लिंग जांच और उसके बाद गर्भपात की जो घटनाएं सुनने में आती हैं, इस तरह की घटनाएं गैर इस्लामिक हैं। इस्लाम गर्भपात की बिल्कुल इजाजत नहीं देता। या कोई बच्ची दुनिया में आ जाएं और उसके लिंग का पता चल जान के बाद उसे जान से मार दिया जाए। यह बिल्कुल हत्या होगी, जिसकी इजाजत इस्लाम में नहीं है।
गर्भनिरोधक की है इजाजत
मुसलमान सबसे पवित्र किताब 'कुरआन' को मानते हैं। दूसरी जो पवित्र किताब है, उसे कहते हैं 'बुखारी'। उसके अनुसार रसुल्लाह के साथी इस बात का ध्यान रखते थे कि महिलाएं गर्भवती न हों, इसके लिए कुछ तरकीब का इस्तेमाल करते थे। इस बात के लिए मोहम्मद साहब ने उन्हें कभी मना नहीं किया। यदि किसी बात को वे जानते हुए मना न करें तो इसे इस्लाम में उनका समर्थन ही माना जाता है जिसे आप रसूल का मौन समर्थन कह सकते हैं। इस तरह गर्भ न ठहरने के लिए की जाने वाली युक्तियों को इस्लाम में गलत नहीं ठहराया गया। यह जनसंख्या के नियंतण्रमें भी सहायक है।
एबॉर्शन नाजायज
यह तो धीरे-धीरे रिवाज बनता जा रहा है। गर्भ में बच्ची है तो उसे गिरा दो। भारत में इसका रिवाज कुछ ज्यादा ही है। इसके खिलाफ कानून बनाया गया लेकिन उसका भी कुछ खास फायदा नजर नहीं आता। सुनते हैं कि पंजाब में एबॉर्शन का चलन ज्यादा है। इस बात को किसी भी प्रकार से जायज नहीं ठहराया जा सकता। यह बिल्कुल गलत है। जो बच्चा गर्भ में आ गया है,उस बच्चे को मार नहीं सकते। इस्लाम में तो स्त्री और पुरुष दोनों को बराबर का हक मिला है। कहते हैं कि जिस प्रकार सेब के दो भाग करने के बाद दोनों तरफ एक सी बराबरी होती है। उसी प्रकार इस्लाम में स्त्री और पुरुष के बीच का रिश्ता है।
गर्भपात का गुनाह हत्या के बराबर
इस्लाम के कानून के अनुसार गर्भ में पल रही बच्ची को गर्भ में मारा गया तो यह उतना ही संगीन अपराध है जितना हम हत्या को मानते हैं। गर्भ को गिराने वाला हत्या का अपराधी माना जाएगा। इसमें सबसे अधिक दोषी वह डॉक्टर माना जाएगा, जिसने मां-बाप के कहने पर गर्भपात जैसे संगीन अपराध को अंजाम दिया। इसके लिए डॉक्टर को मौत की सजा मिलेगी। मां-बाप को भी कोड़ों की सजा मिलेगी या उन पर आर्थिक जुर्माना लगाकर छोड़ा जाएगा। वह व्यक्ति बिल्कुल सजा का सबसे बड़ा भागीदार है, जिसके हाथों गर्भपात जैसे घिनौना काम का अंजाम दिया गया है। अब धीरे-धीरे गर्भ निरोध के उपायों को लेकर इस्लामिक समाज में भी जागरूकता आ रही है। अधिक बड़ा परिवार धार्मिक मसला कम, अशिक्षा का परिणाम अधिक है। जब व्यक्ति शिक्षित होगा और अपनी जिम्मेदारी को समझेगा तो निश्चित तौर पर ऐसे व्यक्ति का परिवार छोटा ही होगा।
नवजात से 6 वर्ष के बच्चे का लिंगानुपात और 1961-2011 तक के सकल लिंगानुपात
देश में लिंगानुपात 940 है जो 1971 से सर्वाधिक है । लिंगानुपात में 2001 की जनगणना की तुलना में सात अंकों की वृद्धि हुई है। अधिकतर राज्य जहां लिंगानुपात में ज्यादा अंतर था, अब समस्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। बिहार औ र जम्मू - कश्मीर दो राज्य हैं, जहां लिंगानु पात में कोई वृद्धि नहीं हुई है। बच्चों के लिं गानुपात में 1961 से ही गिरावट बनी हुई है। 2011 की जनगणना में तो यह सबसे निचले स्तर 914 पर पहुंच गईहै। (मौलाना वहीदुद्दीन से  आशीष कुमार 'अंशु' की बातचीत पर आधारित)

फ्रांस में महिलाएं नहीं पहन सकेंगी बुर्का


यूरोप के सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश फ्रांस की पुलिस को सोमवार से बुर्का पहनकर चलने वाली महिलाओं की तलाशी का अधिकार मिल जाएगा। तलाशी से मना करने पर उन पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। नए कानून के मुताबिक, कोई भी महिला सार्वजनिक स्थान पर अपना चेहरा नहीं छुपा सकती है। हालांकि कई अन्य देश भी बुर्के पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। मगर इस कानून के लागू होने के बाद पूरे यूरोप में सिर्फ फ्रांस की पुलिस को ही सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का पहनने वाली महिलाओं को चेहरा दिखाने के लिए कहने का अधिकार होगा। कानून का उल्लंघन करने वाली महिला को 216 डॉलर (लगभग साढ़े नौ हजार रुपये) का जुर्माना देना होगा। महिलाओं को उनके परिवार या धार्मिक संगठन द्वारा बुर्का पहनने पर मजबूर किए जाने वालों के खिलाफ 43,200 डॉलर (लगभग 19 लाख रुपये) जुर्माना और एक साल की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है। हालांकि इस कानून को लेकर राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की काफी आलोचनाएं भी हुई हैं। कई मुस्लिम संस्थाओं और मानवाधिकार संगठनों ने सरकोजी पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति वोट बैंक के लिए ऐसा कर रहे हैं। सरकोजी ने कहा था कि फ्रांस में बुर्के का स्वागत नहीं किया जाएगा क्योंकि इसमें धर्म पालन नहीं बल्कि दासता झलकती है। हालांकि फ्रांस की मुख्य मुस्लिम प्रतिनिधि संस्था (सीएफ सीएम) इस कानून के पूरी तरह खिलाफ नहीं है|