पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की आवाज मुखर हो रही है जबकि बढ़ती हिंसा और धमकियों के बीच मानवाधिकार तथा सहिष्णुता की आवाज अलग-थलग पड़ती जा रही है। यह सचाई वहां के मानव अधिकार आयोग (एचआरसीपी) की हालिया रिपोर्ट का हिस्सा है। पिछले साल की स्थिति पर जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि देश में हिंदू और सिख समुदाय के लोगों की हालत बेहद दयनीय है। हमेशा आशंका, डर और आतंक के साये में जीना उनकी मजबूरी है। अन्य अल्पसंख्यकों की हालत भी कोई अच्छी नहीं है। मजहबी हिंसा की वजह से अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय के 99 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। गौर करने की बात है कि एचआरसीपी की रिपोर्ट उन तथ्यों पर आधारित है जो पाकिस्तान की पुलिस ने दर्ज किए हैं और जिनके आधार पर इस आयोग ने इसे तैयार किया है। इससे असली तस्वीर का अंदाज लगाया जा सकता है। खुद पाकिस्तान सरकार कुबूल कर चुकी है कि उसकी जानकारी में है कि देश में दमन, हिंसा और जोर-जबर्दस्ती के सभी मामले पुलिस एजेंसी के द्वारा दर्ज नहीं किए जाते हैं। एचआरसीपी की रिपोर्ट का दूसरा पहलू और भी खौफनाक तस्वीर पेश करता है। इसमें कहा गया है- हिंदू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है जिससे अल्पसंख्यक समुदाय बहुत चिंतित है। पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन का ढंग कुछ अन्य धर्मो के प्रचारकों की भांति लोभ-लालच से आकर्षित या प्रभावित करके अपने धर्म में खींचने का नहीं है बल्कि यह बहुत आदिम, बर्बर और मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाने वाला है। रिपोर्ट ही कहती है कि नाबालिग और हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया जाता है। बाद में उन्हें धर्म बदलने के लिए विवश किया जाता है। इस तरह के मामले शिकायत के स्तर तक किसी तरह पहुंचते हैं तो 12-13 साल की लड़कियों को भी उनके अभिभावकों के संरक्षण में नहीं छोड़ा जाता। झूठी दलील दी जाती है कि लड़की ने इस्लाम मजहब को कुबूल कर लिया है। उसकी मुस्लिम व्यक्ति से शादी हो गई है तथा वह पुराने धर्म में नहीं लौटना चाहती। वहां की सीनेट की स्थायी समिति ने गत वर्ष अक्टूबर में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस उपाय करने का सरकार से आग्रह किया था मगर उसे अनसुना कर दिया गया। इससे जाहिर है कि सरकार की या तो इस तरह के मामलों में मिलीभगत है, या फिर इसे रोक पाना उसके बस में नहीं है और वह कठमुल्लाओं के समक्ष घुटने टेक चुकी है। लेकिन भारत को क्या इसी बिना पर यह मुद्दा छोड़ देना चाहिए कि यह एक सम्प्रभु देश का आंतरिक मामला है? भारत में इस तरह की कोई घटना होती तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय मामले को सिर पर उठा लेता! संक्षेप में 'पाक' कहे जाने वाले पाकिस्तान में मानवाधिकार विरोधी नापाक हरकतों पर दुनिया, खासकर भारत सरकार तथा यहां धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार चुप क्यों हैं? बहुत जरूरी है कि भारत इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाए तथा ऐसी बर्बरता को रोकने के लिए कूटनयिक स्तर से लेकर सभी जरूरी पहल करे नहीं तो दोनों देशों के रिश्ते कभी पटरी पर नहीं आ सकेंगे!
Wednesday, April 20, 2011
जबरन धर्म परिवर्तन
पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की आवाज मुखर हो रही है जबकि बढ़ती हिंसा और धमकियों के बीच मानवाधिकार तथा सहिष्णुता की आवाज अलग-थलग पड़ती जा रही है। यह सचाई वहां के मानव अधिकार आयोग (एचआरसीपी) की हालिया रिपोर्ट का हिस्सा है। पिछले साल की स्थिति पर जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि देश में हिंदू और सिख समुदाय के लोगों की हालत बेहद दयनीय है। हमेशा आशंका, डर और आतंक के साये में जीना उनकी मजबूरी है। अन्य अल्पसंख्यकों की हालत भी कोई अच्छी नहीं है। मजहबी हिंसा की वजह से अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय के 99 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। गौर करने की बात है कि एचआरसीपी की रिपोर्ट उन तथ्यों पर आधारित है जो पाकिस्तान की पुलिस ने दर्ज किए हैं और जिनके आधार पर इस आयोग ने इसे तैयार किया है। इससे असली तस्वीर का अंदाज लगाया जा सकता है। खुद पाकिस्तान सरकार कुबूल कर चुकी है कि उसकी जानकारी में है कि देश में दमन, हिंसा और जोर-जबर्दस्ती के सभी मामले पुलिस एजेंसी के द्वारा दर्ज नहीं किए जाते हैं। एचआरसीपी की रिपोर्ट का दूसरा पहलू और भी खौफनाक तस्वीर पेश करता है। इसमें कहा गया है- हिंदू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है जिससे अल्पसंख्यक समुदाय बहुत चिंतित है। पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन का ढंग कुछ अन्य धर्मो के प्रचारकों की भांति लोभ-लालच से आकर्षित या प्रभावित करके अपने धर्म में खींचने का नहीं है बल्कि यह बहुत आदिम, बर्बर और मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाने वाला है। रिपोर्ट ही कहती है कि नाबालिग और हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया जाता है। बाद में उन्हें धर्म बदलने के लिए विवश किया जाता है। इस तरह के मामले शिकायत के स्तर तक किसी तरह पहुंचते हैं तो 12-13 साल की लड़कियों को भी उनके अभिभावकों के संरक्षण में नहीं छोड़ा जाता। झूठी दलील दी जाती है कि लड़की ने इस्लाम मजहब को कुबूल कर लिया है। उसकी मुस्लिम व्यक्ति से शादी हो गई है तथा वह पुराने धर्म में नहीं लौटना चाहती। वहां की सीनेट की स्थायी समिति ने गत वर्ष अक्टूबर में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस उपाय करने का सरकार से आग्रह किया था मगर उसे अनसुना कर दिया गया। इससे जाहिर है कि सरकार की या तो इस तरह के मामलों में मिलीभगत है, या फिर इसे रोक पाना उसके बस में नहीं है और वह कठमुल्लाओं के समक्ष घुटने टेक चुकी है। लेकिन भारत को क्या इसी बिना पर यह मुद्दा छोड़ देना चाहिए कि यह एक सम्प्रभु देश का आंतरिक मामला है? भारत में इस तरह की कोई घटना होती तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय मामले को सिर पर उठा लेता! संक्षेप में 'पाक' कहे जाने वाले पाकिस्तान में मानवाधिकार विरोधी नापाक हरकतों पर दुनिया, खासकर भारत सरकार तथा यहां धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार चुप क्यों हैं? बहुत जरूरी है कि भारत इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाए तथा ऐसी बर्बरता को रोकने के लिए कूटनयिक स्तर से लेकर सभी जरूरी पहल करे नहीं तो दोनों देशों के रिश्ते कभी पटरी पर नहीं आ सकेंगे!
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