Tuesday, April 12, 2011

फाइलों में ही गुम हो गया अल्पसंख्यक एजेंडा


बड़े-बड़े वादे करके दो साल पहले फिर से सत्ता में लौटी सरकार का अल्पसंख्यक एजेंडा सरकारी फाइलों में ही गुम होकर रह गया है। आलम यह है कि वादे के बावजूद न समान अवसर आयोग बना और न ही अवैध कब्जे की गिरफ्त में फंसी हजारों करोड़ की वक्फ संपत्तियों के संरक्षण के लिए कानून। केंद्रीय व राज्य वक्फ बोर्डों को अलग से मदद की योजना भी परवान नहीं चढ़ सकी। सरकार के वादों का ही असर था कि अल्पसंख्यक बहुल 121 जिलों में कांग्रेस को 2004 के मुकाबले 2009 के लोकसभा चुनाव में 30 सीटें ज्यादा मिली थीं। तब उसने पढ़ाई व नौकरियों में वंचित समूहों को तवज्जो के लिए समान अवसर आयोग गठन की बात कही थी। सालभर के भीतर ही उसके विधेयक को भी संसद में पेश करना था। दो साल बीतने को हैं। विधेयक को संसद में पेश होना तो दूर, उसे कैबिनेट तक की मंजूरी नहीं मिल सकी। वजह सिर्फ यह है कि खुद सरकार के मंत्रियों में उसके गठन और अधिकार को लेकर खींचतान है। मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में है। राज्यों के वक्फ बोर्ड आर्थिक रूप से गरीब मुसलमानों की मदद में हाथ बंटाते हैं। लिहाजा केंद्रीय व राज्यों के वक्फ बोर्डों के मदद के लिए नई योजना शुरू होनी थी। बजट में अलग से धन का प्रावधान होना था। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय योजना आयोग इसके लिए राजी ही नहीं हुआ। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सारे सपने धरे के धरे रह गए। देश के लगभग सभी शहरों में हजारों करोड़ की वक्फ संपत्तियां हैं। उन पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे हैं। राज्यसभा के उप सभापति के. रहमान खान की अगुवाई में बनी एक संयुक्त संसदीय समिति उन संपत्तियों को बचाने और बेहतर इस्तेमाल के लिए लगभग तीन साल पहले वक्फ कानून में संशोधन की सिफारिश की थी। उसका विधेयक लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में पारित होने से पहले ही खुद सरकार ने ही उसे प्रवर समिति को सौंपने की पहल कर दी। लगभग सालभर से वह वहीं अटका पड़ा है। वक्फ संपत्तियों की बदइंतजामी का आलम यह है कि खुद सरकार को भी सही-सही नहीं पता कि ये संपत्तियों हैं कितनी। लिहाजा वक्फ संपत्तियों की सही स्थिति व उनके संरक्षण के लिए सारे वक्फ रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण किया जाना था। लगभग दो साल होने को हैं और यह काम भी आधा-अधूरा पड़ा है। केंद्र ने राज्यों से कहा है कि वे वक्फ संपत्तियों को डाटा तैयार करें|

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