दारुल उलूम के मोहतमिम बनाए गए मौलाना अबुल कासिम नोमानी का कहना है कि 23 फरवरी को हुई शूरा की बैठक में ही यह तय हो गया था कि जांच कमेटी की रिपोर्ट चाहे जो आए मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी इस्तीफा देंगे। इदारे के 11वें मोहतमिम का पदभार ग्रहण करने के बाद रविवार देर शाम उन्होंने दैनिक जागरण से लंबी बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश। सवाल : जांच कमेटी ने क्या रिपोर्ट पेश की? जवाब : जांच कमेटी ने नरेंद्र मोदी के संबंध में मौलाना वस्तानवी से संबंधित बयान एवं मदरसा छात्रों से संबधित हंगामा आदि के तथ्य प्रस्तुत किये। सवाल : कमेटी ने रिपोर्ट अलग- अलग पेश की? जवाब : जी नही तीनों सदस्यों ने संयुक्त रूप से रिपोर्ट पेश की। सवाल : शूरा ने इस्तीफे के लिए वस्तानवी पर दबाव बनाया? जवाब : जी नहीं, शूरा ने कोई दबाव नहीं बनाया। मौलाना वस्तानवी ने खुद कहा था कि मैं अगली बैठक में इस्तीफा दे दूंगा। सवाल : तो जांच कमेटी क्यों गठित की गई?जवाब : मौलाना वस्तानवी ने 23 फरवरी की बैठक में आग्रह किया था, उन्होंने शूरा से वक्त मांगा था इसलिए जांच कमेटी का गठन किया गया था। यह भी तय हो गया था कि जांच कुछ भी आये में वह इस्तीफा देंगे।सवाल : इस्तीफा देने की बात मौलाना वस्तानवी ने क्यों की? जवाब : जब दस जनवरी को नरेंद्र मोदी की हिमायत करने के आरोपों को लेकर हंगामा हुआ तो 15 जनवरी को उन्होंने खुद इस्तीफे की पेशकश की थी। सवाल : इस बार की शूरा की बैठक में इस्तीफा एजेंडे में था? जवाब : नहीं ऐसा नहीं है। 23 फरवरी को जो मजलिस-ए-शूरा की एक दिवसीय आपातकाल बैठक हुई थी, बैठक मौलाना वस्तानवी के इस्तीफा देने की पेशकश पर ही बुलाई गई थी। यदि मौलाना वस्तानवी शूरा से समय न मांगते तो उसी समय सबकुछ तय हो जाता। सवाल : ऐसा मौलाना वस्तानवी ने क्यों किया? जवाब : वस्तानवी साहब चाहते थे कि उन्हें समय मिले, इसीलिए उन्होंने जांच कमेटी का गठन करने का आग्रह किया थे। सवाल : मौलाना वस्तानवी का इसके पीछे कोई उद्देश्य? जवाब : जाहिर है वस्तानवी साहब चाहते थे कि उनकी विदाई सही तरीके से हो। किसी तरह का कोई मसला खड़ा न हो। सवाल : क्या आप दारुल उलूम में आधुनिक शिक्षा के पक्षधर हैं? जवाब : जी नहीं आधुनिक शिक्षा के लिए बहुत शिक्षण संस्थाएं हैं। दारुल उलूम में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा। न ही परिवर्तन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उनकी कोई प्राथमिकता नहीं है सिर्फ दारुल उलूम को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।
Tuesday, July 26, 2011
सुप्रीम कोर्ट जाएंगे वस्तानवी समर्थक
: वस्तानवी के समर्थकों ने मजलिस-ए-शूरा का पुतला फूंक कर यह संदेश दिया है कि विरोध के स्वर थमने वाले नहीं हैं। वस्तानवी समर्थकों ने उनके पक्ष में जमकर नारेबाजी की। वस्तानवी समर्थक रिहानुलहक ने कहा कि शूरा की बैठक को खुली चुनौती देते हुए कहा कि वह फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट जायेंगे तथा आखिर तक इंसाफ की लड़ाई लड़ेंगे। उन्होंने शूरा पर यह भी आरोप लगाया कि दारुल उलूम के संविधान के मुताबिक शूरा का फैसला नहीं हुआ है। फैसले से वस्तानवी के पदच्युत किए जाने से इदारे के अंदरूनी हालात पहले जैसे कतई नहीं रहेंगे। दरअसल, वस्तानवी विरोधी व समर्थक तलबा में खटास बढ़ सकती है। दारुल उलूम के बाहर भी यही हालात हैं। मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को मोहतमिम बनाए जाने के बाद से ही दारुल उलूम में छात्र दो फाड़ हो गए थे। इसके चलते पंद्रह छात्रों का निलंबन भी किया गया था। आज वस्तानवी की बर्खास्तगी पर विरोधी छात्रों ने वस्तानवी वापस जाओ के नारे लगाए जबकि समर्थकों ने जिंदाबाद बोला। जाहिर है कि छात्र दो गुटों में बंट गए हैं। दारुल उलूम के बाहर भी समर्थन और विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं।वहीं मजलिस-ए-शूरा द्वारा मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को मोहतमिम पद से हटाये जाने पर उलेमा ने मिलीजुली राय जाहिर की है। हालांकि कुछ उलेमा ने किसी तरह की प्रतिक्रिया देने से इंकार किया है। उधर, जमीयत उलेमा हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने साफ तौर पर कहा है कि इस विवाद से हमारा कोई संबंध नहीं है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य मौलाना मुहम्मद इस्लाम कासमी ने कहा कि शूरा सुप्रीम पॉवर है। शूरा जो फैसला लेती है सही लेती है। उन्होंने सवाल भी उठाया कि जो फैसला पहले शूरा ने लिया था क्या उसमें कहीं चूक हुई थी? दारुल उलूम वक्फ के उस्ताद मुफ्ती मुहम्मद आरिफ का कहना है कि शूरा को पहले सोचना चाहिए था कि क्या उसने जो फैसला लिया है वह सही है या गलत। पहले मोहतमिम बनाया गया, बाद मे हटा दिया गया जो समझ से बाहर है। दारुल उलूम वक्फ के उस्ताद मौलाना अब्दुल लतीफ कासमी का कहना है कि शूरा ने दबाव में फैसला किया। पहले मोहतमिम बनाया फिर बर्खास्त कर दिया गया। यह शूरा की कमजोरी है। उधर जमीयत उलेमा हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि इस संबंध में मजलिस-ए-शूरा ही फैसला लेने के लिए अधिकृत है। मदनी ने कहा कि हमारा मोहतमिम विवाद से कोई लेना देना नहीं है।
दारुल उलूम किसी खानदान की जागीर नहीं : वस्तानवी
मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने मीडिया का आभार व्यक्त करते हुए साफ तौर पर कहा कि दारुल उलूम किसी खानदान विशेष की जागीर नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं। मैं एक सीधा सादा इंसान हूं। मदरसे व कालेज चलाता हूं। मेरा यही मकसद है कि दारुल उलूम तरक्की करे तथा यहां अमन कायम रहे। उन्होंने कहा कि मोहतमिम का पद मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। मैं तो दारुल उलूम का सेवक हूं और सेवा करता रहूंगा। उन्होंने यह भी कहा कि तलबा का प्रयोग किया गया जो गलत है।
इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहा मलेशिया
मलेशिया में हुए एक नए सर्वेक्षण में पता लगा है कि देश के ज्यादातर युवा अपने संविधान की जगह कुरान को देश चलाने का जरिया बनाना चाहते हैं। एक स्वतंत्र मत सर्वेक्षण कंपनी मर्डेका सेंटर द्वारा किए गए इस सर्वे से पता लगा है कि पूर्वी एशिया का यह देश तेजी के साथ सामाजिक रूप से कट्टरपंथी होता जा रहा है। ये नया सर्वेक्षण उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए चिंता का विषय है जो लंबे समय से चेताते रहे हैं कि देश का इस्लामीकरण होता जा रहा है। सर्वेक्षण में यह भी पता लगा है कि अधिकतर युवा अपराधियों के लिए अधिक कड़ी सजाएं चाहते हैं। दस में से सात लोगों का कहना है कि चोरों के हाथ काट देने चाहिए. अधिकतर मानते हैं कि शराब पीने पर कोड़े लगाए जाना सही होगा। इसमें एक अनोखी बात जो सामने आई है वह यह है कि कि मलेशिया के ये मुसलमान धार्मिक परंपराओं का पालन करने में उतने सख्त नहीं हैं। सर्वेक्षण में करीब 70 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वो नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद जाने की अपेक्षा घर पर टीवी देखना अधिक पसंद करते हैं। रजाली कहते हैं, आप हमसे पूरे समय प्रार्थना की अपेक्षा नहीं कर सकते। एक अच्छा मुसलमान होने का मतलब है कि अपने जीवन को अच्छे से जिया जाए और जीवन की आम चीजों से आनंद उठाया जाए। सर्वेक्षणकर्ताओं ने 25 साल से कम उम्र के करीब 1000 मुसलमान युवाओं से बात की। हालांकि सर्वेक्षण में कम लोगों से बात की गई है पर ये उन लोगों की बातों की पुष्टि कर रहा है जो यह कहते हैं कि देश के मुसलमान कट्टरपंथी होते जा रहे हैं। पिछले कुछ समय में कई चर्चित घटनाएं घटी हैं जिनसे मलेशिया की एक नरमपंथी मुसलमान राष्ट्र की छवि को धक्का लगा है। 2010 में तीन ऐसी महिलाओं को कोड़े लगाए गए थे जिन्हें अपने वैवाहिक संबंधों के बाहर शारीरिक संबंध बनाए का दोषी पाया गया था। यूं तो मलेशिया में शरियत के कानून केवल मुसलामानों पर लागू होते हैं, पर शायद ही किसी को विवाहेतर संबंधों या शराब पीने के लिए दंडित किया गया हो। लेकिन अब कट्टरपंथी निजी गलतियों को अपराध की तरह से देख रहे हैं। -साभार बीबीसी
Sunday, July 24, 2011
Wednesday, July 20, 2011
Monday, July 18, 2011
लाहौर में सिखों को नहीं घुसने दिया गुरुद्वारे में
पाकिस्तान में लाहौर के पूर्वी क्षेत्र में सिखों को एक गुरुद्वारे में धार्मिक समारोह आयोजित करने से रोक दिया गया है। यह फैसला प्रशासन ने एक संगठन द्वारा यह यकीन दिलाने के बाद किया कि मुस्लिम त्योहार शब-ए-बरात सिखों के त्योहार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। द ट्रिब्यून अखबार के मुताबिक, दावत-ए-इस्लामी समूह के प्रयासों से 13 जुलाई को सिखों के वाद्य यंत्रों को बाहर फेंक दिया गया और गुरुद्वारे में उनका प्रवेश वर्जित कर दिया गया। गुरुद्वारे के बाहर पुलिस को तैनात किया गया, ताकि वह सिखों को अपना धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने से रोके। सोमवार को शब-ए-बरात है। लाहौर के नौलखा बाजार में गुरुद्वारा शहीद भाई तारू सिंह सिख संत की याद में बनवाया गया था। हालांकि विभाजन के बाद गुरुद्वारे पर इवैक्यूइ ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (इटीपीबी) का अधिकार हो गया था और सिखों को कुछ प्रतिबंधों के साथ इसका उपयोग जारी रखने की अनुमति दे दी गई थी। चार साल पहले दावत-ए-इस्लामी ने दावा किया था शेष कृष्ठ
लाहौर में सिखों.. कि यह गुरुद्वारा 15वीं शताब्दी के मुस्लिम संत पीर शाह काकू की मजार पर बनाया गया है। इसके बाद सिखों ने इटीपीबी से संपर्क किया, जो दोनों समुदायों को अपनी मान्यताओं के अनुसार गुरुद्वारे में धार्मिक उत्सव मनाने की अनुमति देती है। सिख समुदाय के सदस्यों ने कहा कि दावत-ए-इस्लामी का नेता सलमान बट ने दावा किया कि गुरुद्वारा अब मस्जिद बन गया है और सिखों का वाद्य यंत्र लाना वर्जित है। उन्होंने कहा कि शब-ए-बरात सिखों के उत्सव से अहम है और इटीपीबी ने उनका विचार मान लिया है। इटीपीबी के अधिकारियों ने माना कि उन्होंने सिखों से अपने कार्यक्रम को शब-ए-बरात तक टालने के लिए कहा है। गुरुनानक मिशन के अध्यक्ष सरदार बिशन सिंह ने कहा कि सिखों को उनके पवित्र स्थान पर जाने से रोकने का इटीपीबी का फैसला संविधान के खिलाफ है। साथ ही कहा कि सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज इफ्तिखार चौधरी से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन पर कार्रवाई करने की अपील की है।
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