Thursday, October 4, 2012

क्यों नहीं उभर रहा मुस्लिम नेतृत्व?





विश्लेषण अनिल चमड़िया
अपने देश में संसदीय व्यवस्था में एक बड़ी खामी यह है कि अपने वोट बैंक को बनाए रखने के लिए ने ता समुदायों के भीतर ताकत विकसित नहीं करते हैं। इसीलिए किसी भी पार्टी के राज में मुसलमानों की बुनियादी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं देखा गया संसदीय व्यवस्था में नेतृत्व का अर्थ इस बात में निहित होता है कि वह अपने समुदाय को एक बड़े दायरे की तरफ ले जाए। लेकिन जब नेतृत्व को तैयार ही नहीं किया जाएगा तो वह समाज व समुदाय कहां जाएगा
राजस्थान से मेरे पास एक एसएमएस आया जिसमें लिखा था कि प्रदेश में एक मजबूत मुस्लिम नेतृत्व नहीं उभरने देने की पूरी कोशिश की जाती है। इस पर भाजपा के एक दलित नेता का वह प्रसंग याद आया जब वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री थे। उन्होंने बताया कि एक दिन उनके वरिष्ठ मंत्री और भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में एक ने उन्हें बुलाकर पूछा कि वे पार्टी में दलित नेता बनकर रहना चाहते हैं या फिर दलितों के नेता के रूप में पार्टी में रहना चाहते हैं। उस वरिष्ठ मंत्री ने उनके कुछ दलित- पक्षीय फैसलों से नाराज होकर ये सवाल किया। वरिष्ठ मंत्री की यह चेतावनी थी कि वे पार्टी में बतौर दलित नेता ही रह सकते हैं। हमारी संसदीय व्यवस्था को प्रतिनिधिमूलक कहा जाता है। इतिहास देख लें कि डॉ. अंबेडकर के बाद लंबे अर्से तक कोई दलितों के नेता के रूप में नहीं उभर सका। कांशीराम ही बतौर दलितों के नेता स्थापित हो पाए और उत्तर प्रदेश में पहली बार किसी दलित महिला को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने में सफल रहे। कमजोर वगरे के नेतृत्व व प्रतिनिधि में फर्क को समझना जरूरी है। इस मायने में संसदीय व्यवस्था में मुस्लिम नेतृत्व का सवाल एक गंभीर मोड़ पर खड़ा है। लखनऊ के एक राजनीतिक कार्यकर्ता शाहनवाज आलम का कहना है कि देश में अभी कोई मुस्लिम नेतृत्व ऐसा नहीं है जो मुसलमानों के बीच जाकर भरोसे के साथ उन मुद्दों पर अपनी बात रख सके जिससे मुस्लिम समाज आज सबसे ज्यादा त्रस्त है। इन मुद्दों में आतंकवादी गतिविधियों के नाम पर देश भर में फंसाए गए मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी और सरकारी मशीनरी की यातना प्रमुख हैं। हालात ये हैं कि देश भर में पिछले कुछ वर्षो के दौरान फर्जी तरीके से मुस्लिम युवकों को फंसाए जाने की ढेर सारी घटनाएं सामने आ चुकी है, लेकिन उन मामलों को भी लेकर कोई विश्वसनीय प्रतिनिधि मुस्लिम समाज के बीच खड़ा दिखाई नहीं देता है। उन मसलों को देश में सक्रिय मानवाधिकार संगठनों में सक्रिय लोग ही उठा रहे हैं। मुस्लिम समुदाय को अपने पक्ष में रखने के लिए जिस तरह राजनीतिक पार्टयिां तरह-तरह की चक्करघिन्नी योजनाएं बनाती रहती हैं उसी तरह की सोच उन पार्टयिों में शामिल मुस्लिम प्रतिनिधियों में भी दिखाई देती है। मसलन, राजस्थान में कुछ महीनों के दौरान कई सांप्रदायिक दंगे हुए। उन्हें दंगे से ज्यादा हमले के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन एक मुस्लिम प्रतिनिधि ने यह कहकर मुसलमानों के बीच व्याप्त असुरक्षा की भावना को शांत करने की कोशिश की कि उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया जा रहा है। इससे लोगों में गहरी नाराजगी देखी गई। लेकिन यही एक तरीका है जिससे राजनीतिक पार्टयिां मुसलमानों की बुनियादी समस्याओं को लेकर उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश करती हैं। यदि किसी राज्य में दंगे होते हैं तो देश में मुसलमानों में गहरे स्तर पर असंतोष और असुरक्षा पैदा करने वाले भावों को दूर करने के किसी अभियान के बजाए उन्हें तरह-तरह के पल्रोभन दिए जाते हैं। मसलन, उस समुदाय के विद्यार्थियों के लिए, महिलाओं के लिए और बेरोजगारों के लिए चलने वाली योजनाओं की बात की जाने लगती है। किसी भी समुदाय के कल्याण और हितों में चलने वाले कार्यक्रम पल्रोभन की श्रेणी में नहीं आते हैं, लेकिन एक खास तरह के समय और परिस्थितियों में कल्याणकारी कार्यक्रम पल्रोभन जैसे लगने लगते हैं। किसी राज्य में लगातार दंगे हो रहे हों और वहां दंगों को रोकने तथा दोषियों को सजा दिलाने के बजाए यदि मुसलमानों के कल्याण के कार्यक्रमों की बात की जाने लगे तो उसकी व्याख्या इसी रूप में हो सकती है। आज मुसलमानों के बीच जिस तरह का खौफ है, यदि उस भावना को कोई संबोधित नहीं करता है तो संसदीय व्यवस्था के प्रतिनिधिमूलक होने का क्या मतलब रह जाता है? राजनीतिक पार्टयिों में किसी भी समुदाय या समूह का प्रतिनिधित्व इसीलिए होता है कि वह समाज के समय और सोच को संबोधित करें और उसकी सोच को आगे ले जाने में मददगार की भूमिका में दिखाई दें। एक तरह से देखें तो देश में बाबरी मस्जिद के बाद मुसलमान अपने नेतृत्व की तलाश में लगा हुआ है। कश्मीर में मुख्यमंत्री रह चुके और देश के प्रतिष्ठित नेता सैय्यद मीर कसीम ने कहा था कि इस देश में मुसलमान कभी नेतृत्वकारी भूमिका में नहीं आ सकता है। किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी का कोई मुस्लिम अध्यक्ष या नेतृत्व देश में संभव नहीं है। लेकिन देश में मुसलमानों ने अपने नेता के तौर पर लालू यादव से लेकर मुलायम सिंह यादव तक को स्वीकार किया है। लेकिन अपने देश में संसदीय व्यवस्था में एक बड़ी खामी यह है कि अपने वोट बैंक को बनाए रखने के लिए नेता समुदायों के भीतर ताकत विकसित नहीं करते हैं, उन्हें अपने अधीन किसी भी तरह से रखने की कोशिश करते हैं। इसीलिए किसी भी पार्टी के राज में मुसलमानों की बुनियादी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं देखा गया। यदि राजनीतिक पार्टयिां ये मानकर चलती हैं कि मुसलमान केवल धर्म के इर्द-गिर्द सोचता है तो जाहिर है, वह उनके बारे में लगातार इसी नजरिए से न केवल सोचेगा बल्कि वोट बैंक को उसी रूप में बनाए रखने के तरीकों को अपने एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहने की कोशिश करेगा। यह बात इस सवाल के साथ जुड़ती है कि संसदीय राजनीति में आखिर मुसलमानों को धार्मिंकता के इर्द-गिर्द सोचने वाले वोट बैंक से बाहर क्यों नहीं निकाला जा सका। जो पार्टियां खुद को धर्म निरेपक्ष कहती हैं, उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों को भरपूर मौका दिया कि वे मुसलमानों के शासन की सरपरस्ती का प्रचार कर अपनी ताकत को बढ़ा सकें। इस देश में कांग्रेस को मुसलमानों की सबसे बड़े हितैषी के रूप में देखा गया, लेकिन जब अध्ययन किया गया तो यह बात सामने आई कि देश में किसी भी स्तर पर विकास में मुसलमानों की भागीदारी बेहद कम है। हज के लिए सरकारी पैसे और मुसलमानों के त्योहार में सरकारी मशीनरी की उदारता के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति अपने को प्रासंगिक बनाए रही। यानी जो मूल सवाल वास्तविक प्रतिनिधित्व का था, उसे छोड़कर सब कुछ चलता रहा। एक तरफ मुसलमान समर्थक बनकर तो दूसरी तरफ मुसलमान विरोधी होकर एक ही तरह से दोनों तरह की राजनीति फलती- फूलती रही। साठ वर्षो की संसदीय राजनीति में मुसलमानों के पास कोई मुस्लिम नेतृत्व नहीं है। संसदीय व्यवस्था में नेतृत्व का अर्थ इस बात में निहित होता है कि वह अपने समुदाय को एक बड़े दायरे की तरफ ले जाए। लेकिन जब नेतृत्व की स्थितियां ही नहीं बनेंगी या नेतृत्व को तैयार ही नहीं किया जाएगा तो वह समाज व समुदाय कहां जाएगा! सवाल यह है कि समाज व समुदाय के लिए स्थितियां और परिस्थितियां किस तरह की तैयार की जा रही हैं। यदि जमीनी स्तर पर मूल्यांकन किया जाए तो यह बात साबित होती है कि बहुसंख्यक आधारित सांप्रदायिकता ज्यादा कट्टर हुई है। लेकिन आमतौर पर आतंकवादी गतिविधियों के नाम पर जिस तरह गिरफ्तारियों का सिलसिला चलता रहा है, उससे संदेश निकाला जाता रहा है कि मुसलमानों में कट्टरता बढ़ी है। जबकि फिर याद कर लें कि उनके बीच उनका कोई नेतृत्व विकसित नहीं हुआ है। संसदीय व्यवस्था में वाजिब नेतृत्व के अभाव के क्या असर होते हैं, इस पहलू का अध्ययन किया जाए तो मुस्लिम समुदाय में नेतृत्व की चुनौती के प्रश्न को समझा जा सकेगा।



Rashtirya Sahara National Edition 4-10-2012 Islamic Duniya ,Pej -10

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