Friday, December 31, 2010

पाकिस्तान की बुर्कानशीं महिलाएं बेच रहीं पिज्जा-बर्गर

 पाकिस्तान में भयंकर आर्थिक तंगी के चलते एक आदमी की कमाई में घर चलाना मुश्किल हो गया है। इसके चलते महिलाएं नौकरी करने के लिए मजबूर हैं। यहां पर कई मध्यमवर्गीय महिलाओं को आजकल मैक डोनाल्ड और केएफसी जैसे फूड आउटलेट्स पर काम करते देखा जा रहा है। इन्हीं में से एक है 21 वर्षीया सुल्ताना। उन्होंने मैक डोनाल्ड में कैशियर की नौकरी के लिए मई में अपना घर छोड़ दिया। भाई के कड़े विरोध के चलते सुल्ताना को यह कदम उठाना पड़ा। उसका रूढि़वादी भाई रेस्त्रां की यूनीफॉर्म पहनने के लिए सुल्ताना को गाली देता था। अब वो अपनी यूनीफॉर्म को छिपाने के लिए बुर्का पहनकर काम पर जाती है। यहीं नहीं हर महीने अपने घर पर सौ डॉलर (करीब साढ़े चार हजार रुपये) भेजती है। सुल्ताना एक बानगी है। उसके जैसी सैकड़ों लड़कियां अपने घर चलाने के लिए नौकरी करने से गुरेज नहीं कर रहीं। केएफसी पाकिस्तान के कार्यकारी प्रमुख रफीक रंगूनवाला का कहना है कि महिलाओं की नौकरी केवल आर्थिक वजह से ही नहीं बल्कि देश की भी जरूरत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले साल तक उनके आउटलेट्स में महिला कर्मचारियों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। उन्होंने कहा, अगर हम अपने यहां महिला कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ाते तो पाकिस्तान कभी तरक्की नहीं कर पाएगा और हमारी गिनती हमेशा तीसरी दुनिया के देश में ही होगी। यहां मैकडोनाल्ड, केएफसी और सुपरमार्केट जैसी जगहों पर काम करने वाली महिलाओं की संख्या 2006 से अब तक चार गुना बढ़ी है। मगर यहां के पुरुषों की मानसिकता अब भी दकियानूसी है। वे महिलाओं के काम करने के खिलाफ हैं। हाल ही में नौकरी शुरू करने वाली सौ से ज्यादा महिलाओं ने लगातार मानसिक प्रताड़ना दिए जाने की भी शिकायत की है। कई बार उन्हें ग्राहकों के गुस्से का भी शिकार होना पड़ता है। सुल्ताना ने कहा, अगर मैं नौकरी छोड़ दू तो घर में सब खुश हो जाएंगे लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर मेरे घर पर पड़ेगा।

Tuesday, December 28, 2010

सरकारी कर्मी भी थे पत्थरबाजों के हमराज

सोपोर वादी में पूरे साल उथल-पुथल मचाए रखने वाले पत्थरबाजों को सिर्फ लश्कर या हुर्रियत कांफ्रेंस ही नहीं, बल्कि कई सरकारी कर्मचारियों का भी समर्थन मिला हुआ था। यह कर्मचारी उनकी मदद करते हुए उन्हें देश विरोधी हिंसक प्रदर्शनों के लिए उकसाते थे। दैनिक जागरण पहले ही हिंसक प्रदर्शनों में मस्जिदों के इमाम, हुर्रियत कांफ्रेंस, आतंकी संगठनों व सरकारी कर्मचारियों की संलिप्तता उजागर कर चुका है। इस पर सोमवार को उत्तरी कश्मीर रेंज के डीआइजी मुनीर खान ने भी मुहर लगा दी। उन्होंने बताया कि इस साल जनवरी में पथराव का जो सिलसिला शुरू हुआ वह पूरी तरह लश्कर, हरकत-उल-मुजाहिदीन और हुर्रियत कांफ्रेंस के गिलानी गुट की साजिश थी। इसमें कई सरकारी कर्मचारी भी शामिल रहे। पथराव में शामिल युवकों को 400 रुपये रोजाना मिलते थे। यह पैसा लश्कर कमांडर अब्दुल्ला उन्नी और हरकत-उल-मुजाहिदीन का कमांडर कलीमुल्ला और हुर्रियत कांफ्रेंस उपलब्ध कराते थे। उन्होंने बताया कि कुख्यात पत्थरबाज फिरदौस उर्फ बीरबल ने कई अहम खुलासे किए हैं। इसके आधार पर हुर्रियत के गिलानी गुट के गुलाम मोहम्मद तांत्रे समेत चार लोग पकडे़ जा चुके हैं। इसके अलावा अशरफ मलिक और बशीर अहमद तेली नामक दो सरकारी कर्मी भी उनका साथ देते रहे हैं।अशरफ पकड़ा जा चुका है जबकि सीएपीडी में कार्यरत बशीर और गिलानी का खास गुलाम हसन मीर उर्फ छोटा गिलानी फरार हैं। डीआइजी ने बताया कि सोपोर में फिलहाल 15-20 कुख्यात आतंकी छिपे हैं। इस साल यहां कुल 26 आतंकी मारे गए जबकि एक विदेशी समेत 12 आतंकी जिंदा पकड़े गए। इनके कब्जे से 30 एसाल्ट राइफलें, नौ पिस्तौल, दो हजार एके कारतूस, छह यूबीजीएल, तीन दर्जन से ज्यादा हथगोले, तीन सेटेलाइट फोन, एक सिलेंडर आईईडी समेत भारी मात्रा में गोला-बारूद बरामद किया गया

पत्थरबाजी के लिए पैसा देते थे व्यापारी

इस्लाम के नाम पर कश्मीर में जेहाद, हिंसक प्रदर्शनों और पथराव के लिए पैसा न सिर्फ पाक और अन्य मुल्कों से आया, बल्कि व्यापारिक संगठनों ने भी इसमें योगदान दिया। पैसा जमा करने की जिम्मेदारी हुर्रियत की थी, जिस पर आतंकी संगठन पूरी नजर रखते थे। सुरक्षा एजेंसियां अभी पत्थरबाजी के अर्थशास्त्र का गणित जोड़ रही हैं। लेकिन सूत्रों की मानें तो जून से अक्टूबर के दौरान अलगाववादियों और आतंकी संगठनों ने स्थानीय स्तर पर ही तीन करोड़ रुपये जुटाए। हाल ही में पकड़े गए मसर्रत आलम ने भी पूछताछ में स्वीकार किया कि पत्थरबाजों को देने के लिए 40 लाख रुपये गिलानी ने दिए थे। आइजीपी कश्मीर एसएम सहाय के अनुसार ज्यादातर पैसा उत्तरी कश्मीर और श्रीनगर के आस-पास के इलाकों से जुटाया गया। शोपियां के वन तस्करों और नशीले पदार्थाें के कारोबारियों ने भी इसमें योगदान दिया। तहरीके हुर्रियत के नेता पैसा जमा करते थे और न देने वालों पर आतंकियों से दबाव डलवाते थे। लश्कर-ए-तैयबा व हुर्रियत कांफ्रेंस ने सोपोर फ्रूट मंडी के व्यापारियों से ही 18 लाख रुपये जुटाए। इसके अलावा प्रत्येक आरा मिल मालिक से 5 हजार रुपये प्रतिमाह वसूले जाते थे। यहां लगभग 150 आरा मिल हैं। दक्षिण कश्मीर के डीआइजी शफकत बटाली ने बताया कि नशीले पदार्थाें की खेती और जंगलों की अवैध कटाई में लगे माफिया ने भी पत्थरबाजी के लिए खूब पैसा दिया। दक्षिण कश्मीर में 60 से 70 लाख रुपये जुटाए गए। मदद का चुकाते हैं पूरा मोल : पत्थरबाजी के लिए चंदा जमा करने वाले व्यापारियों, वन तस्करों और नशीले पदार्थाें के कारोबारियों को कोई मुश्किल नहीं हुई। आतंकी-अलगाववादियों ने मदद का पूरा मोल चुकाया। सोपोर फ्रूट मंडी जब हिंसक प्रदर्शनों और पथराव के चलते बंद होने लगी तो लश्कर कमांडर अब्दुल्ला उन्नी ने पोस्टर लगवाकर मंडी को खुलवाया। हुर्रियत व ओजीडब्ल्यू ने भी फ्रूट मंडी व आरा मिलों को पत्थरबाजों के कहर से बचाया। बडगाम, बांडीपोर, शोपियां और कुपवाड़ा में वन तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए जब-जब पुलिस या वनकर्मी गए तो आतंकियों ने उनकी मदद की। वनकर्मियों को कई बार जान बचाकर भागना पड़ा। इसी तरह पुलवामा, अवंतीपोरा, त्राल, काजीगुंड और सुंबल में नशीले पदार्थाें की खेती करने वालों को भी आतंकियों ने संरक्षण दिया।

Monday, December 27, 2010

आसिया की रिहाई को ईसाइयों का अभियान तेज

लाहौर (एजेंसी)। पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून में संशोधन नहीं करने की धार्मिक पार्टियों और समूहों के दबाव के बीच ईसाई समूहों ने उस ईसाई महिला की रिहाई के लिए सभी संभव कदम उठाने की प्रतिबद्धता जतायी है जिसे पैगम्बर मोहम्मद का पअमान करने के लिए मौत सजा सुनायी गई है। पांच बच्चों की मां 45 वर्षीय आसिया बीबी को ईशनिंदा का दोषी करार देते हुए मौत की सजा के मद्देजनर इस विवादास्पद कानून को रद्द करने अथवा इसमें संशोधन करने को लेकर बहस शुरू हो गई है, लेकिन कट्टरपंथी समूहों ने कट्टरपंथी धार्मिक पार्टियों और समूहों ने चेतावनी दी है कि यदि विवादास्पद ईशनिंदा कानून में संशोधन किया गया अथवा ईसाई महिला आसिया बीबी की मौत की सजा को बदलने की कोशिश की गई तो पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। पंजाब प्रांत की निची अदालत में आसिया बीबी को सजा सुनाए जाने के बाद पहली बार अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय का नेतृत्व करने वाले समूहों ने शनिवार को यहां विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हुए सरकार से ईशनिंदा के लिए मौत की सजा को वापस लेने की मांग की है। क्रि समस के दिन आयोजित इस रैली में बड़ी संख्या में ईसाई और अधिकार कार्यकर्ता शामिल हुए। पाकिस्तान ईसाई लोकतांत्रिक गठबंधन (पीसीडीए) के बैनर तले 10 संगठन शामिल हुए। इसमें शामिल प्रदर्शनकारियों के हाथों में ईशनिंदा कानून की धारा 295 बी को रद्द करने की मांग वाले बैनर थे।

Thursday, December 23, 2010

जारी करो फतवा

बात-बात में फतवा देने वाले मौलानाओं/इमामों से मुसलमान औरतें गुजारिश करती हैं कि वे फैलती दहेज प्रथा और मादा भ्रूण  हत्या के खिलाफ आवाज बुलंद करें और समाज में फैल रही कुरीतियों से औरतों को बचाएं। इस्लाम में इस तरह की सामाजिक बुराइयों की पारंपरिक रूप से कोई जगह नहीं रही है। आधुनिक लड़कियां जो पढ़-लिख रही हैं, इन बुराइयों से नयी पीढ़ी को बचाना चाहती हैं। फिरदौस खान की रिपोर्ट
दहेज के बढ़ रहे मामलों के कारण मध्य प्रदेश में 60 फीसद, गुजरात में 50 फीसद और आंध््रा प्रदेश में 40 फीसद लड़कियों ने माना कि दहेज के बिना उनकी शादी होना मुश्किल हो गया है।
हिन्दुस्तानी मुसलमानों में दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयां तेजी से पांव पसार रही हैं। खास बात यह है कि यह सब आधुनिकता के नाम पर हो रहा है। हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम वाल्देन लड़की के गुणों से ज्यादा दहेज को तरजीह (प्राथमिकता) दे रहे हैं। एक तरफ जहां बहुसंख्यक तबका दहेज और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा है, वहीं शरीयत के अलम्बरदार मुस्लिम समाज में फैलती इन बुराइयों के मुद्दे पर आंखें मूंदे बैठे हैं। काबिलेगौर है कि दहेज की वजह से मुस्लिम लड़कियों को उनकी पैतृक संपत्ति के हिस्से से भी अलग रखा जा रहा है। इसके लिए तर्क दिया जा रहा है कि उनके विवाह और दहेज में काफी रकम खर्च की गई है, इसलिए अब जायदाद में उनका कोई हिस्सा नहीं रह जाता। खास बात यह भी है कि लड़की के मेहर की रकम तय करते वक्त सैकड़ों साल पुरानी रिवायतों का वास्ता दिया जाता है, जबकि दहेज लेने के लिए शरीयत को ताक पर रखकर बेशर्मी से मुंह खोला जाता है। उत्तर प्रदेश में तो हालत यह है कि शादी की बातचीत शुरू होने के साथ ही लड़की के परिजनों की जेब कटनी शुरू हो जाती है। जब लड़के वाले लड़की के घर जाते हैं तो सबसे पहले देखा जाता है कि नाश्ते में कितनी प्लेटें रखी गई हैं, यानी कितने तरह की मिठाई, सूखे मेवे और फल रखे गए हैं। इतना ही नहीं, दावतें भी मुग्रे की ही चल रही हैं, यानी चिकन बिरयानी, चिकन कोरमा वगैरह। फिलहाल 15 से लेकर 20 प्लेटें रखना आम हो गया है और यह सिलसिला शादी तक जारी रहता है। शादी में दहेज के तौर पर जेबरात, फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, कीमती कपड़े और तांबे-पीतल के भारी बर्तन दिए जा रहे हैं। इसके बावजूद, दहेज में कार और मोटर साइकिल मांगी जा रही है। भले ही, लड़के की इतनी हैसियत न हो कि वह तेल का खर्च भी उठा सके। जो वाल्देन अपनी बेटी को दहेज देने की हैसियत नहीं रखते, उनकी बेटियां कुंवारी बैठी हैं। मुरादाबाद की किश्वरी उम्र के 45 वसंत देख चुकी हैं, लेकिन अभी तक उनकी हथेलियों पर सुहाग की मेंहदी नहीं सजी। वह कहती हैं कि मुसलमानों में लड़के वाले ही रिश्ता लेकर आते हैं, इसलिए उनके वाल्देन रिश्ते का इंतजार करते रहे। वे बेहद गरीब हैं, इसलिए रिश्तेदार भी बाहर से ही दुल्हनें लाए। अगर उनके वाल्देन दहेज देने की हैसियत रखते तो शायद आज वह अपनी ससुराल में होतीं और उनका अपना घर-परिवार होता। उनके अब्बू कई साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गए। घर में तीन शादीशुदा भाई, उनकी बीवियां और उनके बच्चे हैं। सबकी अपनी खुशहाल जिंदगी है। किश्वरी दिनभर बीड़ियां बनाती हैं और घर का कामकाज करती हैं। अब बस यही उनकी जिंदगी है। उनकी अम्मी को हर वक्त यही फिक्र सताती है कि उनके बाद बेटी का क्या होगा, यह अकेली किश्वरी का किस्सा नहीं है। मुस्लिम समाज में ऐसी हजारों लड़कियां हैं, जिनकी खुशियां दहेज रूपी लालच निगल चुका है। राजस्थान के बाड़मेर की रहने वाली आमना के शौहर की मौत के बाद पिछले साल 15 नवम्बर को उनका दूसरा निकाह बीकानेर के शादीशुदा उस्मान के साथ हुआ, जिसके पहली पत्‍नी से तीन बच्चे भी हैं। आमना का कहना है कि उसके वाल्देन ने दहेज के तौर पर उस्मान को 10 तोले सोने, एक किलो चांदी के जेवर, कपड़े और घरेलू सामान दिया था। निकाह के कुछ बाद ही उसके शौहर और उसकी दूसरी बीवी जेबुन्निसा कम दहेज के लिए उसे तंग करने लगे। यहां तक कि उसके साथ मारपीट भी की जाने लगी। वे उससे एक स्कॉर्पियो गाड़ी और दो लाख रु पए और मांग रहे थे। आमना कहती हैं कि उनके वाल्देन इतनी महंगी गाड़ी और इतनी बड़ी रकम देने के काबिल नहीं हैं। आखिर जुल्मोसितम से तंग आकर आमना को पुलिस की शरण लेनी पड़ी। राजस्थान के गोटन की रहने वाली गुड्डी का करीब एक साल पहले सद्दाम से निकाह हुआ था। शादी के वक्त दहेज भी दिया गया था, इसके बावजूद उसका शौहर और उसके ससुराल के अन्य सदस्य दहेज के लिए उसे तंग करने लगे। उसके साथ मारपीट की जाती। जब उसने और दहेज लाने से इंकार कर दिया तो पिछले साल 18 अक्टूबर को उसके ससुरालवालों ने मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया। अब वो अपने मायके में है। मुस्लिम समाज में आमना और गुड्डी जैसी हजारों औरतें हैं, जिनका परिवार दहेज की मांग की वजह से उजड़ चुका है।यूनिसेफके सहयोग से जनवादी महिला समिति द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, दहेज के बढ़ रहे मामलों के कारण मध्य प्रदेश में 60 फीसद, गुजरात में 50 फीसद और आंध््रा प्रदेश में 40 फीसद लड़कियों ने माना कि दहेज के बिना उनकी शादी होना मुश्किल हो गया है। दहेज को लेकर मुसलमान एकमत नहीं हैं। जहां कुछ मुसलमान दहेज को गैर इस्लामी करार देते हैं, वहीं कुछ मुसलमान दहेज को जायज मानते हैं । उनका तर्क है कि हजरत मुहम्मद साहब ने भी तो अपनी बेटी फातिमा को दहेज (कुछ सामान) दिया था। खास बात यह है कि दहेज की हिमायत करने वाले मुसलमान भूल जाते हैं कि पैगंबर ने अपनी बेटी को विवाह में बेशकीमती चीजें नहीं दी थीं। इसलिए उन चीजों की दहेज से तुलना नहीं की जा सकती। यह उपहार के तौर पर थीं। उपहार मांगा नहीं जाता, बल्कि देने वाले पर निर्भर करता है कि वह उपहार के तौर पर क्या देता है, जबकि दहेज के लिए लड़की के वाल्देन को मजबूर किया जाता है। लड़की के वाल्देन अपनी बेटी का घर बसाने के लिए हैसियत से बढ़कर दहेज देते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े। मुसलमानों में बढ़ती दहेज प्रथा के कारण कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराई भी पनप रही है। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक, देश की कुल आबादी में 13.4 फीसद मुसलमान हैं और लिंगानुपात 936 है। मुरादाबाद की शकीला कहती हैं कि उनके ससुराल वाले बेटा चाहते थे, इसलिए हर बार बच्चे के लिंग की जांच कराते और लड़की होने पर गर्भपात करवा दिया जाता है। उनके चार बेटे हैं, इन चार बेटों के लिए वह अपनी पांच बेटियों को खो चुकी हैं। उन्हें इस बात का बेहद दुख है। लाचारी जाहिर करते हुए वह कहती हैं कि एक औरत कर भी क्या सकती है। इस मर्दाने समाज में औरत के जज्बात की कौन कद्र करता है। मुसलमानों में लिंग जांचने और कन्या भ्रूण हत्या को लेकर दारूल उलूम नदवुल उलमा (नदवा) और फिरंगी महल के दारूल इता फतवे जारी कर चुके हैं। फतवों में कहा गया था कि शरीयत गर्भ का लिंग आधारित जांच की इजाजत नहीं देती, इसलिए यह नाजायज है। ऐसा करने से माता-पिता और इस घृणित कृत्य में शामिल लोगों को गुनाह होगा। काबिलेगौर बात यह है कि इस तरह के फतवों का प्रचार-प्रसार नहीं हो पाता। ऐसे फतवे कभी-कभार ही आते हैं, जबकि बेतुके फतवों की बाढ़ आई रहती है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले काफी अरसे से आ रहे ज्यादातर फतवे महज मनोरंजन का साधन ही साबित हो रहे हैं। भले ही, मिस्र में जारी मुस्लिम महिलाओं द्वारा कुंवारे पुरुष सहकर्मिंयों को अपना दूध पिलाने का फतवा हो या फिर महिलाओं के नौकरी करने के खिलाफ जारी फतवा। अफसोस है कि मजहब की नुमाइंदगी करने वाले लोग समाज से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते। हालांकि इसी साल मार्च में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा पर चिंता जाहिर करते हुए इसे रोकने के लिए मुहिम शुरू करने का फैसला किया था। बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य जफरयाब जिलानी के मुताबिक, मुस्लिम समाज में शादियों में फिजूलखर्ची रोकने के लिए इस बात पर भी सहमति जताई गई थी कि निकाह सिर्फ मस्जिदों में ही करवाया जाए और लड़के वाले अपनी हैसियत के हिसाब से वलीमें करें। साथ ही, इस बात का भी ख्याल रखा जाए कि लड़की वालों पर खर्च का ज्यादा बोझ न पड़े, जिससे गरीब परिवारों की लड़कियों की शादी आसानी से हो सके। इस्लाह-ए- मुआशिरा (समाज सुधार) की मुहिम पर चर्चा के दौरान बोर्ड की बैठक में यह भी कहा गया कि निकाह पढ़ाने से पहले उलेमा वहां मौजूद लोगों को बताएं कि निकाह का सुन्नत तरीका क्या है और इस्लाम में यह कहा गया है कि सबसे अच्छा निकाह वही है जिसमें सबसे कम खर्च हो। साथ ही, इस मामले में मस्जिदों के इमामों को भी प्रायश्चित किए जाने पर जोर दिया गया था सिर्फ बयानबाजी से कुछ होने वाला नहीं है। दहेज और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने की जरूरत है। इस मामले में मस्जिदों के इमाम अहम किरदार अदा कर सकते हैं। जुमे की नमाज के बाद इमाम नमाजियों से दहेज न लेने की अपील करें और उन्हें बताएं कि ये बुराइयां किस तरह समाज के लिए नासूर बनती जा रही है। इसके अलावा, औरतों को भी जागरूक करने की जरूरत है, क्योंकि देखने में आया है कि दहेज का लालच मर्दाें से ज्यादा औरतों को होता है। अफसोस की बात तो यह भी है कि मुस्लिम समाज अनेक हिस्सों में बंट गया है। अमूमन सभी तबके खुद को असली मुसलमान साबित करने में ही जुटे रहते हैं और मौजूदा समस्याओं पर उनका ध्यान जाता ही नहीं है। बहरहाल, यही कहा जा सकता है कि अगर मजहब के ठेकेदार कुछ सार्थक काम भी कर लें, तो मुसलमान औरतों का कुछ तो भला हो ही जाएगा। 

Sunday, December 19, 2010

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने उठाया धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा

राम जन्मभूमि विवाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में समानता का मुद्दा उठाया है। वक्फ बोर्ड ने कहा है कि संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता में सभी धर्मो को बराबरी पर रखा गया है, इसे सिर्फ हिंदुओं की आस्था और विश्वास के संदर्भ में परिभाषित करना गलत है। वक्फ बोर्ड ने यह दलील सुप्रीमकोर्ट में दाखिल अपील में दी है और हिंदुओं की आस्था और विश्वास के आधार पर अयोध्या में केंद्रीय गुंबद के नीचे के स्थान को जन्म स्थान घोषित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त करने की मांग की है। यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कहा है राम जन्मस्थान घोषित करते समय हिंदुओं की आस्था और विश्वास को संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत तरजीह दी गई है, लेकिन ऐसा करते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में दिया गया यह मौलिक अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है। वकील एम आर शमशाद की ओर से तैयार की गई अपील में कहा गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला देते समय इस संवैधानिक अधिकार पर ठीक से विचार नहीं किया है। दूसरे धर्म के अनुयायियों की आस्था और विश्वास नजरअंदाज करने से संविधान में उन्हें मिले धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन होता है। वक्फ बोर्ड ने इलाहबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल के फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि उन्होंने अपने फैसले में हिंदू धर्म की आस्था और विश्वास से जुड़ी सामग्री पर चर्चा की है और वेद, पुराण, इतिहास व हिन्दू दर्शन के विभिन्न अंशों को फैसले में उद्धृत किया है। दूसरे पक्षकार के विश्वास, आस्था और इतिहास पर ध्यान दिए बगैर एक खास धर्म के लोगों को एक तरफा समर्थन किया गया है। याचिका में वफ्फ बोर्ड ने इस आधार पर केंद्रीय गुंबद के नीचे के स्थान को राम जन्मभूमि घोषित करने का फैसला निरस्त किया जाए। वक्फ बोर्ड ने अपनी 206 पृष्ठ की विस्तृत अपील में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए विवादित जगह को मस्जिद घोषित किये जाने की मांग की है।