Tuesday, December 28, 2010

पत्थरबाजी के लिए पैसा देते थे व्यापारी

इस्लाम के नाम पर कश्मीर में जेहाद, हिंसक प्रदर्शनों और पथराव के लिए पैसा न सिर्फ पाक और अन्य मुल्कों से आया, बल्कि व्यापारिक संगठनों ने भी इसमें योगदान दिया। पैसा जमा करने की जिम्मेदारी हुर्रियत की थी, जिस पर आतंकी संगठन पूरी नजर रखते थे। सुरक्षा एजेंसियां अभी पत्थरबाजी के अर्थशास्त्र का गणित जोड़ रही हैं। लेकिन सूत्रों की मानें तो जून से अक्टूबर के दौरान अलगाववादियों और आतंकी संगठनों ने स्थानीय स्तर पर ही तीन करोड़ रुपये जुटाए। हाल ही में पकड़े गए मसर्रत आलम ने भी पूछताछ में स्वीकार किया कि पत्थरबाजों को देने के लिए 40 लाख रुपये गिलानी ने दिए थे। आइजीपी कश्मीर एसएम सहाय के अनुसार ज्यादातर पैसा उत्तरी कश्मीर और श्रीनगर के आस-पास के इलाकों से जुटाया गया। शोपियां के वन तस्करों और नशीले पदार्थाें के कारोबारियों ने भी इसमें योगदान दिया। तहरीके हुर्रियत के नेता पैसा जमा करते थे और न देने वालों पर आतंकियों से दबाव डलवाते थे। लश्कर-ए-तैयबा व हुर्रियत कांफ्रेंस ने सोपोर फ्रूट मंडी के व्यापारियों से ही 18 लाख रुपये जुटाए। इसके अलावा प्रत्येक आरा मिल मालिक से 5 हजार रुपये प्रतिमाह वसूले जाते थे। यहां लगभग 150 आरा मिल हैं। दक्षिण कश्मीर के डीआइजी शफकत बटाली ने बताया कि नशीले पदार्थाें की खेती और जंगलों की अवैध कटाई में लगे माफिया ने भी पत्थरबाजी के लिए खूब पैसा दिया। दक्षिण कश्मीर में 60 से 70 लाख रुपये जुटाए गए। मदद का चुकाते हैं पूरा मोल : पत्थरबाजी के लिए चंदा जमा करने वाले व्यापारियों, वन तस्करों और नशीले पदार्थाें के कारोबारियों को कोई मुश्किल नहीं हुई। आतंकी-अलगाववादियों ने मदद का पूरा मोल चुकाया। सोपोर फ्रूट मंडी जब हिंसक प्रदर्शनों और पथराव के चलते बंद होने लगी तो लश्कर कमांडर अब्दुल्ला उन्नी ने पोस्टर लगवाकर मंडी को खुलवाया। हुर्रियत व ओजीडब्ल्यू ने भी फ्रूट मंडी व आरा मिलों को पत्थरबाजों के कहर से बचाया। बडगाम, बांडीपोर, शोपियां और कुपवाड़ा में वन तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए जब-जब पुलिस या वनकर्मी गए तो आतंकियों ने उनकी मदद की। वनकर्मियों को कई बार जान बचाकर भागना पड़ा। इसी तरह पुलवामा, अवंतीपोरा, त्राल, काजीगुंड और सुंबल में नशीले पदार्थाें की खेती करने वालों को भी आतंकियों ने संरक्षण दिया।

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