Sunday, December 19, 2010

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने उठाया धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा

राम जन्मभूमि विवाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में समानता का मुद्दा उठाया है। वक्फ बोर्ड ने कहा है कि संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता में सभी धर्मो को बराबरी पर रखा गया है, इसे सिर्फ हिंदुओं की आस्था और विश्वास के संदर्भ में परिभाषित करना गलत है। वक्फ बोर्ड ने यह दलील सुप्रीमकोर्ट में दाखिल अपील में दी है और हिंदुओं की आस्था और विश्वास के आधार पर अयोध्या में केंद्रीय गुंबद के नीचे के स्थान को जन्म स्थान घोषित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त करने की मांग की है। यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कहा है राम जन्मस्थान घोषित करते समय हिंदुओं की आस्था और विश्वास को संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत तरजीह दी गई है, लेकिन ऐसा करते समय यह ध्यान नहीं रखा गया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में दिया गया यह मौलिक अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है। वकील एम आर शमशाद की ओर से तैयार की गई अपील में कहा गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला देते समय इस संवैधानिक अधिकार पर ठीक से विचार नहीं किया है। दूसरे धर्म के अनुयायियों की आस्था और विश्वास नजरअंदाज करने से संविधान में उन्हें मिले धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन होता है। वक्फ बोर्ड ने इलाहबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल के फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि उन्होंने अपने फैसले में हिंदू धर्म की आस्था और विश्वास से जुड़ी सामग्री पर चर्चा की है और वेद, पुराण, इतिहास व हिन्दू दर्शन के विभिन्न अंशों को फैसले में उद्धृत किया है। दूसरे पक्षकार के विश्वास, आस्था और इतिहास पर ध्यान दिए बगैर एक खास धर्म के लोगों को एक तरफा समर्थन किया गया है। याचिका में वफ्फ बोर्ड ने इस आधार पर केंद्रीय गुंबद के नीचे के स्थान को राम जन्मभूमि घोषित करने का फैसला निरस्त किया जाए। वक्फ बोर्ड ने अपनी 206 पृष्ठ की विस्तृत अपील में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए विवादित जगह को मस्जिद घोषित किये जाने की मांग की है।

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