राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग के प्रमुख न्यायमूर्ति एमएसए सिद्दीकी ने शिक्षा में मुस्लिम बच्चों को आरक्षण दिए जाने की पैरवी करते हुए कहा है कि अल्पसंख्यक संस्थानों की उपेक्षा सरकार की ओर से नहीं होती, बल्कि लोग धार्मिक शिक्षण संस्थानों की आड़ में सरकारी सुविधाओं का बेजा इस्तेमाल करते हैं। पिछले दिनों जामिया मिलिया इस्लामिया को अल्पसंख्यक संस्थान की मान्यता देने संबंधी फैसला सुनाने वाले सिद्दीकी का मानना है कि देश में मुस्लिम बच्चों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। सिद्दीकी ने कहा, मेरा मानना है कि मुस्लिम बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दिया जाना चाहिए। इससे उन्हें उन संस्थानों में पहुंचने का मौका मिलेगा, जहां वे किसी कारणवश नहीं पहुंच पाते। शिक्षा में आरक्षण मिलने से मुस्लिम युवक-युवतियां देश के विकास में अधिक भागीदारी कर सकेंगे। इस आरोप पर कि सरकार की ओर से अल्पसंख्यक संस्थानों की उपेक्षा होती है उन्होंने कहा, सरकार की ओर से अल्पसंख्यक संस्थानों की उपेक्षा नहीं की जाती, बल्कि इन समुदायों के लोग ही सरकारी सुविधाओं का बेजा इस्तेमाल करते हैं। मुझे इस बारे में शिकायतें मिली हैं कि 80 फीसदी मदरसे ऐसे हैं, जो सिर्फ कागजों पर चलते हैं, लेकिन इनके नाम पर लोग सरकार से फायदा उठाते हैं। उन्होंने कहा, सरकार की ओर से दी जाने वाली सुविधाओं का दुरुपयोग करके कुछ लोग खुद को और अपने लोगों को फायदा पहुंचाते हैं, लेकिन इससे समुदाय के बच्चों का नुकसान होता है। सरकार जानती है, लेकिन इसे बर्दाश्त कर रही है। जामिया को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान घोषित किए जाने पर उठ रही चिंताओं को सिद्दीकी ने आधारहीन करार दिया। उन्होंने कहा, यह कहना गलत है कि अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में मान्यता मिलने से जामिया की छवि पर कोई असर पड़ेगा। यह विश्वविद्यालय वर्षो से एक पंथनिरपेक्ष संस्थान रहा है और आगे भी उसकी यही छवि बनी रहेगी। उन्होंने कहा, हमारे इस फैसले से दुनिया भर में भारत की पंथनिरपेक्ष छवि को मजबूती मिली है। इससे यह संदेश गया है कि भारत में लोकतंत्र इतना मजबूत है कि वहां अल्पसंख्यक संस्थानों को उनका पूरा हक मिल रहा है। मालूम हो कि जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिल जाने के बाद अब वहां 50 फीसदी सीटें अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी|
Monday, February 28, 2011
Saturday, February 26, 2011
वस्तानवी के बाद मौलाना अजमल पर निशाना
दारुल उलूम के मोहतमिम गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के इस्तीफे की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि अब इस्तीफा एपीसोड की इस फेहरिस्त में इस्लामी जगत की एक और नामचीन हस्ती मौलाना अजमल को शामिल कर लिया गया है। शूरा के सम्मानित सदस्य पर आरोप है कि दिल्ली में मीडिया के सामने उन्होंने मजलिसे शूरा को सियासी शूरा कहा है। इस बाबत तंजीम मुहिब्बाने दारुल उलूम की बैठक में अजमल के इस्तीफे की मांग की गई। बैठक में शूरा के सदस्य एवं असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष मौलाना बदरुद्दीन अजमल पर तीखे प्रहार किए गए। बैठक को मौलाना मुहम्मद नसर इलाही, सलीम उस्मानी ने कहा कि मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने 23 फरवरी को मजलिस-ए-शूरा को सियासी शूरा कहकर शूरा के सदस्यों का अपमान किया है। उन्हें पूरी कौम से माफी मांगनी चाहिए। हाजी अनस व चौधरी माजिद ने कहा कि मौलाना अजमल द्वारा मजलिस-ए-शूरा को बिना वजह निशाना बनाया जाना उचित नहीं है क्योंकि 23 फरवरी को शूरा द्वारा लिए गए फैसले का सभी ने एक स्वर में स्वागत किया है। वस्तानवी पर बरसे तोगडि़या अहमदाबाद, जासं : दारूल उलूम देवबंद के साथ देश के उदारवादी मुस्लिमों का एक धड़ा भले ही मौलाना गुलाम मौहम्मद वस्तानवी के देवबंद का कुलपति बनने का समर्थन करता हो, लेकन विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण तोगडि़या उन्हें कट्टरवादी मानसिकता का व्यक्ति बताते हुए देश से बाहर कर देना चाहते हैं। वडोदरा में शुक्रवार को तोगडि़या ने कहा कि मौलाना वस्तानवी संप्रदायवादी हैं तथा गुजरात में विकास की बात करके वह यहां के मुस्लिम समुदाय को कट्टर बनाना चाहते हैं|
Tuesday, February 15, 2011
महत्वपूर्ण मोड़ पर मुस्लिम
गुजरात के संदर्भ में वस्तानवी के विचारों को भारतीय मुस्लिम समाज के लिए महत्वपूर्ण घटना मान रहे हैं बलबीर पुंज
उत्तर प्रदेश स्थित दारूल उलूम देवबंद के कुलपति गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को हटाने के लिए पिछले कई दिनों से कट्टरपंथी सक्रिय हैं। गतिरोध खत्म करने के लिए पिछले दिनों आहूत बैठक में दो गुटों के बीच हाथापाई हुई। मजलिस ए शूरा आगामी 23 फरवरी को वस्तानवी के भविष्य का फैसला करने वाली है, परंतु वस्तानवी का आखिर गुनाह क्या है? कट्टरपंथियों के अनुसार कुलपति बनने के एक सप्ताह के अंदर ही वस्तानवी ने दो गुनाह किए। उन्होंने महाराष्ट्र के एक सार्वजनिक समारोह में बतौर मुख्य अतिथि युवकों में गणेश की मूर्ति वितरित की। दूसरा, उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात की कायापलट किए जाने का संज्ञान लेते हुए कहा कि गुजरात की प्रगति में मुसलमान भी बराबर के भागीदार हैं। दारूल उलूम, देवबंद पर दशकों से जमायते उलेमा ए हिंद का कब्जा रहा है। जनवरी में हुए चुनाव में गुजरात के छोटे से कस्बे के रहने वाले पिछड़ी जाति के वस्तानवी ने अशरफों को पछाड़ दिया। उन्होंने मजहब के नाम पर सामान्य मुसलमानों का शोषण नहीं होने देने, कट्टरता का दमन करने और मदरसा शिक्षा प्रणाली को अग्रगामी व आधुनिक बनाने की बात की। उन्होंने इंजीनियरिंग, प्रबंधन, मेडिकल, कंप्यूटर और अंग्रेजी को मदरसों के पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रयास किया, ताकि मजहबी तालीम के साथ छात्रों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाया जा सके। इसके साथ ही उन्होंने अप्रासंगिक फतवों पर लगाम लगाने का सुझाव भी दिया, किंतु उनकी उदारवादी सोच कट्टरपंथियों को रास नहीं आई। वस्तानवी प्रकरण भारतीय मुस्लिम समाज के लिए महत्वपूर्ण घटना है, किंतु सवाल उठता है कि मुस्लिम समाज का प्रबुद्ध वर्ग और सेक्युलरिस्ट इस प्रकरण में कहां खड़े हैं? वे क्यों तटस्थ हैं? वस्तानवी अपना मदरसा बिना सरकारी सहायता के चलाते हैं। उनके मदरसों में दो लाख छात्र मजहबी तालीम के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई करते हैं। कुरान के साथ छात्रों को तकनीकी ज्ञान देने को वह समय की जरूरत समझते हैं, ताकि प्रतिस्पद्र्धा में मुसलमान अन्य नागरिकों से पीछे नहीं रहें, जबकि कट्टरपंथी मुसलमान और सेक्युलरिस्ट मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए बहुसंख्यकों द्वारा कथित तौर पर किए गए भेदभाव को बड़ा कारण बताते आए हैं। मुस्लिम समाज में व्याप्त बुर्का प्रथा, बहुविवाह, मदरसा शिक्षा, जनसंख्या अनियंत्रण जैसे पिछड़ेपन के कारणों पर वे चुप्पी साधे रखते हैं। भारत में प्रचलित सेक्युलरवाद मुस्लिम कट्टरपंथ के तुष्टीकरण का पर्याय बन चुका है, किंतु एक सच्चे पंथनिरपेक्ष देश में दूसरे मजहब के अनुयायियों की आस्था का सम्मान करना क्या गुनाह है? मुस्लिम समाज में मूर्ति की उपासना कुफ्र हो सकता है, किंतु दूसरे मतावलंबियों द्वारा आयोजित एक सार्वजनिक समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर उनके आस्था चिन्हों का वितरण गुनाह कैसे हो सकता है? गुरुद्वारे में जाने वाले गैर सिख सिर ढक कर जाते हैं। इससे क्या वे सिख हो गए? मंदिरों में जूता खोलकर जाने वाले गैर हिंदू इसके कारण क्या हिंदू हो जाते हैं? भारत में सनातन पंथ से निकलकर नाना प्रकार के मत, संप्रदाय व दर्शन पल्लवित और पुष्पित हुए। वास्तव में स्वतंत्र भारत का सेक्युलर संविधान यहां के बहुमत हिंदू समाज की बहुलतावादी सनातन संस्कृति का ही प्रतिबिंब है। नरेंद्र मोदी की तारीफ कर वस्तानवी ने क्या गुनाह किया है? क्या गुजरात की खुशहाली में वहां के मुसलमान शामिल नहीं हैं? वस्तानवी से पूर्व अहमदाबाद की जामा मस्जिद के मुफ्ती शाबिर अहमद सिद्दीकी ने कहा था, मोदी सरकार द्वारा सृजित शांतिपूर्ण माहौल में मुसलमानों को भी तरक्की करने के समान अवसर प्राप्त हैं। गुजरात के मुसलमान मतदाताओं ने कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवार को विजयी बनाया। गोधरा से भाजपा के मोएज बरेलीवाला और सैयद पठान का जीतना और क्या रेखांकित करता है? मुसलमानों की सामाजिक स्थिति का आकलन करने वाले सच्चर आयोग ने भी गुजरात के मुसलमानों को अपेक्षाकृत खुशहाल माना है। गुजराती मुसलमान की साक्षरता दर 73.5 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 59.1 प्रतिशत है। सरकारी नौकरियों में गुजराती मुसलमान की भागीदारी 5.4 प्रतिशत है, जबकि पश्चिम बंगाल, दिल्ली और महाराष्ट्र में यह अनुपात क्रमश: 2.1, 3.2 और 4.4 प्रतिशत है। प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी गुजराती मुसलमान अन्य राज्यों की अपेक्षा काफी आगे हैं। वस्तानवी ने तो मुस्लिम समाज से वस्तुत: अग्रगामी होने की अपील की थी। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार से कहा है, हिंदुओं की सहनशीलता को हलके में न लें। हिंदू समुदाय समय-समय पर लाए गए विधानों को सहिष्णुता के साथ स्वीकारता आया है। न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी और एके गांगुली की पीठ ने स्पष्ट कहा है कि सेक्युलर प्रतिबद्धता के अभाव में दूसरे समुदायों के लिए नागरिक संहिता ला पाना संभव नहीं हुआ है। आखिर होली की छुट्टी वाले दिन कोयंबटूर धमाकों के आरोपी अब्दुल नासेर मदनी को पैरोल पर रिहा कराने के लिए केरल विधानसभा से सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करना इसका ज्वलंत उदाहरण है। शाहबानो मामले के बाद वस्तानवी का यह घटनाक्रम मुस्लिम समाज के लिए सुधार का अवसर लेकर आया है। अदालत ने मुस्लिम परित्यक्ता को पति से जीविका राशि पाने का अधिकार दिलाया था, किंतु आरिफ मोहम्मद खान जैसे उदारवादी मुस्लिमों की आवाज को तब अनसुना कर कठमुल्लों के दबाव में संविधान संशोधन के जरिए मुस्लिम समाज में सुधार का द्वार बंद कर दिया गया था। वस्तानवी प्रकरण में भी भारतीय मुसलमानों में परिवर्तन और सुधार की कमजोर ज्योति कट्टरवाद के झंझावातों से बुझ सकती है। इस झंझावात को खड़ा करने में जहां कट्टरपंथियों का हाथ है वहीं कांग्रेस, भाकपा और माकपा मौन रहकर कट्टरपंथी खेमे का साथ दे रहे हैं। सेक्युलरिस्ट कुनबे के कद्दावर नेता मुलायम सिंह ने पिछले दिनों वस्तानवी का समर्थन करने वाले समाजवादी पार्टी के सचिव माविया अली को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्खास्त कर दिया। मुसलमानों में पश्चगामी मानसिकता पोषित करने वाले सेक्युलरिस्ट और कट्टरपंथी मुसलमान ही मुसलमानों की सामाजिक व आर्थिक समस्याओं की जड़ में हैं। वस्तानवी प्रकरण वस्तुत: मुस्लिम समाज में कूपमंडूकता बनाम सुधार का प्रश्न है, जिसके ईमानदार उत्तर में ही भारत और मुसलमानों का भविष्य निहित है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
सियासी अखाड़ा बना दारुल उलूम देवबंद
देश की प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद इन दिनों कुलपति (मुहतमिम) पद को लेकर सियासी अखाड़े का रूप ले चुकी है। मौजूदा कुलपति गुलाम मोहम्मद वस्तानवी पद पर बने रहने की जुगत में हैं तो उनके विरोधी अरशद मदनी के समर्थक वस्तानवी को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए जतन कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि वस्तानवी इन दिनों विदेश में हैं। वह उमरा के लिए सऊदी अरब गए हैं। दूसरी ओर मदनी देवबंद में ही डटे हुए हैं और अपने समर्थकों के साथ आगे की रणनीति बना रहे हैं। वस्तानवी खेमा भी लगातार बैठकें कर रहा है। वस्तानवी 23 फरवरी से पहले लौट आएंगे। 23 फरवरी को मजलिस-ए-शूरा की बैठक है जिसमें बतौर कुलपति वस्तानवी के भविष्य का फैसला होगा। दोनों पक्ष इस मामले पर खुलकर नहीं बोल रहे। वस्तानवी खेमा खामोश रहकर आगे की रणनीतियां बना रहा है। उनके समर्थकों का आरोप है कि मदनी के लोग वस्तानवी के विरोध को हवा देने में जुटे हैं। जमीयत-उलेमा-हिंद (अरशद मदनी धड़ा) के सदस्य असजद मदनी दबी जुबान में कहते हैं कि वस्तानवी को देवबंद का कुलपति नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं किसी का नाम नहीं ले रहा, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि देवबंद का मुहतमिम एक गैर राजनीतिक व्यक्ति ही होना चाहिए। हम चाहेंगे कि इस पद पर वही शख्स रहे, जिसका राजनीति से कोई ताल्लुक न हो। मौजूदा स्थिति पर वस्तानवी खेमे से कोई भी बात करने को तैयार नहीं है। उनका सिर्फ इतना कहना है कि 23 फरवरी को शूरा फैसला करेगी कि वस्तानवी को रहना है अथवा नहीं। इस मामले ने पिछले दिनों खुलकर राजनीतिक रंग ले लिया था, जब सपा विधायक माविया अली वस्तानवी का सरेआम समर्थन करने लगे थे। पार्टी ने इसके राजनीतिक परिणामों का आकलन करते हुए जल्द ही अली को बाहर का रास्ता दिखा दिया। देवबंद के एक पदाधिकारी का कहना है कि देश के दो बड़े राजनीतिक दल इस पूरी लड़ाई में पर्दे के पीछे से किरदार निभा रहे हैं। सांसद बदरुद्दीन अजमल खुलकर वस्तानवी का समर्थन कर रहे हैं। वह शूरा के सदस्य भी हैं।
Saturday, February 12, 2011
मुस्लिम हकीम की सलाह से ही गर्भपात की इजाजत
दारुल उलूम देवबंद ने नया फतवा जारी किया है। इसमें गर्भपात कराने से पहले हकीम या किसी मुस्लिम चिकित्सक से सलाह लेने की बात कही गई है। यही नहीं गर्भ में पल रहे तीन महीने से अधिक के भ्रूण का गर्भपात हराम बताया गया है। फतवों की श्रेणी में मुस्लिम संस्थान से एक शख्स ने पूछा, हमारे दो बच्चे हैं। छोटा 11 महीने का है। मेरी पत्नी फिर गर्भवती है। चिकित्सक ने उसकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए उसे अगले बच्चे के लिए लगभग ढाई साल इंतजार करने को कहा है। वह गर्भपात कराना चाहती है। क्या इसकी इजाजत है? इसके जवाब में कहा गया कि अगर कोई मुस्लिम चिकित्सक यह कहे कि महिला गर्भावस्था और प्रसव का दर्द सहन करने में सक्षम नहीं है, तो तीन महीने से कम के भू्रण का गर्भपात कराया जा सकता है। हालांकि चिकित्सकों की दृष्टि में देवबंद का यह फतवा भी अनुचित है। उनका मानना है कि अगर कोई प्रशिक्षित चिकित्सक गर्भपात की सलाह देता है, तो वह महिला की हालत देख कर ही इसका फैसला लेता है, जबकि नीम-हकीम किसी महिला की हालत का बेहतर तरीके से अंदाज नहीं लगा सकते। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. फौजिया खानम कहती हैं, प्रशिक्षित चिकित्सक एक परीक्षण से गर्भावस्था की शुरुआत में ही पता लगा सकते हैं कि महिला की हालत प्रसव का दर्द सहने लायक है या नहीं, जबकि हकीमों के तरीके से सभी वाकिफ हैं। देवबंद ने इसके पहले अपने एक फतवे में कहा था कि गर्भधारण रोकने के लिए गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल भी हकीम से पूछ कर ही करना चाहिए। अगर हकीम इसकी इजाजत देता है, तो इसका इस्तेमाल हराम नहीं है।
Saturday, February 5, 2011
देश के पहले इस्लामी बैंक को मिली मंजूरी
केरल उच्च न्यायालय ने गुरुवार को प्रदेश में देश के पहले इस्लामी बैंक की स्थापना को मंजूरी प्रदान की। इससे पहले अदालत ने केरल प्रदेश औोगिक विकास निगम (केएसआईडीसी) के सहयोग से इस्लामी बैंकों की तर्ज पर प्रदेश में एक इस्लामी वित्तीय संस्थान की स्थापना को चुनौती देने वाली दो जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश जे चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति रामचंद्र मेनन की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता यह नहीं प्रदर्शित कर सके कि जिस सरकारी आदेश को चुनौती दी गई थी उससे किसी धर्म विशेष को सीधे तौर पर किस तरह बढ़ावा मिल रहा था. जनता पार्टी के नेता सुब्रमंद्य्म स्वामी और हिन्दू एक्य वेदी ने याचिकाये दाखिल की थी .
प्रदेश सरकार ने अपने कदम को न्यायोचित ठहराते हुए दलील दी की निवेश की प्रकृति व्यवसायिक है और ये संविधान में धर्म निर्पेछ्ता के सिधांत को प्रभावित नही करेगा .कम्पनी कानून के तहत पंजीबध ' द कम्पनी अल बरख फैनेंशियल सर्विसेस ' ने अदालत को भरोसा दिलाया की वित्तीय संस्थान को देश में मौजूदा कानून और शरीयत के सिधांतो के मुताबिक चलाया जायेगा.
प्रदेश सरकार ने अपने कदम को न्यायोचित ठहराते हुए दलील दी की निवेश की प्रकृति व्यवसायिक है और ये संविधान में धर्म निर्पेछ्ता के सिधांत को प्रभावित नही करेगा .कम्पनी कानून के तहत पंजीबध ' द कम्पनी अल बरख फैनेंशियल सर्विसेस ' ने अदालत को भरोसा दिलाया की वित्तीय संस्थान को देश में मौजूदा कानून और शरीयत के सिधांतो के मुताबिक चलाया जायेगा.
Wednesday, February 2, 2011
देवबंद की दुविधा
दारूल उलूम देवबंद दुविधा में है। मुसलमान भी पेशोपेश में हैं। हम सब दुआ करें कि देवबंद में हालात जल्द ठीक हों। ये शब्द एक मस्जिद के इमाम के हैं। उनकी इस दुआ पर वहां मौजूद सभी लोगों ने एक सुर में कहा-आमीन। यह घटना इस बात का सबूत है कि पिछले दिनों देवबंद में जो कुछ हुआ है, उससे पूर देश के मुसलमानों में बेचैनी है। जो दारूल उलूम देवबंद दुनिया भर में आला दर्जे का इस्लामी शिक्षा केंद्र माना जाता है, आज वहां के हालात ठीक करने के लिए मस्जिदों मे दुआएं मांगने की नौबत आ गई है तो इस पर विचार करना जरूरी हो जाता है कि आखिर ये हालात बने कैसे और इसके लिए जिम्मेदार कौन लोग हैं। 10 जनवरी को ग़ुलाम मोहम्मद वस्तानवी को दारूल उलूम देवबंद की मजलिस-ए-शुरा ने नया मोहतमिम चुना। इस फैसले से देश भर में सकारात्मक संदेश गया। लगा कि शायद अब देवबंद के बंद दरवाजे खुलेंगे और वहां आबोहवा में आधुनिक शिक्षा धार्मिक शिक्षा के साथ घुलमिल जाएगी। इस्लामी और आधुनिक शिक्षा के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के लिए खास तौर पर पहचाने जाने वाले मौलाना वस्तानवी के हाथ दारूल उलूम देवबंद की कमान आने से छात्रों में एक उम्मीद जगी थी कि शायद अब यहां भी आधुनिक शिक्षा की तरफ रुझान बढ़ेगा। लेकिन जल्द ही यह उम्मीद हवा हो गई। मौलाना के एक बयान को लेकर ऐसा बवाल मचा कि उन्हें अपने इस्तीफे की धमकी देनी पड़ी। इस पर उन्हें व्यापक समर्थन मिला तो अगले ही दिन उन्होंने इस्तीफे की पेशकश वापस ले ली। साथ ही मौलाना ने यह कह कर पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया कि उन्हें देवबंद से हटाने की साजिश की जा रही है। मौलाना वस्तानवी द्वारा इस्तीफे की पेशकश वापस लेने से उन लोगों के मंसूबों पर पानी फिर गया है जो देवबंद से उनकी विदाई चाहते हैं। 21 जनवरी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे मे दिए वस्तानवी के बयान ने उनके विरोधियों को एक हथियार थमा दिया और फिर मूíत विवाद को तूल देकर मौलाना की छवि धूमिल करने का कोशिश की गई। मौलाना के विरोधियों ने मुट्ठी भर छात्रों के जरिए मौलाना के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया कि उनके लिए काम करना मुश्किल हो गया। चौतरफा दबाव में मौलाना वस्तानवी को अपने इस्तीफे का ऐलान करना पड़ा। लेकिन इस ऐलान के बाद उनके समर्थन में लोग खुल कर सामने आने लगे। मोदी पर दिए अपने विवादास्पद बयान के बाद जब मौलाना वस्तानवी देवबंद लौटे तो उन्होंने अपने बयान पर मीडिया के सामने सफाई पेश कर दी। उनकी सफाई से तमाम छात्र संतुष्ट भी थे। लेकिन अगले ही दिन अचानक कुछ छात्रों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उन्हें ऊपर से शह भी मिलने लगी। दरअसल, दारूल उलूम पर कब्जे के लिए मदनी परिवार के भीतर भी जंग छिड़ी हुई है। मौलाना असल मदनी के उत्तराधिकारी को लेकर उनके भाई मौलाना अरशद मदनी और उनके बेटे मौलाना महमूद मदनी के बीच चल रहा संघर्ष किसी से छिपा नहीं हैं। मौलाना महमूद मदनी राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर राज्यसभा के सदस्य हैं। मौलाना अरशद मदनी कांग्रेस के बेहद करीब हैं। जानकार बताते हैं कि मोदी के हक में मौलाना वस्तानवी का बयान आते ही मौलाना अरशद मदनी ने खुद उनके खिलाफ कमान संभाली। मौलाना अरशद मदनी मोहतमिम पद के लिए खुद भी उम्मीदवार थे, लेकिन 17 सदस्यों वाली शुरा में उन्हे सिर्फ चार वोट ही मिले। शुरा में सबसे ज्यादा आठ वोट लेकर मौलाना वस्तानवी मोहतमिम पद के लिए चुने गए। उनसे पहले के तमाम मोहतमिम मदनी परिवार के राजनीति उद्देश्य पूरा करने में मदद करते रहे इसलिए वे सब उनकी आंखों के तारे रहे। लेकिन वस्तानवी ने मदनी परिवार के राजनीतिक उद्देश्यों की बजाए देवबंद की कायापलट करने के बारे सोचा। उसके बंद दरवाजे खोल कर बाहरी आबोहवा को अंदर दाखिल होने का रास्ता देने की बात की, सो वे उनकी आंखों की किरकिरी बन गए। वस्तानवी ने मुसलमानों से 2002 में अहमदाबाद मे हुए नरसंहार को भूलकर आगे बढ़ने की अपील की तो इसमें कुछ गलत नहीं है। इतिहास से चिपके रहने से बेहतर है भविष्य संवारने में जुटना। लेकिन मौलाना वस्तानवी के मुंह से मोदी की तारीफ में निकले शब्द मुसलमानों को हजम नहीं हो रहे। देश भर मे इसके खिलाफ प्रतिक्रिया हुई है। वस्तानवी के इस्तीफे पर फैसले के साथ ही दारूल उलूम को यह भी तय करना है कि उसे मुसलमानों की मजहबी रहनुमाई को ज्यादा तवज्जो देनी है या फिर राजनीतिक उद्देश्यों को। कई साल से ऐसा लगने लगा है कि दारुल उलूम देवबंद अपने असली काम छोड़कर मदनी परिवार के राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने का जरिया बनता जा रहा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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