Wednesday, February 2, 2011

देवबंद की दुविधा


दारूल उलूम देवबंद दुविधा में है। मुसलमान भी पेशोपेश में हैं। हम सब दुआ करें कि देवबंद में हालात जल्द ठीक हों। ये शब्द एक मस्जिद के इमाम के हैं। उनकी इस दुआ पर वहां मौजूद सभी लोगों ने एक सुर में कहा-आमीन। यह घटना इस बात का सबूत है कि पिछले दिनों देवबंद में जो कुछ हुआ है, उससे पूर देश के मुसलमानों में बेचैनी है। जो दारूल उलूम देवबंद दुनिया भर में आला दर्जे का इस्लामी शिक्षा केंद्र माना जाता है, आज वहां के हालात ठीक करने के लिए मस्जिदों मे दुआएं मांगने की नौबत आ गई है तो इस पर विचार करना जरूरी हो जाता है कि आखिर ये हालात बने कैसे और इसके लिए जिम्मेदार कौन लोग हैं। 10 जनवरी को ग़ुलाम मोहम्मद वस्तानवी को दारूल उलूम देवबंद की मजलिस-ए-शुरा ने नया मोहतमिम चुना। इस फैसले से देश भर में सकारात्मक संदेश गया। लगा कि शायद अब देवबंद के बंद दरवाजे खुलेंगे और वहां आबोहवा में आधुनिक शिक्षा धार्मिक शिक्षा के साथ घुलमिल जाएगी। इस्लामी और आधुनिक शिक्षा के बीच बेहतर तालमेल बिठाने के लिए खास तौर पर पहचाने जाने वाले मौलाना वस्तानवी के हाथ दारूल उलूम देवबंद की कमान आने से छात्रों में एक उम्मीद जगी थी कि शायद अब यहां भी आधुनिक शिक्षा की तरफ रुझान बढ़ेगा। लेकिन जल्द ही यह उम्मीद हवा हो गई। मौलाना के एक बयान को लेकर ऐसा बवाल मचा कि उन्हें अपने इस्तीफे की धमकी देनी पड़ी। इस पर उन्हें व्यापक समर्थन मिला तो अगले ही दिन उन्होंने इस्तीफे की पेशकश वापस ले ली। साथ ही मौलाना ने यह कह कर पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया कि उन्हें देवबंद से हटाने की साजिश की जा रही है। मौलाना वस्तानवी द्वारा इस्तीफे की पेशकश वापस लेने से उन लोगों के मंसूबों पर पानी फिर गया है जो देवबंद से उनकी विदाई चाहते हैं। 21 जनवरी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे मे दिए वस्तानवी के बयान ने उनके विरोधियों को एक हथियार थमा दिया और फिर मूíत विवाद को तूल देकर मौलाना की छवि धूमिल करने का कोशिश की गई। मौलाना के विरोधियों ने मुट्ठी भर छात्रों के जरिए मौलाना के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया कि उनके लिए काम करना मुश्किल हो गया। चौतरफा दबाव में मौलाना वस्तानवी को अपने इस्तीफे का ऐलान करना पड़ा। लेकिन इस ऐलान के बाद उनके समर्थन में लोग खुल कर सामने आने लगे। मोदी पर दिए अपने विवादास्पद बयान के बाद जब मौलाना वस्तानवी देवबंद लौटे तो उन्होंने अपने बयान पर मीडिया के सामने सफाई पेश कर दी। उनकी सफाई से तमाम छात्र संतुष्ट भी थे। लेकिन अगले ही दिन अचानक कुछ छात्रों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उन्हें ऊपर से शह भी मिलने लगी। दरअसल, दारूल उलूम पर कब्जे के लिए मदनी परिवार के भीतर भी जंग छिड़ी हुई है। मौलाना असल मदनी के उत्तराधिकारी को लेकर उनके भाई मौलाना अरशद मदनी और उनके बेटे मौलाना महमूद मदनी के बीच चल रहा संघर्ष किसी से छिपा नहीं हैं। मौलाना महमूद मदनी राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर राज्यसभा के सदस्य हैं। मौलाना अरशद मदनी कांग्रेस के बेहद करीब हैं। जानकार बताते हैं कि मोदी के हक में मौलाना वस्तानवी का बयान आते ही मौलाना अरशद मदनी ने खुद उनके खिलाफ कमान संभाली। मौलाना अरशद मदनी मोहतमिम पद के लिए खुद भी उम्मीदवार थे, लेकिन 17 सदस्यों वाली शुरा में उन्हे सिर्फ चार वोट ही मिले। शुरा में सबसे ज्यादा आठ वोट लेकर मौलाना वस्तानवी मोहतमिम पद के लिए चुने गए। उनसे पहले के तमाम मोहतमिम मदनी परिवार के राजनीति उद्देश्य पूरा करने में मदद करते रहे इसलिए वे सब उनकी आंखों के तारे रहे। लेकिन वस्तानवी ने मदनी परिवार के राजनीतिक उद्देश्यों की बजाए देवबंद की कायापलट करने के बारे सोचा। उसके बंद दरवाजे खोल कर बाहरी आबोहवा को अंदर दाखिल होने का रास्ता देने की बात की, सो वे उनकी आंखों की किरकिरी बन गए। वस्तानवी ने मुसलमानों से 2002 में अहमदाबाद मे हुए नरसंहार को भूलकर आगे बढ़ने की अपील की तो इसमें कुछ गलत नहीं है। इतिहास से चिपके रहने से बेहतर है भविष्य संवारने में जुटना। लेकिन मौलाना वस्तानवी के मुंह से मोदी की तारीफ में निकले शब्द मुसलमानों को हजम नहीं हो रहे। देश भर मे इसके खिलाफ प्रतिक्रिया हुई है। वस्तानवी के इस्तीफे पर फैसले के साथ ही दारूल उलूम को यह भी तय करना है कि उसे मुसलमानों की मजहबी रहनुमाई को ज्यादा तवज्जो देनी है या फिर राजनीतिक उद्देश्यों को। कई साल से ऐसा लगने लगा है कि दारुल उलूम देवबंद अपने असली काम छोड़कर मदनी परिवार के राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने का जरिया बनता जा रहा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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