देश की प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद इन दिनों कुलपति (मुहतमिम) पद को लेकर सियासी अखाड़े का रूप ले चुकी है। मौजूदा कुलपति गुलाम मोहम्मद वस्तानवी पद पर बने रहने की जुगत में हैं तो उनके विरोधी अरशद मदनी के समर्थक वस्तानवी को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए जतन कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि वस्तानवी इन दिनों विदेश में हैं। वह उमरा के लिए सऊदी अरब गए हैं। दूसरी ओर मदनी देवबंद में ही डटे हुए हैं और अपने समर्थकों के साथ आगे की रणनीति बना रहे हैं। वस्तानवी खेमा भी लगातार बैठकें कर रहा है। वस्तानवी 23 फरवरी से पहले लौट आएंगे। 23 फरवरी को मजलिस-ए-शूरा की बैठक है जिसमें बतौर कुलपति वस्तानवी के भविष्य का फैसला होगा। दोनों पक्ष इस मामले पर खुलकर नहीं बोल रहे। वस्तानवी खेमा खामोश रहकर आगे की रणनीतियां बना रहा है। उनके समर्थकों का आरोप है कि मदनी के लोग वस्तानवी के विरोध को हवा देने में जुटे हैं। जमीयत-उलेमा-हिंद (अरशद मदनी धड़ा) के सदस्य असजद मदनी दबी जुबान में कहते हैं कि वस्तानवी को देवबंद का कुलपति नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं किसी का नाम नहीं ले रहा, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि देवबंद का मुहतमिम एक गैर राजनीतिक व्यक्ति ही होना चाहिए। हम चाहेंगे कि इस पद पर वही शख्स रहे, जिसका राजनीति से कोई ताल्लुक न हो। मौजूदा स्थिति पर वस्तानवी खेमे से कोई भी बात करने को तैयार नहीं है। उनका सिर्फ इतना कहना है कि 23 फरवरी को शूरा फैसला करेगी कि वस्तानवी को रहना है अथवा नहीं। इस मामले ने पिछले दिनों खुलकर राजनीतिक रंग ले लिया था, जब सपा विधायक माविया अली वस्तानवी का सरेआम समर्थन करने लगे थे। पार्टी ने इसके राजनीतिक परिणामों का आकलन करते हुए जल्द ही अली को बाहर का रास्ता दिखा दिया। देवबंद के एक पदाधिकारी का कहना है कि देश के दो बड़े राजनीतिक दल इस पूरी लड़ाई में पर्दे के पीछे से किरदार निभा रहे हैं। सांसद बदरुद्दीन अजमल खुलकर वस्तानवी का समर्थन कर रहे हैं। वह शूरा के सदस्य भी हैं।
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