कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफीम है। दरअसल मार्क्स ने यूरोप में 'र्चच और अरब में इस्लाम' के वर्चस्व के साथ- साथ आधुनिकता व लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ धर्म की रूढ़ियां स्पष्ट खड़े होते देखी थीं। यूरोप ने र्चच की सत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़कर लोकतांत्रिक दुनिया बनायी। अमेरिका ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़कर स्वयं को आधुनिकता और दुनिया की निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया। विचारणीय यह है कि अगर यूरोप-अमेरिका ने र्चच की वर्चस्व वाली सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ मुक्ति की रेखा न खींची होती तो क्या आज वह समृद्धि-विकास के इस मुकाम पर खड़े होते? शायद नहीं। दुर्भाग्य यह है कि 'धर्म की अराजक सत्ता और शक्ति' के खिलाफ अरब दुनिया में कोई खास हलचल नहीं हुई। कोई बड़ी मुहिम या आंदोलन भी तो नहीं चला। अत: जिसने भी धर्म की सत्ता के खिलाफ कोई आवाज उठायी, उसे अरब दुनिया छोड़कर यूरोप जैसी उदारवादी समाज व्यवस्था की शरण लेनी पड़ी। इसके अलावा अरब जगत में इस्लामी सत्ता ही नहीं बल्कि जीवन पद्धति को नियंत्रित करने की अराजक और खतरनाक मुहिम भी चली। इस्लाम के उदार और मानवीय पक्ष पर रूढ़ियां और मुल्लाओं की अतिरंजित विचारशीलता को गति दी गयी। दुष्परिणाम में खुद अरब दुनिया ने अपने को बंद समाज व्यवस्था का बंधक बना लिया। ऐसे में लोकतांत्रिक और मानवीय दुनिया बनती भी तो कैसे? तानाशाही और शरीयत जैसी व्यवस्था ने अरब आबादी को धर्म की रूढ़ियों और अतिरंजना का शिकार बना छोड़ा है। मिस्र, ट्यूनीशिया, बहरीन आदि देशों में आज जनता का जो गुस्सा फूटा है, उसके पीछे भी उपरोक्त कारण ही हैं। लीबिया में जिस तरह संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप पर आवाज उठी है, उसके निहितार्थ गंभीर हैं। सवाल है कि अरब दुनिया के अधिकतर देश तानाशाही व्यवस्था में क्यों और कैसे कैद हैं? क्या हम इसके लिए अरब में इस्लाम की अराजकता को कारण मान सकते हैं? या यूरोप-अमेरिका की लूटवाली व्यवस्था को? ऐसा इसलिए सोचना-विचारना पड़ता है कि अरब लीग और हमारे देश के अनेक बुद्धिजीवी अरब लीग की खतरनाक स्थिति के लिए अमेरिका- यूरोप की लूटवादी व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हैं। अमेरिका या यूरोप अरब लीग और अन्य भूभागों में तभी हस्तक्षेप या घुसपैठ करते हैं जब वहां की सरकारें आमंत्रित करती हैं। अमेरिका-यूरोप के तेल बाजार पर लूटवादी व्यवस्था इसलिए कायम हो सकी क्योंकि अरब लीग तानाशाही और शरीयत व्यवस्था में इतने अंदर तक धंसे हुए हैं कि उन्हें विज्ञान या आधुनिक बाजार व्यवस्था की दक्षता हासिल ही नहीं हो सकती है। उदाहरण के लिए अरब लीग में तेल और गैस उत्खनन ही नहीं, पूरी व्यवस्था अमेरिका-यूरोप की बडी़-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में है। अगर अरब दुनिया ने विज्ञान और आधुनिक बाजार व्यवस्था पर ध्यान देते हुए विशेष दक्षता हासिल की होती तो आज अरब लीग यूरोप-अमेरिका से कहीं अधिक विकसित और शक्तिसंपन्न होता। अरब देशों में मस्जिद, मदरसा और हज ये तीन व्यवस्थाएं तानाशाही और शरीयत वाली सत्ता की ढाल रही हैं। तानाशाही और शरीयत वाली सत्ता चाहती है कि अपनी आबादी के लिए मस्जिद, मदरसा और हज की चाक चौंबंद व्यवस्था कर देने मात्र से उनके खिलाफ आमजन की आवाज नहीं उठेगी। जब जनता में आक्रोश नहीं होगा तो फिर सत्ता को कहीं से चुनौती भी नहीं मिलेगी। अरब लीग पर ध्यान दें तो वहां कहीं पर तानाशाही तो कहीं जन्मजात राजशाही व्यवस्था है। तानाशाही और राजशाही दोनों प्रकार की सत्ता व्यवस्थाओं ने मस्जिद-मदरसा और हज की मानसिकता को तुष्ट करने के लिए अपनी सत्ता और आर्थिक शक्ति झोंकी। जहां पर शरीयत की अराजकता की मांग नहीं थी वहां पर भी पूर्ण शरीयत की व्यवस्था लागू की गई और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिरवे को पनपने ही नहीं दिया गया। बात इतनी भर नहीं है। इस आड़ में वहां आधुनिक समाज की सोच और जरूरत तक को प्रतिबंधित किया गया। शरीयत की अराजक और खतरनाक व्याख्या को भी रोकने की कोशिश नहीं हुई। तानाशाही और जन्मजात राजशाही सत्ता को यह मालूम है कि अगर शरीयत की अराजक या खतरनाक व्याख्या को रोकने की कोशिश हुई तो कटटरवादी ताकतें तूफान खड़ा कर सकती हैं। मौजूदा समय में लीबिया की तानाशाही अपनी जनता पर जिस तरह से भाड़े के सैनिकों से बमबारी करा रही थी, उससे पूरी दुनिया स्तब्ध थी। जनता को अपनी सत्ता स्थापित करने और हटाने का हक जरूर है लेकिन लीबिया के तानाशाह कर्नल गददाफी ने तेल के भंडार से मिले डॉलरों से जनता की भलाई करने की जगह अपनी अकूत संपत्ति बनाई। यूरोप के बैंक गद्दाफी के डॉलरों से गुलजार हैं। उन्होंने अंहकार-अभिमान में जनाक्रोश को न समझने की गलती की है। होस्नी मुबारक से उन्हें सबक लेने की जरूरत थी पर वे अफ्रीकी देशों से भाड़े के सैनिकों द्वारा अपने ही देश की बेगुनाह जनता पर बमबारी करवाने लगे। जिस तरह से कत्लेआम हो रहा था उससे स्पष्ट था कि लीबिया में यूएनओ का हस्तक्षेप होगा। फिलहाल लीबिया में चुनौतियां काफी जटिल होंगी। क्योंकि कर्नल गद्दाफी ने उसे दो भागों में विभाजित करने की राजनीति की थी। पश्चिमी लीबिया की आबादी कर्नल गद्दाफी के कबीले की है जो उनकी शक्ति रही है। लीबिया में नई सत्ता स्थापित करने में नेतृत्व और सत्ता में भागीदारी पर संकट खड़ा हो सकता है। इसके लिए सर्वानुमति तैयार करने की जरूरत होगी। अरब दुनिया में यूएनओ को खलनायक बनाने की नीति भी आगे बढ़ सकती है। क्योंकि अरब के विभिन्न देशों में यूएनओ के हस्तक्षेप के खिलाफ मुहिम शुरू हो चुकी है। इस मामले में भारतीय कूटनीति पर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रवाह का संरक्षण न करने का अरोप लग रहा है। ब्रिटेन और फ्रांस ने भारत के असहयोग पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। भारत ने यूएनओ में मतदान में भाग न लेकर एक तरह से लीबिया के तानाशाह का समर्थन ही किया है। अभी भी उसका रुख स्पष्ट नहीं है। वैसे भारत का कहना है कि वह लीबिया में लोकतांत्रिक पद्धति का समर्थन करता है। सवाल है कि गद्दाफी जैसा खूंखार तानाशाह जो न सत्ता छोड़ने के लिए तैयार हैं और न अपनी आबादी का कत्लेआम रोकने के लिए राजी। तो ऐसी स्थिति में वहां लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व की बात कैसे सोची जा सकती है? अब अरब दुनिया लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं के बल पर ही सम्मान और शक्ति हासिल कर सकती है। तानाशाही और जन्मजात राजशाही व्यवस्था के दिन अब और बुरे होंगे। आज दुनिया एक गांव में तब्दील हो चुकी है। इसलिए आधुनिक विचारों के प्रवाहों को प्रतिबंधों के बाद भी रोकना आसान नहीं है। पर अरब लीग की आबादी अब भी मस्जिद-मदरसा और हज जैसी व्यवस्था से अलग होने और उदार इस्लामिक व्यवस्था में चलने के लिए तैयार नहीं दिखती। ऐसे विचारों के साथ अरब दुनिया यूरोप या अन्य समाजों से कैसे कदम मिला सकती है। लीबिया, मिस्र, बहरीन आदि देशों में बदलाव की जो लहर उठी है और तानाशाही की जो नींव जनता ने हिलायी है, उसे सलाम करना ही चाहिए। पर यह भी देखना होगा कि तानाशाही और शरीयत वाली व्यवस्था के पतन के बाद जो लोकतांत्रिक सत्ता वहां आयेगी वह वास्तव में कितनी लोकतांत्रिक होगी और उसमें अन्य धार्मिक समुदाय के लिए कितनी जगह होगी।
Saturday, March 26, 2011
अरब लीग और पश्चिम का द्वंद्व
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफीम है। दरअसल मार्क्स ने यूरोप में 'र्चच और अरब में इस्लाम' के वर्चस्व के साथ- साथ आधुनिकता व लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ धर्म की रूढ़ियां स्पष्ट खड़े होते देखी थीं। यूरोप ने र्चच की सत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़कर लोकतांत्रिक दुनिया बनायी। अमेरिका ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़कर स्वयं को आधुनिकता और दुनिया की निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया। विचारणीय यह है कि अगर यूरोप-अमेरिका ने र्चच की वर्चस्व वाली सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ मुक्ति की रेखा न खींची होती तो क्या आज वह समृद्धि-विकास के इस मुकाम पर खड़े होते? शायद नहीं। दुर्भाग्य यह है कि 'धर्म की अराजक सत्ता और शक्ति' के खिलाफ अरब दुनिया में कोई खास हलचल नहीं हुई। कोई बड़ी मुहिम या आंदोलन भी तो नहीं चला। अत: जिसने भी धर्म की सत्ता के खिलाफ कोई आवाज उठायी, उसे अरब दुनिया छोड़कर यूरोप जैसी उदारवादी समाज व्यवस्था की शरण लेनी पड़ी। इसके अलावा अरब जगत में इस्लामी सत्ता ही नहीं बल्कि जीवन पद्धति को नियंत्रित करने की अराजक और खतरनाक मुहिम भी चली। इस्लाम के उदार और मानवीय पक्ष पर रूढ़ियां और मुल्लाओं की अतिरंजित विचारशीलता को गति दी गयी। दुष्परिणाम में खुद अरब दुनिया ने अपने को बंद समाज व्यवस्था का बंधक बना लिया। ऐसे में लोकतांत्रिक और मानवीय दुनिया बनती भी तो कैसे? तानाशाही और शरीयत जैसी व्यवस्था ने अरब आबादी को धर्म की रूढ़ियों और अतिरंजना का शिकार बना छोड़ा है। मिस्र, ट्यूनीशिया, बहरीन आदि देशों में आज जनता का जो गुस्सा फूटा है, उसके पीछे भी उपरोक्त कारण ही हैं। लीबिया में जिस तरह संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप पर आवाज उठी है, उसके निहितार्थ गंभीर हैं। सवाल है कि अरब दुनिया के अधिकतर देश तानाशाही व्यवस्था में क्यों और कैसे कैद हैं? क्या हम इसके लिए अरब में इस्लाम की अराजकता को कारण मान सकते हैं? या यूरोप-अमेरिका की लूटवाली व्यवस्था को? ऐसा इसलिए सोचना-विचारना पड़ता है कि अरब लीग और हमारे देश के अनेक बुद्धिजीवी अरब लीग की खतरनाक स्थिति के लिए अमेरिका- यूरोप की लूटवादी व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हैं। अमेरिका या यूरोप अरब लीग और अन्य भूभागों में तभी हस्तक्षेप या घुसपैठ करते हैं जब वहां की सरकारें आमंत्रित करती हैं। अमेरिका-यूरोप के तेल बाजार पर लूटवादी व्यवस्था इसलिए कायम हो सकी क्योंकि अरब लीग तानाशाही और शरीयत व्यवस्था में इतने अंदर तक धंसे हुए हैं कि उन्हें विज्ञान या आधुनिक बाजार व्यवस्था की दक्षता हासिल ही नहीं हो सकती है। उदाहरण के लिए अरब लीग में तेल और गैस उत्खनन ही नहीं, पूरी व्यवस्था अमेरिका-यूरोप की बडी़-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में है। अगर अरब दुनिया ने विज्ञान और आधुनिक बाजार व्यवस्था पर ध्यान देते हुए विशेष दक्षता हासिल की होती तो आज अरब लीग यूरोप-अमेरिका से कहीं अधिक विकसित और शक्तिसंपन्न होता। अरब देशों में मस्जिद, मदरसा और हज ये तीन व्यवस्थाएं तानाशाही और शरीयत वाली सत्ता की ढाल रही हैं। तानाशाही और शरीयत वाली सत्ता चाहती है कि अपनी आबादी के लिए मस्जिद, मदरसा और हज की चाक चौंबंद व्यवस्था कर देने मात्र से उनके खिलाफ आमजन की आवाज नहीं उठेगी। जब जनता में आक्रोश नहीं होगा तो फिर सत्ता को कहीं से चुनौती भी नहीं मिलेगी। अरब लीग पर ध्यान दें तो वहां कहीं पर तानाशाही तो कहीं जन्मजात राजशाही व्यवस्था है। तानाशाही और राजशाही दोनों प्रकार की सत्ता व्यवस्थाओं ने मस्जिद-मदरसा और हज की मानसिकता को तुष्ट करने के लिए अपनी सत्ता और आर्थिक शक्ति झोंकी। जहां पर शरीयत की अराजकता की मांग नहीं थी वहां पर भी पूर्ण शरीयत की व्यवस्था लागू की गई और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिरवे को पनपने ही नहीं दिया गया। बात इतनी भर नहीं है। इस आड़ में वहां आधुनिक समाज की सोच और जरूरत तक को प्रतिबंधित किया गया। शरीयत की अराजक और खतरनाक व्याख्या को भी रोकने की कोशिश नहीं हुई। तानाशाही और जन्मजात राजशाही सत्ता को यह मालूम है कि अगर शरीयत की अराजक या खतरनाक व्याख्या को रोकने की कोशिश हुई तो कटटरवादी ताकतें तूफान खड़ा कर सकती हैं। मौजूदा समय में लीबिया की तानाशाही अपनी जनता पर जिस तरह से भाड़े के सैनिकों से बमबारी करा रही थी, उससे पूरी दुनिया स्तब्ध थी। जनता को अपनी सत्ता स्थापित करने और हटाने का हक जरूर है लेकिन लीबिया के तानाशाह कर्नल गददाफी ने तेल के भंडार से मिले डॉलरों से जनता की भलाई करने की जगह अपनी अकूत संपत्ति बनाई। यूरोप के बैंक गद्दाफी के डॉलरों से गुलजार हैं। उन्होंने अंहकार-अभिमान में जनाक्रोश को न समझने की गलती की है। होस्नी मुबारक से उन्हें सबक लेने की जरूरत थी पर वे अफ्रीकी देशों से भाड़े के सैनिकों द्वारा अपने ही देश की बेगुनाह जनता पर बमबारी करवाने लगे। जिस तरह से कत्लेआम हो रहा था उससे स्पष्ट था कि लीबिया में यूएनओ का हस्तक्षेप होगा। फिलहाल लीबिया में चुनौतियां काफी जटिल होंगी। क्योंकि कर्नल गद्दाफी ने उसे दो भागों में विभाजित करने की राजनीति की थी। पश्चिमी लीबिया की आबादी कर्नल गद्दाफी के कबीले की है जो उनकी शक्ति रही है। लीबिया में नई सत्ता स्थापित करने में नेतृत्व और सत्ता में भागीदारी पर संकट खड़ा हो सकता है। इसके लिए सर्वानुमति तैयार करने की जरूरत होगी। अरब दुनिया में यूएनओ को खलनायक बनाने की नीति भी आगे बढ़ सकती है। क्योंकि अरब के विभिन्न देशों में यूएनओ के हस्तक्षेप के खिलाफ मुहिम शुरू हो चुकी है। इस मामले में भारतीय कूटनीति पर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रवाह का संरक्षण न करने का अरोप लग रहा है। ब्रिटेन और फ्रांस ने भारत के असहयोग पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। भारत ने यूएनओ में मतदान में भाग न लेकर एक तरह से लीबिया के तानाशाह का समर्थन ही किया है। अभी भी उसका रुख स्पष्ट नहीं है। वैसे भारत का कहना है कि वह लीबिया में लोकतांत्रिक पद्धति का समर्थन करता है। सवाल है कि गद्दाफी जैसा खूंखार तानाशाह जो न सत्ता छोड़ने के लिए तैयार हैं और न अपनी आबादी का कत्लेआम रोकने के लिए राजी। तो ऐसी स्थिति में वहां लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व की बात कैसे सोची जा सकती है? अब अरब दुनिया लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं के बल पर ही सम्मान और शक्ति हासिल कर सकती है। तानाशाही और जन्मजात राजशाही व्यवस्था के दिन अब और बुरे होंगे। आज दुनिया एक गांव में तब्दील हो चुकी है। इसलिए आधुनिक विचारों के प्रवाहों को प्रतिबंधों के बाद भी रोकना आसान नहीं है। पर अरब लीग की आबादी अब भी मस्जिद-मदरसा और हज जैसी व्यवस्था से अलग होने और उदार इस्लामिक व्यवस्था में चलने के लिए तैयार नहीं दिखती। ऐसे विचारों के साथ अरब दुनिया यूरोप या अन्य समाजों से कैसे कदम मिला सकती है। लीबिया, मिस्र, बहरीन आदि देशों में बदलाव की जो लहर उठी है और तानाशाही की जो नींव जनता ने हिलायी है, उसे सलाम करना ही चाहिए। पर यह भी देखना होगा कि तानाशाही और शरीयत वाली व्यवस्था के पतन के बाद जो लोकतांत्रिक सत्ता वहां आयेगी वह वास्तव में कितनी लोकतांत्रिक होगी और उसमें अन्य धार्मिक समुदाय के लिए कितनी जगह होगी।
Thursday, March 24, 2011
उदार होने का समय
यह सुखद है कि प्रगतिशील मुसलिमों की संख्या बढ़ रही है
अब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अमेरिका जिस तरह अपनी छवि बदलने में लगा है, उससे मोदी के बारे में वस्तानवी की टिप्पणी तो फिर से प्रासंगिक हो ही गई है, इस संदर्भ में देवबंद के भीतरी संघर्ष को देखना भी जरूरी हो गया है।
वर्ष 1857 के विद्रोह में मुसलिम धार्मिक नेताओं के मार्गदर्शन का विशेष रूप से योगदान रहा है। ये मुसलिम नेता मुख्य रूप से वहाबी आंदोलन से जुड़े थे। दरअसल वहाबियों ने 1857 के बहुत पहले ही उत्तर भारत के तमाम नगरों में अपने केंद्र बना लिए थे। इसलिए जब विद्रोह प्रारंभ हुआ, तो इन नगरों में बड़ी आसानी से वहाबियों को कमांड संभालने में सफलता मिल गई थी।
वहाबियों का ऐसा ही एक केंद्र मेरठ के पास शामली में था। विद्रोह में यहां के वहाबियों ने भी दूसरे केंद्रों की तरह स्थानीय अंगरेजी तोपखाने पर हमला बोला था। विद्रोह के विफल हो जाने के बाद शामली के वहाबी नेता मुल्क छोड़कर अरब चले गए। पर उनमें से एक मोहम्मद कासिम हिंदुस्तान में ही रुक गए। उन्हीं कासिम ने इसलामी शिक्षा के लिए देवबंद में एक दारूल-उलूम की स्थापना की। यहीं से देवबंद का इतिहास प्रारंभ होता है, जो इस समय खबरों में है।
यह एक दिलचस्प बात है कि जब 1888 में सर सैयद अहमद खां ने मुसलिमों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग करने के लिए पेट्रिऑटिक एसोसिएशन बनाई थी, तब लुधियाना के वहाबियों ने कांग्रेस के समर्थन में सौ से ज्यादा फतवों की एक किताब प्रकाशित की। इनमें से दो फतवे देवबंद नेताओं के थे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान देवबंद के दारूल-उलूम के प्रधान मौलाना महमूद उल हसन ने अपने छात्रों और अध्यापकों के साथ मिलकर अंगरेजों के विरुद्ध एक योजना बनाई। वह योजना अफगानिस्तान और टर्की साम्राज्य से मिलकर ब्रिटिशों को हिंदुस्तान से खदेड़ने की थी। उस योजना से जुड़े क्रांतिकारी रेशमी रूमाल पर सूचनाएं भेजते थे। इसलिए अंगरेजों ने उस योजना को ‘रेशमी रूमाल षडंत्र’ की संज्ञा दी थी। वर्ष 1916 में देबबंद के दारूल- उलूम के प्रधान के इस साजिश का भेद खुल गया। महमूद उल हसन अपने सभी देवबंदी साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए तथा उन्हें माल्टा जेल भेज दिया गया। वर्ष 1919 में रिहा होकर जब ये क्रांतिकारी मुंबई पहुंचे, तब महात्मा गांधी और दूसरे राष्ट्रीय नेताओं ने वहां उनका भव्य स्वागत किया। उसी साल महमूद उल हसन की मृत्यु हो गई, लेकिन उनके शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी गांधी के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में संघर्ष करते रहे।
इसलाम के बारे में गांधी ने मौलाना मदनी से बहुत कुछ जाना। गांधी का यह दृढ़ विश्वास था कि इसलाम का आधार अहिंसा है। उनसे जुड़े अली बंधु-मुहम्मद और शौकत अली, खान अब्दुल गफ्फार खान, हकीम अजमल खान, इमाम साहब अब्दुल कादिर मौलाना आजाद, डॉ. अंसारी आदि के अतिरिक्त तमाम देवबंदी मौलवी भी यही मानते थे। वर्ष 1920 में गांधी ने उलेमाओं की एक बैठक दिल्ली में बुलाई थी। वहां सभी इस नतीजे पर पहुंचे थे कि हिंसा के मुकाबले इसलाम ने हमेशा अहिंसा को ही पसंद किया है। उलेमाओं का यह प्रस्ताव कांग्रेस के अहिंसा प्रस्ताव से पहले आया था। आजादी की लड़ाई में गांधी के साथ जुड़े मुसलिम नेताओं में अधिकांश धर्मिक थे और वे देश विभाजन के विरोधी थे। जबकि ब्रिटिश शिक्षा से प्रभावित और आधुनिक लगने वाले इकबाल, जिन्ना और लियाकत अली विभाजन के हिमायती थे।
दारूल उलूम इस समय वस्तानवी के समर्थक और विरोधी गुटों में बंटा दिखाई पड़ता है। वस्तानवी की छवि एक उदारवादी सुलझे हुए इनसान की है, जिन्होंने मोहतमिम बनने के बाद मदरसा प्रणाली को नए जमाने के अनुकूल बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए। साफ है कि देवबंद का यह विवाद उदारवादी तथा पुरातनपंथियों के बीच है। इससे साफ लगता है कि दारूल उलूम पर प्रगतिशील मुसलमानों का प्रभाव कम नहीं है।
वस्तानवी स्वयं गुजराती होने के कारण गुजरात को करीब से जानते हैं। गुजरात की प्रगति से प्रभावित होकर निर्भीकता से जो बयान उन्होंने दिया, उससे किसी का विरोध नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री होने के नाते इस प्रगति में नरेंद्र मोदी का भी योगदान अवश्य रहा होगा। लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि गुजरात की हिंसा की जिम्मेदारी से नरेंद्र मोदी को बरी नहीं किया जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे, इंदिरा गांधी की हत्या की प्रतिक्रिया में भारी संख्या में सिख मारे गए थे और इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस पर जाती है। ऐसे में वस्तानवी के बयान से लगता है कि गुजरात ने सब कुछ भुलाकर मोदी को क्षमा कर दिया है। ऐसा करके वह जनमानस की नजरों में बहुत ऊंचा उठ गए हैं।
यह सुखद है कि भारतीय मुसलिम समुदाय में भी इस समय उदारवादियों की संख्या बढ़ रही है। बाबरी विध्वंस से जुड़े निर्णय के समय हिंदू-मुसलिम सहित देश की संपूर्ण जनता ने अपनी परिपक्वता दिखाई। इस मुद्दे को अब देश की जनता उस तरह का महत्व नहीं देती, जैसा पहले देती थी। समय का तकाजा है कि राजनीतिक पार्टियां इसे समझें। लोकतंत्र की बहाली के लिए इसलामी मुल्कों में जो सैलाब उठा है, उसमें मुसलिम समुदाय अपने यहां के सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर चल रहा है। कट्टरवाद के विरुद्ध जंग छिड़ चुकी है, फिर चाहे वह मुसलिम कट्टरवाद हो या हिंदू कट्टरवाद। इस समय वस्तानवी जैसे उदारवादी मुसलिम धार्मिक नेताओं की तुलना में अधिक संख्या में लगते हैं। जनता और मीडिया को इनका समर्थन करना चाहिए।
बंगाल से बेहतर है गुजरात में मुस्लिमों का स्थिति
पश्चिम बंगाल में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में मुस्लिमों की स्थिति को लेकर आए आंकड़े, 34 साल से सत्ता में बनी हुई वामपंथी सरकार के लिए खतरे की घंटी हैं। इनमें राज्य में मुस्लिमों की स्थिति गुजरात से बदतर बताई गई है। हालांकि अल्पसंख्यकों की हालत को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा से निशाने पर रहे हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च के प्रमुख अर्थशास्त्री अबु सलेह शेरिफ के विश्लेषण में मुस्लिम समुदाय को लेकर पश्चिम बंगाल की यह चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक समुदाय को सरकारी योजनाओं को फायदा बहुत कम मिलता है। उनके मुताबिक, राज्य के 25 फीसदी मुसलमानों में से केवल 2.1 फीसदी के पास सरकारी नौकरी है। देश में मुस्लिमों को लेकर यह सबसे कमजोर आंकड़ा है। जबकि गुजरात में 9.1 फीसदी मुसलमानों से 5.4 सरकारी कर्मचारी हैं। शेरिफ इंडिया इस्लामिक कल्चरल कल्चर सेंटर में इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज द्वारा आयोजित रिलेटिव डेवलपमेंट ऑफ वेस्ट बंगाल एंड सोशियोरिलीजियस डिफरेंशियल विषय पर सेमिनार को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में 50 फीसदी मुस्लिम बच्चों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा भी नहीं मिली। केवल 12 फीसदी मुसलमानों ने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। यह आंकड़े धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का दम भरने वाले वामपंथ के गढ़ के लिए चिंता का सबब है। वैसे इस सरकार के लिए खतरे की घंटी पिछले साल ही बज चुकी थी, जब वाम मोर्चे का स्थानीय निकाय चुनावों में काफी खराब प्रदर्शन रहा था। माना जा रहा था मुस्लिम समुदाय से पार्टी के मोहभंग के कारण ऐसा हुआ है। आगामी विधानसभा चुनावों में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने सुधार करते हुए मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाकर 56 कर दी है। जो 2006 के चुनाव में मात्र 42 थी। शेरिफ सच्चर समिति के भी सदस्य सचिव हैं। उनके विश्लेषण में बंगाल में मुसलमानों की स्थिति, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के राज्य गुजरात से भी बदतर बताई है। शेरिफ के अनुसार, पश्चिम बंगाल के मुसलमानों के पास माकपा को वोट देने की यदि कोई वजह है, तो वो है भूमि सुधार। हालांकि भूमि सुधार के कार्यक्रमों से भी मुस्लिम समुदाय के जीवन स्तर में बड़ा बदलाव नहीं आया। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले यह सचाई जनता को पता लगनी चाहिए|
Monday, March 14, 2011
कन्या भ्रूण हत्या हराम : शिया बोर्ड
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया। बोर्ड के दो दिवसीय अधिवेशन में भू्रण हत्या को हराम करार दिया गया। कहा गया कि इस्लाम में केवल उसी सूरत में गर्भपात की इजाजत है, जब महिला की जान बचाने के लिए ऐसा अपरिहार्य हो। बोर्ड ने हेल्पलाइन शुरु करने की भी घोषणा की है। गर्भ में लड़की होने पर अगर ससुराल में बहू पर गर्भपात कराने के लिए दबाव पड़ता है, तो उसे हिम्मत कर इस हेल्पलाइन पर बस एक फोन करना होगा, बाकी का काम बोर्ड संभाल लेगा। ऐसा न करने के लिए पति को समझाया जाएगा। अगर वह नहीं मानता है तो उस परिवार का समाजिक बहिष्कार का एलान हो जाएगा। उस परिवार में न कोई अपनी लड़की देगा और न ही उस परिवार की लड़की को अपने यहां ब्याहेगा। सुख-दुख में भी उस परिवार से कोई राब्ता नहीं रहेगा। बोर्ड के अध्यक्ष मिर्जा मोहम्मद अतहर की अध्यक्षता में हुए अधिवेशन में शिया समुदाय से निकाह के समय ही मेहर की राशि नकद चुकाने का अनुरोध किया। यह रकम लड़के वालों की तरफ से चुकाई जाती है। निकाह के समय ही मेहर की राशि चुकाना सुन्नत-ए-रसूल है। बोर्ड ने महंगी शादियों पर भी अपना विरोध दर्ज कराया। कम खर्च के लिए सामूहिक शादियों के आयोजन की बात कही। बोर्ड ने स्कूली पाठ्यक्रम में इमाम-ए-हुसैन की जीवनी को शामिल करने, लखनऊ की सड़कों के नाम यहां के नवाबों के नाम पर रखने, विभिन्न निगमों, आयोगों और विधान परिषद- राज्यसभा में शियाओं को नामित करने की वकालत की। अधिवेशन में कहा गया कि पांच करोड़ हिन्दुस्तानी शियाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व एक प्रतिशत से भी कम है। बोर्ड ने कहा कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठनों का शिकार होने वाले शियाओं को हिंदुस्तान में राजनीतिक शरण मिलनी चाहिए|
Saturday, March 12, 2011
कन्या भ्रूण हत्या पर बंद होगा हुक्का-पानी
कन्या भू्रण हत्या रोकने के लिए ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड एक नई पहल करने जा रहा है। बोर्ड लखनऊ में हेल्पलाइन स्थापित करेगा। गर्भ में लड़की होने पर अगर ससुराल में बहू पर गर्भपात कराने के लिए दबाव पड़ता है तो उसे हिम्मत कर इस हेल्पलाइन पर बस एक फोन करना होगा, बाकी का काम बोर्ड संभाल लेगा। ऐसा न करने के लिए पति को समझाया जाएगा। अगर वह नहीं मानता है तो उस परिवार का सामाजिक बहिष्कार का एलान हो जाएगा। उस परिवार में न कोई अपनी लड़की देगा और न ही उस परिवार की लड़की को अपने यहां ब्याहेगा। सुख-दुख में भी उस परिवार से कोई राब्ता नहीं रहेगा। ऑल इंडिया शिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का दो दिवसीय अधिवेशन शनिवार से लखनऊ में शुरू हो रहा है। बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर ने दैनिक जागरण से कहा कि अधिवेशन में इस प्रस्ताव को मंजूरी दिलाई जाएगी। मौलाना ने कहा कि इस्लाम में गर्भपात हराम है। गर्भपात को उसी सूरत में जायज माना गया है जब औरत की जिंदगी बचाने के लिए ऐसा करना अपरिहार्य हो। इसके बावजूद मुस्लिम समाज में कन्या भ्रूण हत्या के मामले बढ़ रहे हैं। ससुराल में बहू पर जब गर्भपात के लिए दबाव डाला जाता है, तो वह समझ नहीं पाती कि आखिर मदद के लिए किससे गुहार लगाए। इसी के दृष्टिगत बोर्ड यह पहल कर रहा है। इस सवाल पर कि अगर बहू ससुराल की शिकायत दर्ज कराती है तो क्या इसका असर उसके वैवाहिक जीवन पर नहीं पड़ेगा, मौलाना अतहर ने कहा कि समाजिक बहिष्कार का खौफ बहू को ससुराल में और ज्यादा सुरक्षित बनाएगा। निकाह के वक्त ही मेहर : शिया बोर्ड की एक कोशिश निकाह के वक्त ही मेहर चुकाने को अनिवार्य किए जाने को लेकर भी है। मुस्लिम समाज में निकाह के वक्त मेहर की राशि तय होती है, जिसे चुकाने का जिम्मा लड़के वालों का होता है। इस्लाम की यह रवायत एक तरह से लड़की की आर्थिक सुरक्षा के लिए है, लेकिन आम तौर पर यह रकम लड़के वाले चुकाते नहीं है। उसे चुकाने की नौबत उसी सूरत में आती है जब कभी तलाक होता है, लेकिन बोर्ड चाहता है कि निकाह के वक्त ही यह रकम लड़की को नकद दी जाए। बोर्ड के अधिवेशन में इस मुद्दे पर प्रस्ताव पारित होने की उम्मीद है। महंगी शादियों के खिलाफ भी लाया जाएगा प्रस्ताव बैठक में महंगी शादियों के खिलाफ भी प्रस्ताव पारित होगा। मौलाना अतहर ने कहा शादियां साल दर साल महंगी हो रही हैं। आर्थिक दृष्टि से कमजोर मां-बाप के लिए अपनी लड़कियों को ब्याहना बहुत मुश्किल काम होता जा रहा है। शादियों में खर्च को सीमित करने के लिए बोर्ड सामूहिक शादियों के चलन को बढ़ावा देने के लिए प्रस्ताव पारित करेगा। बोर्ड का मत है कि अगर सामूहिक विवाह किए जाएं तो इससे खर्च को सीमित किया जाएगा|
उदारवादी तबके की शामत है पाकिस्तान में
इस्लामाबाद में कुछ दिन पहले अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी की हत्या और पाकिस्तान से अल्संख्यकों के लगातार पलायन को एक साथ देखे जाने की जरूरत है। दरअसल तालिबान के लोग जबसे पाकिस्तान में सक्रिय हुए हैं, वहां उदारवादी तबके की शामत आई है। भले ही वे किसी धर्म को मानने वाले हों। भट्टी साहब पाकिस्तानी संसद के अकेले कैथोलिक क्रिश्चियन सदस्य और ईश निंदा कानून के मुखर आलोचक थे। इससे पूर्व मारे गए पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर भी उदारवादी धड़े के थे और धार्मिक कट्टरता के कट्टर विरोधी थे। समस्या यह है कि पाकिस्तानी सरकार भी अक्सर कट्टरवादी ताकतों को शह देती दिखती है। यहां तक कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में जो भी हो रहा है वह सरकार की मर्जी पर ही हो रहा है। देखने में यह भी आया कि पंजाब हाईकोर्ट के अधिकांश वकील सलमान तासीर को मारने वाले के पक्ष में रैली में शामिल हुए। इन वकीलों में हत्यारे के पक्ष में मुकदमा लड़ने की होड़ थी। कानून की समझ रखने वाले ही अगर ऐसी सोच रखते हैं तो फिर हालात का बिगड़ना तय समझिए। सत्ता और सामाजिक-राजनीतिक-कानूनी प्रतिष्ठानों में पैठ रही धार्मिक कट्टरता का खामियाजा यों पूरा देश भुगत रहा है लेकिन अल्पसंख्यक जिनमें खासकर हिंदू अधिक हैं, खुद को ज्यादा असुरक्षित समझ रहे हैं। एक रिपोर्ट आई है कि पाकिस्तान से रोजाना एक हिंदू परिवार पलायन कर रहा है। यह रिपोर्ट अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान के अधिकांश हिंदू देश छोड़ने पर विचार करते हैं और ज्यादातर मजबूरीवश ही वहां रहते हैं। आज पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों का पलायन काफी तेज हो रहा है। आम अल्पसंख्यकों को तो छोड़िए, कुछ ही दिन पहले सिंध प्रांत की विधानसभा के एक सदस्य राम सिंह सोढ़ो ने भारत से अपना इस्तीफा भेज दिया। हालांकि इस्तीफे का कारण उन्होंने तबीयत खराब होना बताया लेकिन कोई भी समझ सकता है कि तबीयत खराब होना तो इस्तीफे का कारण हो सकता है, लेकिन इसके लिए देश छोड़ने की जरूरत नहीं थी। यह भी नहीं कि वे भारत में इलाज कराने गए हैं। बस उन्हें पाकिस्तान छोड़ना था और इसके पीछे असुरक्षा की भावना ही थी। इससे पहले भी वहां की विधानसभा के चार सदस्य देश छोड़ चुके थे। अतीत में झांके तो पाकिस्तान के पहले विधि मंत्री जगन्नाथ मंडल भी भारत में आकर बस गए थे। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार सभी धर्मों के लोग बराबर हैं और सबको धर्म की मुकम्मल आजादी है। फिर ऐसा क्यों है कि अल्पसंख्यक वहां खुद को सुरक्षित नहीं समझते। दरअसल वहां कोई भी संविधान की परवाह नहीं करता और कानून से खिलवाड़ करना एक शौक की तरह बनता जा रहा है। वहां धार्मिक मुद्दे पर आनन-फानन में गोलबंदी हो जाती है। ताजे माहौल में वहां हिंदू एक तो आतंकवाद से उपजी असुरक्षा की भावना से भरे हैं, दूसरा उन्हें भय है कि ईश निंदा कानून का जम कर दुरुपयोग होगा। मेरी राय में पाकिस्तान में संविधान की सभी इज्जत करें और तालिबानी ताकतों को उखाड़ फेंकें। अगर ये दोनों बाते संभव हो जाएं तो मैं नहीं समझता कि कोई ईश निंदा कानून की वकालत करेगा। फिर हमें अपनी विदेश नीति में भी सुधार लाना होगा। अभी हालत यह है कि जो भी भारत जाए, उसे जासूस समझा जाता है। शायद यही हाल भारत में भी है। यकीनन यह स्थिति बदलनी चाहिए। वीजा नीति उदार हो और दोनों देशों के लोग आसानी से एक-दूसरे देश जा सकें। यह पलायन रुकने की प्रत्यक्ष नहीं लेकिन परोक्ष वजह जरूर हो सकती है। पाकिस्तान में आज ज्यादातर हिंदू सिंध और बलूचिस्तान में रहते हैं। इन दोनों प्रांतों की स्थिति ज्यादा अराजक है। यहां हिंदुओं के अपहरण की वारदातें भी आम हैं। पाकिस्तानी शासन को समझना होगा कि अगर वे जिन्ना का आदर्श पाकिस्तान बनाना चाहते हैं तो वहां संकीर्णताओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और हर नागरिक से बराबर सलूक किया जाना चाहिए। (कुंभर पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Monday, March 7, 2011
पाकिस्तान में कठमुल्ला राज
लेखक पाकिस्तान में विस्फोटक हालात के राजनीतिक-ऐतिहासिक कारणों की पड़ताल कर रहे हैं…
आखिर पाकिस्तान को हो क्या गया है। जिस तरह वहां के एकमात्र ईसाई मंत्री शहबाज भट्टी को मजहबी कट्टरपंथियों ने मार डाला, उससे लगता है कि कानून का राज कठमुल्लों के आगे मजूबर हो गया है। कुछ दिन पहले ही पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर की भी हत्या कर दी गई थी। ये दोनों विवादित ईशनिंदा कानून का विरोध कर रहे थे। इस कानून में इस्लाम के विरोध पर फांसी की सजा का प्रावधान है। इसका बेजा फायदा लेकर लोग आपसी लड़ाइयों में इस्लाम विरोध की झूठी शिकायतें करके निर्दोष लोगों को फंसा देते हैं। इस कानून का सबसे ज्यादा शिकार ईसाई और हिंदू हो रहे हैं। जो समझदार मुस्लिम इस कानून का विरोध कर रहे हैं, उन्हें कट्टरपंथी लोग गोलियों से भून देते हैं, भले ही वे मंत्री हों या गवर्नर। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के पढ़े-लिखे समझदार और उदार लोग डरे-सहमे हुए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि करें क्या? भारत और पाकिस्तान के दो बड़े अखबार समूहों ने अमन की आशा नाम से एक अभियान शुरू किया है, जिसमें दोनों देशों के बीच दोस्ताना ताल्लुक कायम कराने की कोशिशें हो रही हैं। कराची में अगले हफ्ते इसका बड़ा सम्मेलन हो रहा है। सम्मेलन के एजेंडे में आतंकवाद और कट्टरपंथ सबसे सबसे ऊपर हैं। आज भारत की खासियत यह है कि इसने कट्टरंपथ पर लगाम लगा कर रखी है। हम कट्टरपंथ बढ़ने नहीं देते और धर्म या मजहब के जो लोग कट्टरपंथ फैलाने की कोशिश करते हैं उन्हें एक हद के बाद कानून के जरिए सख्ती से दबा देते हैं। पाकिस्तान इसी जगह चूक गया। कट्टरपंथ शुरू में तो लुभाता है, लेकिन बाद में यही भस्मासुर बन जाता है। जिन्ना इस बात को अच्छी तरह जानते थे, इसीलिए उन्होंने पाकिस्तान बनने तक तो मुसलमान-मुसलमान की रट पकड़े रखी, लेकिन विभाजन के बाद ऐसी नीति बनाई, जिसमें सभी धमरें के लोगों को बराबरी का दर्जा दिया गया। अल्पसंख्यक लोगों के साथ कोई भेदभाव न करने का फैसला लिया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जिन्ना की छह महीने के अंदर ही मौत हो गई और उनके बाद वहां के प्रधानमंत्री ने गैर मुसलमानों के हाथ से अधिकांश अधिकार छीन लिए। वहां के अधिकांश लोगों को उस समय यह फैसला अच्छा लगा। लेकिन इसी फैसले ने पाकिस्तान को विनाश के रास्ते पर धकेल दिया। कुछ दशक बाद जनरल जिया उल हक ने रही-सही कसर पूरी कर दी। उन्होंने पाकिस्तान को इस्लामिक गणराज्य के नाते शरीयत कानून से बांध दिया और ईश निंदा कानून तक बना डाला। इसके बाद धीरे-धीरे पाकिस्तान में मजहबी कट्टरपंथी बढ़ते गए। मौलाना इबादत करने के बजाय आतंकवादी संगठनों के मुखिया बन गए। अब पाकिस्तान में शायद ही कोई ऐसा मौलाना हो, जिसके पास दर्जनों एके-47 राइफलें न हों। ये मौलाना राइफल और बम लेकर मस्जिदों में नमाज पढ़ने जाते हैं। धीरे-धीरे इनका दबदबा इतना बढ़ गया और इनके इतने गिरोह पैदा हो गए कि आज पाकिस्तान की पुलिस और सरकार भी इनसे घबराती है। जनता तो इनसे त्रस्त है ही। जब पाकिस्तान में अल्पसंख्यक मामूली संख्या में रह गए तो बहुसंख्यक मुस्लिम आपस में ही लड़ने लगे। उन्होंने खुद को अलग-अलग समूहों में बांट लिया। शिया, सुन्नी, अहमदी एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए। क्षेत्रवाद इतना बढ़ गया कि पंजाबी, सिंधी, बलूच, पठान आपस में लड़ने लगे। पंजाबी मुसलमानों ने हिंदुस्तान से गए मुसलमानों को मुहाजिर बताकर पहले तो दसियों साल बेइज्जत किया और ऊंचे ओहदों पर नहीं आने दिया, बाद में उनकी हत्याएं कराई गईं। अकेले कराची में हजारों मुहाजिरों को गोलियों से उड़ा दिया गया। अब आलम यह है कि मस्जिदों में बम फट रहे हैं। कोई भी इंसान हिफाजत से नहीं रह सकता है। हर अमन पसंद पाकिस्तानी परेशान है। वह यदि पैसे वाला है तो दुबई या मलेशिया जाकर बस रहा है और यदि गरीब है तो अपनी किस्मत पर रो रहा है। पाकिस्तान अलकायदा और तालिबान की शरणगाह बन गया है। पूरे विश्व में पाकिस्तानियों को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। यहां के लोग विकसित देशों के वीजा को भी तरस रहे हैं। पिछले दिनों पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति फारूख लेगारी की भतीजी फरहा लेगारी दिल्ली में एक शादी में मिल गईं। उनका कहना था कि उनके जैसे लोगों के लिए वहां रहना मुश्किल हो गया है। कहां भारत दिनोदिन तरक्की करता जा रहा है। लोग उद्योग, व्यापार बढ़ा रहे हैं। यहां भारी संख्या में विदेशी कंपनियां आ रही हैं। विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर दो सौ अरब डॉलर से अधिक हो गया है। भारत ने आतंकवाद और कट्टरपंथ को काबू में कर रखा है। एक भी हिंदुस्तानी अलकायदा में नहीं है। आपके यहां सचमुच जम्हूरियत है। यह सब आपने 1947 के बाद पाया है और हमने 1947 के बाद अपने मुल्क का बेड़ा गर्क कर दिया। हम सिर्फ मजहबी कट्टरपंथ और जज्बाती बातों में फंसे रहे। दूसरे मजहबों की अच्छाइयां भी नहीं आने दीं। आतंकवादी अड्डे बनाते रहे, लोगों को मारते रहे। पाकिस्तान ने उद्योग-धंधों के बजाय कट्टरपंथियों को बढ़ावा दिया। निर्माण के बजाय हर चीज बाहर से खरीदते रहे। आज न हमारा व्यापार बचा और न निर्यात। न विदेशी मुद्रा भंडार है और न ही दुनिया में कोई इज्जत। विदेश में हर पाकिस्तानी को लोग आतंकवादी समझते हैं। अपना पासपोर्ट दिखाने में झेंप होती है। भारत ने खुद को सेक्युलर देश बनाकर रखा। यह सबसे बड़ी खूबी है जिसका फायदा आज पूरी दुनिया में भारत को मिल रहा है। यहां हर मजहब के लोग आ-जा सकते हैं। हर मजहब के लोगों को बराबर का अधिकार है और किसी के साथ भी कोई भेदभाव नहीं है। हर एक को आजादी है। न कोई मौलाना अपना कानून चला सकता है न ही साधु या पादरी। कानून सिर्फ संविधान का चलता है। कई बार तो लगता है कि हम यहीं होते तो बेहतर था। यकीनन आज पाकिस्तान के हालात बेहद खराब हैं। शहबाज भट्टी की हत्या ने पूरे पाकिस्तान को झकझोर दिया है। मुझे पाकिस्तान के पचासों पत्रकारों के मैसेज मिले हैं। वे सब बेहद गुस्से में हैं। सबका कहना है कि पाकिस्तान में मौलवी संस्कृति ने एक और अच्छे सियासतदान की जान ले ली। खुदा हमें इस मौलवी कल्चर से कब निजात दिलाएगा। पिछले दिनों मैं ढाका में था। आज भी वहां की जनता पाकिस्तान से नफरत करती है और भारत से मोहब्बत। जबकि बंटवारे में वह भी पाकिस्तान का ही अंग था। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
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