Saturday, March 26, 2011

अरब लीग और पश्चिम का द्वंद्व


कार्ल मार्क्‍स ने कहा था कि धर्म अफीम है। दरअसल मार्क्‍स ने यूरोप में 'र्चच और अरब में इस्लाम' के वर्चस्व के साथ- साथ आधुनिकता व लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ धर्म की रूढ़ियां स्पष्ट खड़े होते देखी थीं। यूरोप ने र्चच की सत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़कर लोकतांत्रिक दुनिया बनायी। अमेरिका ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़कर स्वयं को आधुनिकता और दुनिया की निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया। विचारणीय यह है कि अगर यूरोप-अमेरिका ने र्चच की वर्चस्व वाली सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ मुक्ति की रेखा न खींची होती तो क्या आज वह समृद्धि-विकास के इस मुकाम पर खड़े होते? शायद नहीं। दुर्भाग्य यह है कि 'धर्म की अराजक सत्ता और शक्ति' के खिलाफ अरब दुनिया में कोई खास हलचल नहीं हुई। कोई बड़ी मुहिम या आंदोलन भी तो नहीं चला। अत: जिसने भी धर्म की सत्ता के खिलाफ कोई आवाज उठायी, उसे अरब दुनिया छोड़कर यूरोप जैसी उदारवादी समाज व्यवस्था की शरण लेनी पड़ी। इसके अलावा अरब जगत में इस्लामी सत्ता ही नहीं बल्कि जीवन पद्धति को नियंत्रित करने की अराजक और खतरनाक मुहिम भी चली। इस्लाम के उदार और मानवीय पक्ष पर रूढ़ियां और मुल्लाओं की अतिरंजित विचारशीलता को गति दी गयी। दुष्परिणाम में खुद अरब दुनिया ने अपने को बंद समाज व्यवस्था का बंधक बना लिया। ऐसे में लोकतांत्रिक और मानवीय दुनिया बनती भी तो कैसे? तानाशाही और शरीयत जैसी व्यवस्था ने अरब आबादी को धर्म की रूढ़ियों और अतिरंजना का शिकार बना छोड़ा है। मिस्र, ट्यूनीशिया, बहरीन आदि देशों में आज जनता का जो गुस्सा फूटा है, उसके पीछे भी उपरोक्त कारण ही हैं। लीबिया में जिस तरह संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप पर आवाज उठी है, उसके निहितार्थ गंभीर हैं। सवाल है कि अरब दुनिया के अधिकतर देश तानाशाही व्यवस्था में क्यों और कैसे कैद हैं? क्या हम इसके लिए अरब में इस्लाम की अराजकता को कारण मान सकते हैं? या यूरोप-अमेरिका की लूटवाली व्यवस्था को? ऐसा इसलिए सोचना-विचारना पड़ता है कि अरब लीग और हमारे देश के अनेक बुद्धिजीवी अरब लीग की खतरनाक स्थिति के लिए अमेरिका- यूरोप की लूटवादी व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हैं। अमेरिका या यूरोप अरब लीग और अन्य भूभागों में तभी हस्तक्षेप या घुसपैठ करते हैं जब वहां की सरकारें आमंत्रित करती हैं। अमेरिका-यूरोप के तेल बाजार पर लूटवादी व्यवस्था इसलिए कायम हो सकी क्योंकि अरब लीग तानाशाही और शरीयत व्यवस्था में इतने अंदर तक धंसे हुए हैं कि उन्हें विज्ञान या आधुनिक बाजार व्यवस्था की दक्षता हासिल ही नहीं हो सकती है। उदाहरण के लिए अरब लीग में तेल और गैस उत्खनन ही नहीं, पूरी व्यवस्था अमेरिका-यूरोप की बडी़-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में है। अगर अरब दुनिया ने विज्ञान और आधुनिक बाजार व्यवस्था पर ध्यान देते हुए विशेष दक्षता हासिल की होती तो आज अरब लीग यूरोप-अमेरिका से कहीं अधिक विकसित और शक्तिसंपन्न होता। अरब देशों में मस्जिद, मदरसा और हज ये तीन व्यवस्थाएं तानाशाही और शरीयत वाली सत्ता की ढाल रही हैं। तानाशाही और शरीयत वाली सत्ता चाहती है कि अपनी आबादी के लिए मस्जिद, मदरसा और हज की चाक चौंबंद व्यवस्था कर देने मात्र से उनके खिलाफ आमजन की आवाज नहीं उठेगी। जब जनता में आक्रोश नहीं होगा तो फिर सत्ता को कहीं से चुनौती भी नहीं मिलेगी। अरब लीग पर ध्यान दें तो वहां कहीं पर तानाशाही तो कहीं जन्मजात राजशाही व्यवस्था है। तानाशाही और राजशाही दोनों प्रकार की सत्ता व्यवस्थाओं ने मस्जिद-मदरसा और हज की मानसिकता को तुष्ट करने के लिए अपनी सत्ता और आर्थिक शक्ति झोंकी। जहां पर शरीयत की अराजकता की मांग नहीं थी वहां पर भी पूर्ण शरीयत की व्यवस्था लागू की गई और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिरवे को पनपने ही नहीं दिया गया। बात इतनी भर नहीं है। इस आड़ में वहां आधुनिक समाज की सोच और जरूरत तक को प्रतिबंधित किया गया। शरीयत की अराजक और खतरनाक व्याख्या को भी रोकने की कोशिश नहीं हुई। तानाशाही और जन्मजात राजशाही सत्ता को यह मालूम है कि अगर शरीयत की अराजक या खतरनाक व्याख्या को रोकने की कोशिश हुई तो कटटरवादी ताकतें तूफान खड़ा कर सकती हैं। मौजूदा समय में लीबिया की तानाशाही अपनी जनता पर जिस तरह से भाड़े के सैनिकों से बमबारी करा रही थी, उससे पूरी दुनिया स्तब्ध थी। जनता को अपनी सत्ता स्थापित करने और हटाने का हक जरूर है लेकिन लीबिया के तानाशाह कर्नल गददाफी ने तेल के भंडार से मिले डॉलरों से जनता की भलाई करने की जगह अपनी अकूत संपत्ति बनाई। यूरोप के बैंक गद्दाफी के डॉलरों से गुलजार हैं। उन्होंने अंहकार-अभिमान में जनाक्रोश को न समझने की गलती की है। होस्नी मुबारक से उन्हें सबक लेने की जरूरत थी पर वे अफ्रीकी देशों से भाड़े के सैनिकों द्वारा अपने ही देश की बेगुनाह जनता पर बमबारी करवाने लगे। जिस तरह से कत्लेआम हो रहा था उससे स्पष्ट था कि लीबिया में यूएनओ का हस्तक्षेप होगा। फिलहाल लीबिया में चुनौतियां काफी जटिल होंगी। क्योंकि कर्नल गद्दाफी ने उसे दो भागों में विभाजित करने की राजनीति की थी। पश्चिमी लीबिया की आबादी कर्नल गद्दाफी के कबीले की है जो उनकी शक्ति रही है। लीबिया में नई सत्ता स्थापित करने में नेतृत्व और सत्ता में भागीदारी पर संकट खड़ा हो सकता है। इसके लिए सर्वानुमति तैयार करने की जरूरत होगी। अरब दुनिया में यूएनओ को खलनायक बनाने की नीति भी आगे बढ़ सकती है। क्योंकि अरब के विभिन्न देशों में यूएनओ के हस्तक्षेप के खिलाफ मुहिम शुरू हो चुकी है। इस मामले में भारतीय कूटनीति पर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रवाह का संरक्षण न करने का अरोप लग रहा है। ब्रिटेन और फ्रांस ने भारत के असहयोग पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। भारत ने यूएनओ में मतदान में भाग न लेकर एक तरह से लीबिया के तानाशाह का समर्थन ही किया है। अभी भी उसका रुख स्पष्ट नहीं है। वैसे भारत का कहना है कि वह लीबिया में लोकतांत्रिक पद्धति का समर्थन करता है। सवाल है कि गद्दाफी जैसा खूंखार तानाशाह जो न सत्ता छोड़ने के लिए तैयार हैं और न अपनी आबादी का कत्लेआम रोकने के लिए राजी। तो ऐसी स्थिति में वहां लोकतांत्रिक मूल्यों के अस्तित्व की बात कैसे सोची जा सकती है? अब अरब दुनिया लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं के बल पर ही सम्मान और शक्ति हासिल कर सकती है। तानाशाही और जन्मजात राजशाही व्यवस्था के दिन अब और बुरे होंगे। आज दुनिया एक गांव में तब्दील हो चुकी है। इसलिए आधुनिक विचारों के प्रवाहों को प्रतिबंधों के बाद भी रोकना आसान नहीं है। पर अरब लीग की आबादी अब भी मस्जिद-मदरसा और हज जैसी व्यवस्था से अलग होने और उदार इस्लामिक व्यवस्था में चलने के लिए तैयार नहीं दिखती। ऐसे विचारों के साथ अरब दुनिया यूरोप या अन्य समाजों से कैसे कदम मिला सकती है। लीबिया, मिस्र, बहरीन आदि देशों में बदलाव की जो लहर उठी है और तानाशाही की जो नींव जनता ने हिलायी है, उसे सलाम करना ही चाहिए। पर यह भी देखना होगा कि तानाशाही और शरीयत वाली व्यवस्था के पतन के बाद जो लोकतांत्रिक सत्ता वहां आयेगी वह वास्तव में कितनी लोकतांत्रिक होगी और उसमें अन्य धार्मिक समुदाय के लिए कितनी जगह होगी।

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