Monday, March 7, 2011

पाकिस्तान में कठमुल्ला राज


लेखक पाकिस्तान में विस्फोटक हालात के राजनीतिक-ऐतिहासिक कारणों की पड़ताल कर रहे हैं
आखिर पाकिस्तान को हो क्या गया है। जिस तरह वहां के एकमात्र ईसाई मंत्री शहबाज भट्टी को मजहबी कट्टरपंथियों ने मार डाला, उससे लगता है कि कानून का राज कठमुल्लों के आगे मजूबर हो गया है। कुछ दिन पहले ही पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर की भी हत्या कर दी गई थी। ये दोनों विवादित ईशनिंदा कानून का विरोध कर रहे थे। इस कानून में इस्लाम के विरोध पर फांसी की सजा का प्रावधान है। इसका बेजा फायदा लेकर लोग आपसी लड़ाइयों में इस्लाम विरोध की झूठी शिकायतें करके निर्दोष लोगों को फंसा देते हैं। इस कानून का सबसे ज्यादा शिकार ईसाई और हिंदू हो रहे हैं। जो समझदार मुस्लिम इस कानून का विरोध कर रहे हैं, उन्हें कट्टरपंथी लोग गोलियों से भून देते हैं, भले ही वे मंत्री हों या गवर्नर। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के पढ़े-लिखे समझदार और उदार लोग डरे-सहमे हुए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि करें क्या? भारत और पाकिस्तान के दो बड़े अखबार समूहों ने अमन की आशा नाम से एक अभियान शुरू किया है, जिसमें दोनों देशों के बीच दोस्ताना ताल्लुक कायम कराने की कोशिशें हो रही हैं। कराची में अगले हफ्ते इसका बड़ा सम्मेलन हो रहा है। सम्मेलन के एजेंडे में आतंकवाद और कट्टरपंथ सबसे सबसे ऊपर हैं। आज भारत की खासियत यह है कि इसने कट्टरंपथ पर लगाम लगा कर रखी है। हम कट्टरपंथ बढ़ने नहीं देते और धर्म या मजहब के जो लोग कट्टरपंथ फैलाने की कोशिश करते हैं उन्हें एक हद के बाद कानून के जरिए सख्ती से दबा देते हैं। पाकिस्तान इसी जगह चूक गया। कट्टरपंथ शुरू में तो लुभाता है, लेकिन बाद में यही भस्मासुर बन जाता है। जिन्ना इस बात को अच्छी तरह जानते थे, इसीलिए उन्होंने पाकिस्तान बनने तक तो मुसलमान-मुसलमान की रट पकड़े रखी, लेकिन विभाजन के बाद ऐसी नीति बनाई, जिसमें सभी धमरें के लोगों को बराबरी का दर्जा दिया गया। अल्पसंख्यक लोगों के साथ कोई भेदभाव न करने का फैसला लिया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जिन्ना की छह महीने के अंदर ही मौत हो गई और उनके बाद वहां के प्रधानमंत्री ने गैर मुसलमानों के हाथ से अधिकांश अधिकार छीन लिए। वहां के अधिकांश लोगों को उस समय यह फैसला अच्छा लगा। लेकिन इसी फैसले ने पाकिस्तान को विनाश के रास्ते पर धकेल दिया। कुछ दशक बाद जनरल जिया उल हक ने रही-सही कसर पूरी कर दी। उन्होंने पाकिस्तान को इस्लामिक गणराज्य के नाते शरीयत कानून से बांध दिया और ईश निंदा कानून तक बना डाला। इसके बाद धीरे-धीरे पाकिस्तान में मजहबी कट्टरपंथी बढ़ते गए। मौलाना इबादत करने के बजाय आतंकवादी संगठनों के मुखिया बन गए। अब पाकिस्तान में शायद ही कोई ऐसा मौलाना हो, जिसके पास दर्जनों एके-47 राइफलें न हों। ये मौलाना राइफल और बम लेकर मस्जिदों में नमाज पढ़ने जाते हैं। धीरे-धीरे इनका दबदबा इतना बढ़ गया और इनके इतने गिरोह पैदा हो गए कि आज पाकिस्तान की पुलिस और सरकार भी इनसे घबराती है। जनता तो इनसे त्रस्त है ही। जब पाकिस्तान में अल्पसंख्यक मामूली संख्या में रह गए तो बहुसंख्यक मुस्लिम आपस में ही लड़ने लगे। उन्होंने खुद को अलग-अलग समूहों में बांट लिया। शिया, सुन्नी, अहमदी एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए। क्षेत्रवाद इतना बढ़ गया कि पंजाबी, सिंधी, बलूच, पठान आपस में लड़ने लगे। पंजाबी मुसलमानों ने हिंदुस्तान से गए मुसलमानों को मुहाजिर बताकर पहले तो दसियों साल बेइज्जत किया और ऊंचे ओहदों पर नहीं आने दिया, बाद में उनकी हत्याएं कराई गईं। अकेले कराची में हजारों मुहाजिरों को गोलियों से उड़ा दिया गया। अब आलम यह है कि मस्जिदों में बम फट रहे हैं। कोई भी इंसान हिफाजत से नहीं रह सकता है। हर अमन पसंद पाकिस्तानी परेशान है। वह यदि पैसे वाला है तो दुबई या मलेशिया जाकर बस रहा है और यदि गरीब है तो अपनी किस्मत पर रो रहा है। पाकिस्तान अलकायदा और तालिबान की शरणगाह बन गया है। पूरे विश्व में पाकिस्तानियों को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। यहां के लोग विकसित देशों के वीजा को भी तरस रहे हैं। पिछले दिनों पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति फारूख लेगारी की भतीजी फरहा लेगारी दिल्ली में एक शादी में मिल गईं। उनका कहना था कि उनके जैसे लोगों के लिए वहां रहना मुश्किल हो गया है। कहां भारत दिनोदिन तरक्की करता जा रहा है। लोग उद्योग, व्यापार बढ़ा रहे हैं। यहां भारी संख्या में विदेशी कंपनियां आ रही हैं। विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर दो सौ अरब डॉलर से अधिक हो गया है। भारत ने आतंकवाद और कट्टरपंथ को काबू में कर रखा है। एक भी हिंदुस्तानी अलकायदा में नहीं है। आपके यहां सचमुच जम्हूरियत है। यह सब आपने 1947 के बाद पाया है और हमने 1947 के बाद अपने मुल्क का बेड़ा गर्क कर दिया। हम सिर्फ मजहबी कट्टरपंथ और जज्बाती बातों में फंसे रहे। दूसरे मजहबों की अच्छाइयां भी नहीं आने दीं। आतंकवादी अड्डे बनाते रहे, लोगों को मारते रहे। पाकिस्तान ने उद्योग-धंधों के बजाय कट्टरपंथियों को बढ़ावा दिया। निर्माण के बजाय हर चीज बाहर से खरीदते रहे। आज न हमारा व्यापार बचा और न निर्यात। न विदेशी मुद्रा भंडार है और न ही दुनिया में कोई इज्जत। विदेश में हर पाकिस्तानी को लोग आतंकवादी समझते हैं। अपना पासपोर्ट दिखाने में झेंप होती है। भारत ने खुद को सेक्युलर देश बनाकर रखा। यह सबसे बड़ी खूबी है जिसका फायदा आज पूरी दुनिया में भारत को मिल रहा है। यहां हर मजहब के लोग आ-जा सकते हैं। हर मजहब के लोगों को बराबर का अधिकार है और किसी के साथ भी कोई भेदभाव नहीं है। हर एक को आजादी है। न कोई मौलाना अपना कानून चला सकता है न ही साधु या पादरी। कानून सिर्फ संविधान का चलता है। कई बार तो लगता है कि हम यहीं होते तो बेहतर था। यकीनन आज पाकिस्तान के हालात बेहद खराब हैं। शहबाज भट्टी की हत्या ने पूरे पाकिस्तान को झकझोर दिया है। मुझे पाकिस्तान के पचासों पत्रकारों के मैसेज मिले हैं। वे सब बेहद गुस्से में हैं। सबका कहना है कि पाकिस्तान में मौलवी संस्कृति ने एक और अच्छे सियासतदान की जान ले ली। खुदा हमें इस मौलवी कल्चर से कब निजात दिलाएगा। पिछले दिनों मैं ढाका में था। आज भी वहां की जनता पाकिस्तान से नफरत करती है और भारत से मोहब्बत। जबकि बंटवारे में वह भी पाकिस्तान का ही अंग था। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)


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