Thursday, March 24, 2011

उदार होने का समय


यह सुखद है कि प्रगतिशील मुसलिमों की संख्या बढ़ रही है
अब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अमेरिका जिस तरह अपनी छवि बदलने में लगा है, उससे मोदी के बारे में वस्तानवी की टिप्पणी तो फिर से प्रासंगिक हो ही गई है, इस संदर्भ में देवबंद के भीतरी संघर्ष को देखना भी जरूरी हो गया है।
वर्ष 1857 के विद्रोह में मुसलिम धार्मिक नेताओं के मार्गदर्शन का विशेष रूप से योगदान रहा है। ये मुसलिम नेता मुख्य रूप से वहाबी आंदोलन से जुड़े थे। दरअसल वहाबियों ने 1857 के बहुत पहले ही उत्तर भारत के तमाम नगरों में अपने केंद्र बना लिए थे। इसलिए जब विद्रोह प्रारंभ हुआ, तो इन नगरों में बड़ी आसानी से वहाबियों को कमांड संभालने में सफलता मिल गई थी।
वहाबियों का ऐसा ही एक केंद्र मेरठ के पास शामली में था। विद्रोह में यहां के वहाबियों ने भी दूसरे केंद्रों की तरह स्थानीय अंगरेजी तोपखाने पर हमला बोला था। विद्रोह के विफल हो जाने के बाद शामली के वहाबी नेता मुल्क छोड़कर अरब चले गए। पर उनमें से एक मोहम्मद कासिम हिंदुस्तान में ही रुक गए। उन्हीं कासिम ने इसलामी शिक्षा के लिए देवबंद में एक दारूल-उलूम की स्थापना की। यहीं से देवबंद का इतिहास प्रारंभ होता है, जो इस समय खबरों में है।
यह एक दिलचस्प बात है कि जब 1888 में सर सैयद अहमद खां ने मुसलिमों को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग करने के लिए पेट्रिऑटिक एसोसिएशन बनाई थी, तब लुधियाना के वहाबियों ने कांग्रेस के समर्थन में सौ से ज्यादा फतवों की एक किताब प्रकाशित की। इनमें से दो फतवे देवबंद नेताओं के थे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान देवबंद के दारूल-उलूम के प्रधान मौलाना महमूद उल हसन ने अपने छात्रों और अध्यापकों के साथ मिलकर अंगरेजों के विरुद्ध एक योजना बनाई। वह योजना अफगानिस्तान और टर्की साम्राज्य से मिलकर ब्रिटिशों को हिंदुस्तान से खदेड़ने की थी। उस योजना से जुड़े क्रांतिकारी रेशमी रूमाल पर सूचनाएं भेजते थे। इसलिए अंगरेजों ने उस योजना को रेशमी रूमाल षडंत्रकी संज्ञा दी थी। वर्ष 1916 में देबबंद के दारूल- उलूम के प्रधान के इस साजिश का भेद खुल गया। महमूद उल हसन अपने सभी देवबंदी साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए तथा उन्हें माल्टा जेल भेज दिया गया। वर्ष 1919 में रिहा होकर जब ये क्रांतिकारी मुंबई पहुंचे, तब महात्मा गांधी और दूसरे राष्ट्रीय नेताओं ने वहां उनका भव्य स्वागत किया। उसी साल महमूद उल हसन की मृत्यु हो गई, लेकिन उनके शिष्य मौलाना हुसैन अहमद मदनी गांधी के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में संघर्ष करते रहे।
इसलाम के बारे में गांधी ने मौलाना मदनी से बहुत कुछ जाना। गांधी का यह दृढ़ विश्वास था कि इसलाम का आधार अहिंसा है। उनसे जुड़े अली बंधु-मुहम्मद और शौकत अली, खान अब्दुल गफ्फार खान, हकीम अजमल खान, इमाम साहब अब्दुल कादिर मौलाना आजाद, डॉ. अंसारी आदि के अतिरिक्त तमाम देवबंदी मौलवी भी यही मानते थे। वर्ष 1920 में गांधी ने उलेमाओं की एक बैठक दिल्ली में बुलाई थी। वहां सभी इस नतीजे पर पहुंचे थे कि हिंसा के मुकाबले इसलाम ने हमेशा अहिंसा को ही पसंद किया है। उलेमाओं का यह प्रस्ताव कांग्रेस के अहिंसा प्रस्ताव से पहले आया था। आजादी की लड़ाई में गांधी के साथ जुड़े मुसलिम नेताओं में अधिकांश धर्मिक थे और वे देश विभाजन के विरोधी थे। जबकि ब्रिटिश शिक्षा से प्रभावित और आधुनिक लगने वाले इकबाल, जिन्ना और लियाकत अली विभाजन के हिमायती थे।
दारूल उलूम इस समय वस्तानवी के समर्थक और विरोधी गुटों में बंटा दिखाई पड़ता है। वस्तानवी की छवि एक उदारवादी सुलझे हुए इनसान की है, जिन्होंने मोहतमिम बनने के बाद मदरसा प्रणाली को नए जमाने के अनुकूल बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए। साफ है कि देवबंद का यह विवाद उदारवादी तथा पुरातनपंथियों के बीच है। इससे साफ लगता है कि दारूल उलूम पर प्रगतिशील मुसलमानों का प्रभाव कम नहीं है।
वस्तानवी स्वयं गुजराती होने के कारण गुजरात को करीब से जानते हैं। गुजरात की प्रगति से प्रभावित होकर निर्भीकता से जो बयान उन्होंने दिया, उससे किसी का विरोध नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री होने के नाते इस प्रगति में नरेंद्र मोदी का भी योगदान अवश्य रहा होगा। लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि गुजरात की हिंसा की जिम्मेदारी से नरेंद्र मोदी को बरी नहीं किया जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे, इंदिरा गांधी की हत्या की प्रतिक्रिया में भारी संख्या में सिख मारे गए थे और इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस पर जाती है। ऐसे में वस्तानवी के बयान से लगता है कि गुजरात ने सब कुछ भुलाकर मोदी को क्षमा कर दिया है। ऐसा करके वह जनमानस की नजरों में बहुत ऊंचा उठ गए हैं।
यह सुखद है कि भारतीय मुसलिम समुदाय में भी इस समय उदारवादियों की संख्या बढ़ रही है। बाबरी विध्वंस से जुड़े निर्णय के समय हिंदू-मुसलिम सहित देश की संपूर्ण जनता ने अपनी परिपक्वता दिखाई। इस मुद्दे को अब देश की जनता उस तरह का महत्व नहीं देती, जैसा पहले देती थी। समय का तकाजा है कि राजनीतिक पार्टियां इसे समझें। लोकतंत्र की बहाली के लिए इसलामी मुल्कों में जो सैलाब उठा है, उसमें मुसलिम समुदाय अपने यहां के सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर चल रहा है। कट्टरवाद के विरुद्ध जंग छिड़ चुकी है, फिर चाहे वह मुसलिम कट्टरवाद हो या हिंदू कट्टरवाद। इस समय वस्तानवी जैसे उदारवादी मुसलिम धार्मिक नेताओं की तुलना में अधिक संख्या में लगते हैं। जनता और मीडिया को इनका समर्थन करना चाहिए।

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