Saturday, March 12, 2011

उदारवादी तबके की शामत है पाकिस्तान में


इस्लामाबाद में कुछ दिन पहले अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज भट्टी की हत्या और पाकिस्तान से अल्संख्यकों के लगातार पलायन को एक साथ देखे जाने की जरूरत है। दरअसल तालिबान के लोग जबसे पाकिस्तान में सक्रिय हुए हैं, वहां उदारवादी तबके की शामत आई है। भले ही वे किसी धर्म को मानने वाले हों। भट्टी साहब पाकिस्तानी संसद के अकेले कैथोलिक क्रिश्चियन सदस्य और ईश निंदा कानून के मुखर आलोचक थे। इससे पूर्व मारे गए पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर भी उदारवादी धड़े के थे और धार्मिक कट्टरता के कट्टर विरोधी थे। समस्या यह है कि पाकिस्तानी सरकार भी अक्सर कट्टरवादी ताकतों को शह देती दिखती है। यहां तक कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में जो भी हो रहा है वह सरकार की मर्जी पर ही हो रहा है। देखने में यह भी आया कि पंजाब हाईकोर्ट के अधिकांश वकील सलमान तासीर को मारने वाले के पक्ष में रैली में शामिल हुए। इन वकीलों में हत्यारे के पक्ष में मुकदमा लड़ने की होड़ थी। कानून की समझ रखने वाले ही अगर ऐसी सोच रखते हैं तो फिर हालात का बिगड़ना तय समझिए। सत्ता और सामाजिक-राजनीतिक-कानूनी प्रतिष्ठानों में पैठ रही धार्मिक कट्टरता का खामियाजा यों पूरा देश भुगत रहा है लेकिन अल्पसंख्यक जिनमें खासकर हिंदू अधिक हैं, खुद को ज्यादा असुरक्षित समझ रहे हैं। एक रिपोर्ट आई है कि पाकिस्तान से रोजाना एक हिंदू परिवार पलायन कर रहा है। यह रिपोर्ट अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान के अधिकांश हिंदू देश छोड़ने पर विचार करते हैं और ज्यादातर मजबूरीवश ही वहां रहते हैं। आज पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों का पलायन काफी तेज हो रहा है। आम अल्पसंख्यकों को तो छोड़िए, कुछ ही दिन पहले सिंध प्रांत की विधानसभा के एक सदस्य राम सिंह सोढ़ो ने भारत से अपना इस्तीफा भेज दिया। हालांकि इस्तीफे का कारण उन्होंने तबीयत खराब होना बताया लेकिन कोई भी समझ सकता है कि तबीयत खराब होना तो इस्तीफे का कारण हो सकता है, लेकिन इसके लिए देश छोड़ने की जरूरत नहीं थी। यह भी नहीं कि वे भारत में इलाज कराने गए हैं। बस उन्हें पाकिस्तान छोड़ना था और इसके पीछे असुरक्षा की भावना ही थी। इससे पहले भी वहां की विधानसभा के चार सदस्य देश छोड़ चुके थे। अतीत में झांके तो पाकिस्तान के पहले विधि मंत्री जगन्नाथ मंडल भी भारत में आकर बस गए थे। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार सभी धर्मों के लोग बराबर हैं और सबको धर्म की मुकम्मल आजादी है। फिर ऐसा क्यों है कि अल्पसंख्यक वहां खुद को सुरक्षित नहीं समझते। दरअसल वहां कोई भी संविधान की परवाह नहीं करता और कानून से खिलवाड़ करना एक शौक की तरह बनता जा रहा है। वहां धार्मिक मुद्दे पर आनन-फानन में गोलबंदी हो जाती है। ताजे माहौल में वहां हिंदू एक तो आतंकवाद से उपजी असुरक्षा की भावना से भरे हैं, दूसरा उन्हें भय है कि ईश निंदा कानून का जम कर दुरुपयोग होगा। मेरी राय में पाकिस्तान में संविधान की सभी इज्जत करें और तालिबानी ताकतों को उखाड़ फेंकें। अगर ये दोनों बाते संभव हो जाएं तो मैं नहीं समझता कि कोई ईश निंदा कानून की वकालत करेगा। फिर हमें अपनी विदेश नीति में भी सुधार लाना होगा। अभी हालत यह है कि जो भी भारत जाए, उसे जासूस समझा जाता है। शायद यही हाल भारत में भी है। यकीनन यह स्थिति बदलनी चाहिए। वीजा नीति उदार हो और दोनों देशों के लोग आसानी से एक-दूसरे देश जा सकें। यह पलायन रुकने की प्रत्यक्ष नहीं लेकिन परोक्ष वजह जरूर हो सकती है। पाकिस्तान में आज ज्यादातर हिंदू सिंध और बलूचिस्तान में रहते हैं। इन दोनों प्रांतों की स्थिति ज्यादा अराजक है। यहां हिंदुओं के अपहरण की वारदातें भी आम हैं। पाकिस्तानी शासन को समझना होगा कि अगर वे जिन्ना का आदर्श पाकिस्तान बनाना चाहते हैं तो वहां संकीर्णताओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और हर नागरिक से बराबर सलूक किया जाना चाहिए। (कुंभर पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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