उदारवादी नेता माने जाने वाले, पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के कोई दो महीने बाद बुधवार को इस्लामाबाद में पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी का दिन दिहाड़े किया गया कत्ल ऐसी घटना है जिसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। ऐसा इसलिए नहीं कि भट्टी सिर्फ बहुचर्चित ईशनिंदा कानून के मुखर आलोचक थे, बल्कि वे साहसी युवा नेता थे और कट्टरपंथी तत्वों और आतंकवादियों से बेखौफ भी थे। यह सुकूनतलब है कि अमेरिका, वेटिकन व यूरोपीय देशों के अलावा पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी एवं प्रधानमंत्री यूसुफ अली गिलानी ने भी घटना की तल्ख शब्दों में निंदा की है तथा चरमपंथियों और आतंकियों के सामने नहीं झुकने का ऐलान किया है। मगर उदार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान रखने वाले एक गवर्नर और कुछ समय बाद ही केंद्रीय मंत्री की हत्या ऐसा मुद्दा है जो यह गम्भीर सवाल जरूर छोड़ता है कि तमाम दृढ़ संकल्पों और बाहरी मदद के बाद भी पाकिस्तान के शासन-प्रशासन तंत्र में ऐसी क्या खामियां हैं जिनसे कट्टरपंथी काबू होने के बजाय और ताकतवर एवं प्रभावी होते जा रहे हैं? इसका जवाब यही समझ में आता है कि पाकिस्तानी नेताओं की कथनी-करनी में अंतर, और नीयत में भारी खोट है। किसी धर्म के प्रवर्तक या अभीष्ट की निंदा ऐसा कार्य नहीं जिसकी खुली छूट होनी चाहिए पर किसी धर्म को मानने या न मानने की किसी पर बाध्यता तो बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तानी ईशनिंदा कानून में इबाहतगाहों को अपवित्र करने, मजहबी भावनाएं भड़काने, पैगम्बर हजरत मोहम्मद की आलोचना व कुरान शरीफ को क्षति पहुंचाने जैसे अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है। ब्रिटिश सरकार द्वारा 1927 में अमल में लाए गए इस कानून में पैगम्बर की निंदा के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है। इसके मद्देनजर कानून का पहला प्रावधान इबादतगाहों से जोड़ा गया। यह सभी प्रार्थनास्थलों को संरक्षण प्रदान करता है। कालांतर में 1980 में जनरल जियाउल हक के शासनकाल में इसे और सख्त बना दिया गया। पर आज तक इस कानून के तहत पाकिस्तान में शायद ही कभी किसी अन्य धर्मावलम्बी के उपासना स्थल को क्षतिग्रस्त या अपवित्र किए जाने पर किसी मुसलमान को कोर्ट से कोई दंड मिला हो। यद्यपि पाकिस्तान में आए दिन वहां बचे-खुचे मंदिर, गुरुद्वारे और गिरजाघरों को अपवित्र किया जाता रहता है। मंदिर क्या अब तो वहां हिंदू भी लुप्तप्राय श्रेणी में पहुंच गए हैं। देश में ईसाई 1.6 फीसद हैं। ईशनिंदा कानून का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें कुरान की प्रति या उसके किसी हिस्से को क्षति पहुंचाने के कथित मामलों में आरोपित के इरादे के सबूत की जरूरत नहीं होती। ऐसे मामले में सुनवाई मुस्लिम जज ही करता है जो किसी बहुधर्मी समाज में पूरी तरह से गलत है। भट्टी ईसाई जरूर थे लेकिन वह इंसानियत के खैरख्वाह पहले थे। क्या ऐसे व्यक्ति को जीने का हक नहीं है?
Friday, March 4, 2011
हत्या से उपजे सवाल
उदारवादी नेता माने जाने वाले, पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के कोई दो महीने बाद बुधवार को इस्लामाबाद में पाकिस्तान के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी का दिन दिहाड़े किया गया कत्ल ऐसी घटना है जिसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। ऐसा इसलिए नहीं कि भट्टी सिर्फ बहुचर्चित ईशनिंदा कानून के मुखर आलोचक थे, बल्कि वे साहसी युवा नेता थे और कट्टरपंथी तत्वों और आतंकवादियों से बेखौफ भी थे। यह सुकूनतलब है कि अमेरिका, वेटिकन व यूरोपीय देशों के अलावा पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी एवं प्रधानमंत्री यूसुफ अली गिलानी ने भी घटना की तल्ख शब्दों में निंदा की है तथा चरमपंथियों और आतंकियों के सामने नहीं झुकने का ऐलान किया है। मगर उदार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान रखने वाले एक गवर्नर और कुछ समय बाद ही केंद्रीय मंत्री की हत्या ऐसा मुद्दा है जो यह गम्भीर सवाल जरूर छोड़ता है कि तमाम दृढ़ संकल्पों और बाहरी मदद के बाद भी पाकिस्तान के शासन-प्रशासन तंत्र में ऐसी क्या खामियां हैं जिनसे कट्टरपंथी काबू होने के बजाय और ताकतवर एवं प्रभावी होते जा रहे हैं? इसका जवाब यही समझ में आता है कि पाकिस्तानी नेताओं की कथनी-करनी में अंतर, और नीयत में भारी खोट है। किसी धर्म के प्रवर्तक या अभीष्ट की निंदा ऐसा कार्य नहीं जिसकी खुली छूट होनी चाहिए पर किसी धर्म को मानने या न मानने की किसी पर बाध्यता तो बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तानी ईशनिंदा कानून में इबाहतगाहों को अपवित्र करने, मजहबी भावनाएं भड़काने, पैगम्बर हजरत मोहम्मद की आलोचना व कुरान शरीफ को क्षति पहुंचाने जैसे अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है। ब्रिटिश सरकार द्वारा 1927 में अमल में लाए गए इस कानून में पैगम्बर की निंदा के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है। इसके मद्देनजर कानून का पहला प्रावधान इबादतगाहों से जोड़ा गया। यह सभी प्रार्थनास्थलों को संरक्षण प्रदान करता है। कालांतर में 1980 में जनरल जियाउल हक के शासनकाल में इसे और सख्त बना दिया गया। पर आज तक इस कानून के तहत पाकिस्तान में शायद ही कभी किसी अन्य धर्मावलम्बी के उपासना स्थल को क्षतिग्रस्त या अपवित्र किए जाने पर किसी मुसलमान को कोर्ट से कोई दंड मिला हो। यद्यपि पाकिस्तान में आए दिन वहां बचे-खुचे मंदिर, गुरुद्वारे और गिरजाघरों को अपवित्र किया जाता रहता है। मंदिर क्या अब तो वहां हिंदू भी लुप्तप्राय श्रेणी में पहुंच गए हैं। देश में ईसाई 1.6 फीसद हैं। ईशनिंदा कानून का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें कुरान की प्रति या उसके किसी हिस्से को क्षति पहुंचाने के कथित मामलों में आरोपित के इरादे के सबूत की जरूरत नहीं होती। ऐसे मामले में सुनवाई मुस्लिम जज ही करता है जो किसी बहुधर्मी समाज में पूरी तरह से गलत है। भट्टी ईसाई जरूर थे लेकिन वह इंसानियत के खैरख्वाह पहले थे। क्या ऐसे व्यक्ति को जीने का हक नहीं है?
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