मदरसों को शिक्षा के अधिकार (आरटीइ) कानून के तहत लाए जाने को लेकर परस्पर विरोधाभासी बयानों से खफा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र सरकार को रमजान के बाद आंदोलन की धमकी दी है। पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जफरयाब जिलानी ने सोमवार को कहा कि एक ओर केंद्र कह रहा है कि मदरसा और अन्य धार्मिक संगठनों को आरटीइ एक्ट से के दायरे से बाहर रहेंगे, लेकिन कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि मदरसे स्कूल के दायरे में ही आएंगे यानी उन पर यह अधिनियम लागू होगा। जिलानी ने कहा कि मदरसों को नोटिस देकर कहा गया है कि वे छह कमरों, खेल के मैदान, लाइब्रेरी जैसे मानक पूरे करें। तीन साल के भीतर ऐसा न करने पर मदरसों या अन्य पर जुर्माना या उन्हें बंद करने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि बोर्ड की अक्टूबर या नवंबर में होने वाली बैठक में आगे की रणनीति तय की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि आरटीई एक्ट की धारा 8 और 9 पाठ्यक्रम में बदलाव का अधिकार भी मदरसों से छीनकर केंद्र या स्थानीय संस्थाओं को देने की बात कही गई है। जिलानी ने आरोप लगाया कि मदरसों की प्रबंधन कमेटी में अल्पसंख्यक समुदाय के एक सदस्य को नियुक्त करने का अधिकार भी उनसे छीन लिया गया है।
Wednesday, August 17, 2011
सात साल में पहली बार वेतन संकट में एनसीएमईआइ
नई दिल्ली अल्पसंख्यकों की तालीम और तरक्की के सरकारी दावे अपनी जगह हैं, लेकिन देश में शैक्षणिक संस्थानों का अल्पसंख्यक दर्जा तय करने वाले आयोग के सामने खुद सरकार ने ही नया संकट खड़ा कर दिया है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (एनसीएमइआइ) के गठन के बाद सात साल में पहला मौका है, जब उसके कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं मिल पा रही है। सरकार ने आयोग को हर तिमाही मिलने वाला अनुदान रोक दिया है। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आयोग का जुलाई से सितंबर का अनुदान अब तक नहीं दिया है। नतीजा यह है कि आयोग के लगभग ढाई दर्जन कर्मचारियों को अगस्त में मिलने वाली तनख्वाह नहीं मिल सकी है। यह स्थिति तब है, जब आयोग ने अनुदान की धनराशि न मिलने की स्थिति में अगस्त का वेतन न बंट पाने की बाबत मंत्रालय को जुलाई में ही आगाह कर दिया था। अल्पसंख्यक संस्थानों से जुड़े मामलों के विवादों को निपटाने वाले इस आयोग को मंत्रालय सालाना 2.44 करोड़ का अनुदान देता है। जुलाई से सितंबर की तिमाही के लिए उसे 80 लाख रुपये अनुदान की दरकार है। जानकार सूत्र बताते हैं कि आयोग की इस अनदेखी के पीछे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास कोई ठोस वजह नहीं है। आयोग के लिए रजिस्ट्रार का एक पद स्वीकृत है। वह पद खाली पड़ा है। आयोग स्वायत्तशासी है, लिहाजा उसने तात्कालिक जरूरतों के मद्देनजर एक सलाहकार की नियुक्ति जरूर कर रखी है। मंत्रालय को शायद वह नियुक्ति नहीं पच रही है। इस बारे में आयोग के चेयरमैन जस्टिस एमएसए सिद्दीकी का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हो सके। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग के सालाना खर्चे का आडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) करता है। उसकी रिपोर्ट संसद में पेश होती है। उस स्तर पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई है। गौरतलब है कि आयोग ने इसी साल जामिया विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक होने का फैसला सुनाया है। जबकि बीते महीने ही उसने दिल्ली में सिख समुदाय से संचालित चार कॉलेजों के भी अल्पसंख्यक दर्जे के होने का फैसला दिया है।
Friday, August 12, 2011
IUML accused of riots THIRUVANANTHAPURAM DC CORRESPONDENT
The United Democratic Front government's decision to wind up the M.A. Nissar commission probing the Kasargod firing incident has generated further controversy with two police officers deposing before the panel that the Indian Union Muslim League activists had conspired to set off communal riots in the entire Malabar region.
The police officers including the then Kasargod SP, Mr Ramdass Pothen, to the commission, alleged that Muslim League had hatched the conspiracy in connivance with certain extremist elements.
The cops justified the firing saying that the action was initiated to prevent a communal flare up in the region. With the statements of police now becoming public, the UDF government decision to wind up the Nissar commission has raised doubts. It has also added strength to the allegations that the commission had been wound up in the wake of damning revelations against the Muslim League. Stung by the allegations, the Muslim League leadership closed ranks. “We could not have allowed a person who contested as a CPI(M) candidate in a local bodies poll, to continue as the commission,“ said the industry minister, Mr P.K.
Kunhalikutty. “The decision to constitute the commission was itself politically motivated.“
The IUML general secretary, Mr E T Mohammad Basheer, said these were statements of the accused.
“Don't make it weapon for propaganda,“ he said, justifiying the winding up of the commission saying that it had a clear political objective.
Meanwhile, Justice Nissar said in Kozhikode that he had not received any official communication from the government regarding the winding up of the Commission.
He said the commission had only recorded the statements of the police including the then Kasargod SP Ramdass Pothen. The statements of the political leaders had not been recorded yet, he said adding that he had not acted with political bias.
Thursday, August 4, 2011
Wednesday, August 3, 2011
Monday, August 1, 2011
बंगाल में बढ़ेगा मुस्लिम कोटा
कोलकाता मां-माटी-मानुष के नारे के बल पर पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई ममता बनर्जी अब खुद को अल्पसंख्यकों का हमदर्द साबित करने में जुट गईं हैं। उन्होंने एलान किया है कि तृणमूल सरकार अल्पसंख्यकों के विकास और उन्हें उनका वाजिब हक देने के लिए प्रतिबद्ध है। अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने और उनके विकास के लिए विधानसभा में तीन माह के भीतर बिल पेश किया जाएगा। ममता ने अल्पसंख्यकों से जुड़े विशेष प्रावधानों की सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू के लिए न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राजेंद्र सच्चर के साथ चर्चा की। उन्होंने अल्पसंख्यकों को 82 करोड़ रुपये ऋण देने और 122 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति के अलावा 7.5 लाख अल्पसंख्यक छात्रों के लिए शिक्षा ऋण देने की भी घोषणा की। ममता ने अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में 7200 आंगनवाड़ी केंद्रों और इंदिरा आवास योजना के तहत 37,300 मकानों के भी निर्माण की घोषणा की। ममता बनर्जी ने शनिवार को यहां अल्पसंख्यक विकास व वित्त निगम द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा, पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार ने अपने लंबे शासनकाल में मुस्लिमों को गुमराह करते हुए हर क्षेत्र में विकास से वंचित रखा। गत वर्ष विस चुनाव के कुछ पहले फरवरी माह में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के आधार पर ओबीसी कोटे के तहत मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में दस प्रतिशत आरक्षण का लालच दिया था, वह छलावा था। वामो द्वारा तैयार बिल के मसौदे को भ्रामक करार देते हुए उन्होंने पिछली वाममोर्चा सरकार ने रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमानों को लाभ पहुंचाने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण 10 फीसदी बढ़ा दिया था। इसमें अल्पसंख्यक समुदाय का स्पष्ट जिक्र नहीं था। वह न तो इसे सही ढंग से तैयार कर सके और न ही राज्यपाल से इस पर मंजूरी की मुहर लगवा सके। ममता ने कहा, हमारी सरकार तय समय में समुदाय के लोगों को उनका वाजिब हक देने पर प्रतिबद्ध है। सरकार पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार के प्रयासों पर नए सिरे से विचार करेगी। उन्होंने कहा, कुछ कानूनी जटिलताएं हैं। चूंकि अल्पसंख्यक और अन्य पिछड़ा वर्ग दो अलग अलग शाखाएं हैं, इसलिए विधेयक को समग्र बनाने के लिए दोनों की सहमति जरूरी है। इसके लिए विशेषज्ञ समिति के गठन के कदम उठाए जा रहे हैं ताकि पूर्व की गलतियों को दूर कर नए प्रावधान शामिल करते हुए विधेयक तैयार किया जा सके। बाद में उन्होंने टाउन हाल में अल्पसंख्यकों के विकास तथा आरक्षण की सिफारिश करने वाले सच्चर कमेटी के अध्यक्ष जस्टिस राजेन्द्र सिंह सच्चर के साथ लंबी बैठक की। एक घंटे चली बैठक के बाद उन्होंने बताया कि सच्चर के साथ मंत्रणा सकारात्मक रही। उन्होंने राज्य में मुसलमानों की शिक्षा-संस्कृति-रोजगार की उपलब्धता आदि मुद्दों पर जानकारी हासिल की तथा मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर खास डाटा तैयार करने का परामर्श दिया। सरकार ने जॉब डाटा बैंक तैयारी समेत उनके अन्य सुझावों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया है।
Tuesday, July 26, 2011
पहले ही तय हो गया था वस्तानवी का इस्तीफादेवबंद
दारुल उलूम के मोहतमिम बनाए गए मौलाना अबुल कासिम नोमानी का कहना है कि 23 फरवरी को हुई शूरा की बैठक में ही यह तय हो गया था कि जांच कमेटी की रिपोर्ट चाहे जो आए मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी इस्तीफा देंगे। इदारे के 11वें मोहतमिम का पदभार ग्रहण करने के बाद रविवार देर शाम उन्होंने दैनिक जागरण से लंबी बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश। सवाल : जांच कमेटी ने क्या रिपोर्ट पेश की? जवाब : जांच कमेटी ने नरेंद्र मोदी के संबंध में मौलाना वस्तानवी से संबंधित बयान एवं मदरसा छात्रों से संबधित हंगामा आदि के तथ्य प्रस्तुत किये। सवाल : कमेटी ने रिपोर्ट अलग- अलग पेश की? जवाब : जी नही तीनों सदस्यों ने संयुक्त रूप से रिपोर्ट पेश की। सवाल : शूरा ने इस्तीफे के लिए वस्तानवी पर दबाव बनाया? जवाब : जी नहीं, शूरा ने कोई दबाव नहीं बनाया। मौलाना वस्तानवी ने खुद कहा था कि मैं अगली बैठक में इस्तीफा दे दूंगा। सवाल : तो जांच कमेटी क्यों गठित की गई?जवाब : मौलाना वस्तानवी ने 23 फरवरी की बैठक में आग्रह किया था, उन्होंने शूरा से वक्त मांगा था इसलिए जांच कमेटी का गठन किया गया था। यह भी तय हो गया था कि जांच कुछ भी आये में वह इस्तीफा देंगे।सवाल : इस्तीफा देने की बात मौलाना वस्तानवी ने क्यों की? जवाब : जब दस जनवरी को नरेंद्र मोदी की हिमायत करने के आरोपों को लेकर हंगामा हुआ तो 15 जनवरी को उन्होंने खुद इस्तीफे की पेशकश की थी। सवाल : इस बार की शूरा की बैठक में इस्तीफा एजेंडे में था? जवाब : नहीं ऐसा नहीं है। 23 फरवरी को जो मजलिस-ए-शूरा की एक दिवसीय आपातकाल बैठक हुई थी, बैठक मौलाना वस्तानवी के इस्तीफा देने की पेशकश पर ही बुलाई गई थी। यदि मौलाना वस्तानवी शूरा से समय न मांगते तो उसी समय सबकुछ तय हो जाता। सवाल : ऐसा मौलाना वस्तानवी ने क्यों किया? जवाब : वस्तानवी साहब चाहते थे कि उन्हें समय मिले, इसीलिए उन्होंने जांच कमेटी का गठन करने का आग्रह किया थे। सवाल : मौलाना वस्तानवी का इसके पीछे कोई उद्देश्य? जवाब : जाहिर है वस्तानवी साहब चाहते थे कि उनकी विदाई सही तरीके से हो। किसी तरह का कोई मसला खड़ा न हो। सवाल : क्या आप दारुल उलूम में आधुनिक शिक्षा के पक्षधर हैं? जवाब : जी नहीं आधुनिक शिक्षा के लिए बहुत शिक्षण संस्थाएं हैं। दारुल उलूम में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा। न ही परिवर्तन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उनकी कोई प्राथमिकता नहीं है सिर्फ दारुल उलूम को आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट जाएंगे वस्तानवी समर्थक
: वस्तानवी के समर्थकों ने मजलिस-ए-शूरा का पुतला फूंक कर यह संदेश दिया है कि विरोध के स्वर थमने वाले नहीं हैं। वस्तानवी समर्थकों ने उनके पक्ष में जमकर नारेबाजी की। वस्तानवी समर्थक रिहानुलहक ने कहा कि शूरा की बैठक को खुली चुनौती देते हुए कहा कि वह फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट जायेंगे तथा आखिर तक इंसाफ की लड़ाई लड़ेंगे। उन्होंने शूरा पर यह भी आरोप लगाया कि दारुल उलूम के संविधान के मुताबिक शूरा का फैसला नहीं हुआ है। फैसले से वस्तानवी के पदच्युत किए जाने से इदारे के अंदरूनी हालात पहले जैसे कतई नहीं रहेंगे। दरअसल, वस्तानवी विरोधी व समर्थक तलबा में खटास बढ़ सकती है। दारुल उलूम के बाहर भी यही हालात हैं। मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को मोहतमिम बनाए जाने के बाद से ही दारुल उलूम में छात्र दो फाड़ हो गए थे। इसके चलते पंद्रह छात्रों का निलंबन भी किया गया था। आज वस्तानवी की बर्खास्तगी पर विरोधी छात्रों ने वस्तानवी वापस जाओ के नारे लगाए जबकि समर्थकों ने जिंदाबाद बोला। जाहिर है कि छात्र दो गुटों में बंट गए हैं। दारुल उलूम के बाहर भी समर्थन और विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं।वहीं मजलिस-ए-शूरा द्वारा मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी को मोहतमिम पद से हटाये जाने पर उलेमा ने मिलीजुली राय जाहिर की है। हालांकि कुछ उलेमा ने किसी तरह की प्रतिक्रिया देने से इंकार किया है। उधर, जमीयत उलेमा हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने साफ तौर पर कहा है कि इस विवाद से हमारा कोई संबंध नहीं है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य मौलाना मुहम्मद इस्लाम कासमी ने कहा कि शूरा सुप्रीम पॉवर है। शूरा जो फैसला लेती है सही लेती है। उन्होंने सवाल भी उठाया कि जो फैसला पहले शूरा ने लिया था क्या उसमें कहीं चूक हुई थी? दारुल उलूम वक्फ के उस्ताद मुफ्ती मुहम्मद आरिफ का कहना है कि शूरा को पहले सोचना चाहिए था कि क्या उसने जो फैसला लिया है वह सही है या गलत। पहले मोहतमिम बनाया गया, बाद मे हटा दिया गया जो समझ से बाहर है। दारुल उलूम वक्फ के उस्ताद मौलाना अब्दुल लतीफ कासमी का कहना है कि शूरा ने दबाव में फैसला किया। पहले मोहतमिम बनाया फिर बर्खास्त कर दिया गया। यह शूरा की कमजोरी है। उधर जमीयत उलेमा हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि इस संबंध में मजलिस-ए-शूरा ही फैसला लेने के लिए अधिकृत है। मदनी ने कहा कि हमारा मोहतमिम विवाद से कोई लेना देना नहीं है।
दारुल उलूम किसी खानदान की जागीर नहीं : वस्तानवी
मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने मीडिया का आभार व्यक्त करते हुए साफ तौर पर कहा कि दारुल उलूम किसी खानदान विशेष की जागीर नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं। मैं एक सीधा सादा इंसान हूं। मदरसे व कालेज चलाता हूं। मेरा यही मकसद है कि दारुल उलूम तरक्की करे तथा यहां अमन कायम रहे। उन्होंने कहा कि मोहतमिम का पद मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। मैं तो दारुल उलूम का सेवक हूं और सेवा करता रहूंगा। उन्होंने यह भी कहा कि तलबा का प्रयोग किया गया जो गलत है।
इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहा मलेशिया
मलेशिया में हुए एक नए सर्वेक्षण में पता लगा है कि देश के ज्यादातर युवा अपने संविधान की जगह कुरान को देश चलाने का जरिया बनाना चाहते हैं। एक स्वतंत्र मत सर्वेक्षण कंपनी मर्डेका सेंटर द्वारा किए गए इस सर्वे से पता लगा है कि पूर्वी एशिया का यह देश तेजी के साथ सामाजिक रूप से कट्टरपंथी होता जा रहा है। ये नया सर्वेक्षण उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए चिंता का विषय है जो लंबे समय से चेताते रहे हैं कि देश का इस्लामीकरण होता जा रहा है। सर्वेक्षण में यह भी पता लगा है कि अधिकतर युवा अपराधियों के लिए अधिक कड़ी सजाएं चाहते हैं। दस में से सात लोगों का कहना है कि चोरों के हाथ काट देने चाहिए. अधिकतर मानते हैं कि शराब पीने पर कोड़े लगाए जाना सही होगा। इसमें एक अनोखी बात जो सामने आई है वह यह है कि कि मलेशिया के ये मुसलमान धार्मिक परंपराओं का पालन करने में उतने सख्त नहीं हैं। सर्वेक्षण में करीब 70 प्रतिशत लोगों का कहना है कि वो नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद जाने की अपेक्षा घर पर टीवी देखना अधिक पसंद करते हैं। रजाली कहते हैं, आप हमसे पूरे समय प्रार्थना की अपेक्षा नहीं कर सकते। एक अच्छा मुसलमान होने का मतलब है कि अपने जीवन को अच्छे से जिया जाए और जीवन की आम चीजों से आनंद उठाया जाए। सर्वेक्षणकर्ताओं ने 25 साल से कम उम्र के करीब 1000 मुसलमान युवाओं से बात की। हालांकि सर्वेक्षण में कम लोगों से बात की गई है पर ये उन लोगों की बातों की पुष्टि कर रहा है जो यह कहते हैं कि देश के मुसलमान कट्टरपंथी होते जा रहे हैं। पिछले कुछ समय में कई चर्चित घटनाएं घटी हैं जिनसे मलेशिया की एक नरमपंथी मुसलमान राष्ट्र की छवि को धक्का लगा है। 2010 में तीन ऐसी महिलाओं को कोड़े लगाए गए थे जिन्हें अपने वैवाहिक संबंधों के बाहर शारीरिक संबंध बनाए का दोषी पाया गया था। यूं तो मलेशिया में शरियत के कानून केवल मुसलामानों पर लागू होते हैं, पर शायद ही किसी को विवाहेतर संबंधों या शराब पीने के लिए दंडित किया गया हो। लेकिन अब कट्टरपंथी निजी गलतियों को अपराध की तरह से देख रहे हैं। -साभार बीबीसी
Sunday, July 24, 2011
Wednesday, July 20, 2011
Monday, July 18, 2011
लाहौर में सिखों को नहीं घुसने दिया गुरुद्वारे में
पाकिस्तान में लाहौर के पूर्वी क्षेत्र में सिखों को एक गुरुद्वारे में धार्मिक समारोह आयोजित करने से रोक दिया गया है। यह फैसला प्रशासन ने एक संगठन द्वारा यह यकीन दिलाने के बाद किया कि मुस्लिम त्योहार शब-ए-बरात सिखों के त्योहार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। द ट्रिब्यून अखबार के मुताबिक, दावत-ए-इस्लामी समूह के प्रयासों से 13 जुलाई को सिखों के वाद्य यंत्रों को बाहर फेंक दिया गया और गुरुद्वारे में उनका प्रवेश वर्जित कर दिया गया। गुरुद्वारे के बाहर पुलिस को तैनात किया गया, ताकि वह सिखों को अपना धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने से रोके। सोमवार को शब-ए-बरात है। लाहौर के नौलखा बाजार में गुरुद्वारा शहीद भाई तारू सिंह सिख संत की याद में बनवाया गया था। हालांकि विभाजन के बाद गुरुद्वारे पर इवैक्यूइ ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (इटीपीबी) का अधिकार हो गया था और सिखों को कुछ प्रतिबंधों के साथ इसका उपयोग जारी रखने की अनुमति दे दी गई थी। चार साल पहले दावत-ए-इस्लामी ने दावा किया था शेष कृष्ठ
लाहौर में सिखों.. कि यह गुरुद्वारा 15वीं शताब्दी के मुस्लिम संत पीर शाह काकू की मजार पर बनाया गया है। इसके बाद सिखों ने इटीपीबी से संपर्क किया, जो दोनों समुदायों को अपनी मान्यताओं के अनुसार गुरुद्वारे में धार्मिक उत्सव मनाने की अनुमति देती है। सिख समुदाय के सदस्यों ने कहा कि दावत-ए-इस्लामी का नेता सलमान बट ने दावा किया कि गुरुद्वारा अब मस्जिद बन गया है और सिखों का वाद्य यंत्र लाना वर्जित है। उन्होंने कहा कि शब-ए-बरात सिखों के उत्सव से अहम है और इटीपीबी ने उनका विचार मान लिया है। इटीपीबी के अधिकारियों ने माना कि उन्होंने सिखों से अपने कार्यक्रम को शब-ए-बरात तक टालने के लिए कहा है। गुरुनानक मिशन के अध्यक्ष सरदार बिशन सिंह ने कहा कि सिखों को उनके पवित्र स्थान पर जाने से रोकने का इटीपीबी का फैसला संविधान के खिलाफ है। साथ ही कहा कि सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज इफ्तिखार चौधरी से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन पर कार्रवाई करने की अपील की है।
Friday, June 17, 2011
Wednesday, May 18, 2011
कट्टरता की अंधी गली
पाकिस्तान में बढ़ती इस्लामिक कट्टरता पर लेखक की टिप्पणी
पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून का विरोध करने के लिए उदारवादी राजनेताओं सलमान तसीर और शहबाज भट्टी की हत्या ने पाकिस्तानी समाज पर इस्लामी कट्टरपंथियों के बढ़ते प्रभाव को उजागर कर दिया है। परमाणु हथियारों से संपन्न इस देश की सोच जैसे-जैसे उग्रवादी होती जा रही है, वैसे-वैसे कमजोर नागरिक सरकार के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। कट्टरपंथी मौलवियों के गुस्से का निशाना अब सत्ताधारी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की शैरी रहमान बन रही हैं, जिन्होंने हजरत मोहम्मद का अनादर करने की आरोपी एक पाकिस्तानी ईसाई महिला को मौत की सजा दिए जाने के बाद ईशनिंदा कानून में सुधार की मांग की है। दुख की बात यह है कि हजरत मोहम्मद या इस्लाम को बदनाम करने को अपराध घोषित करने वाले इस कानून का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के दमन के लिए किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के दमन के साथ-साथ पाकिस्तान में शिया-सुन्नी हिंसक संघर्ष भी आम हो गया है। पाकिस्तान की करीब 75 प्रतिशत आबादी वाले सुन्नियों और 20 प्रतिशत शियाओं में अकसर टकराव होते रहे हैं। इन झड़पों के लिए मुख्य रूप से सुन्नी उग्रवादी संगठन सिपह-ए-साहबा और सऊदी अरब के समर्थन वाला अलकायदा व ईरान-समर्थित शिया उग्रवादी संगठन तहरीक-ए-जफरिया जिम्मेदार हैं। संयोग से पाकिस्तान एक ऐसा सुन्नी बाहुल्य देश है, जहां अधिकतर उच्च सरकारी पदों पर शिया बैठे हुए हैं। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना शिया मुसलमान थे। इसी प्रकार भुट्टो परिवार, आसिफ अली जरदारी, सैयदा आबिदा हुसैन, इसकदर मिर्जा जैसे शीर्ष राजनेता और जनरल भी शिया हैं। मुहम्मद जिया-उल-हक के शासन काल में पाकिस्तान में, खास तौर से कराची और दक्षिण पंजाब में फिरकापरस्ती ने हिंसक रूप ले लिया था। तभी पाकिस्तानी न्याय प्रणाली का भी इस्लामीकरण शुरू हुआ। 1980 के दशक में पाकिस्तान को सऊदी अरब से भारी मदद मिली और जिया ने शियाओं के प्रति सहनशील स्थानीय सुन्नीवाद की बजाय असहिष्णु सऊदी सुन्नीवाद यानी वहाबवाद की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। गिलगित और स्कार्दू के आस-पास के इलाकों में पुरानी दुश्मनियां फिरकापरस्ती में बदल गईं और ईरानी अर्द्धसैनिक बलों का प्रभाव फैलने लगा। तबसे ही इन दोनों समुदायों के बीच की दरार गहरी होती जा रही है। अमेरिका पर 11 सितंबर के हमले और अफगानिस्तान से तालिबान के खदेड़े जाने के बाद से हिंसा और बढ़ गई है। अनुमान है कि पिछले दो दशकों में पाकिस्तान में गुटीय हिंसा में करीब 4,000 लोग मारे गए हैं। लेकिन क्या इन हालात के लिए राजनेता ही मुख्य तौर पर जिम्मेदार हैं? प्रसिद्घ राजनीतिक विश्लेषक अहमद राशिद इन हालात के लिए सेना को जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं कि सेना के हस्तक्षेप के कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र पूरी तरह जम नहीं पाया है। 1947 में आजादी के बाद से किसी भी नागरिक सरकार को अपना कार्यकाल पूरा ही नहीं करने दिया गया। पाकिस्तान में निर्वाचित प्रतिनिधियों को भारत और अफगानिस्तान के बारे में पाकिस्तान की नीति, परमाणु हथियार कार्यक्रम, रक्षा खर्च, खुफिया व्यवस्था और ऐसे ही अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में निरंतर दबावों का सामना करना पड़ा है। अहमद राशिद के अनुसार, 1947 के बाद से पाकिस्तान की नियति का संचालन करने वाले सैन्य-नौकरशाह अभिजात्य वर्ग को ही पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के स्वरूप के निर्धारण और उनके समाधानों के अधिकार थे, सरकारों, संसद, नागरिक संगठनों या फिर बुद्धिजीवी तबके को नहीं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं )
Sunday, May 15, 2011
Sunday, May 1, 2011
बुर्का का सवाल
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मेरे कई मुसलमान दोस्तों में से एक भी ऐसा नहीं है जिनके घर में महिलाएं मुंह ढंकने के लिए बुर्का पहनती हों। अब पाकिस्तान के मेरे मिलने वाले बताते हैं कि दस साल पहले की बजाय आज बुर्का पहने औरतें ज्यादा तादाद में दिखाई देती हैं। यह ज्यादातर धार्मिक कट्टरता के उभरने और तालिबान के बढ़ते असर की वजह से है। मेरे लिए यह आघात जैसा है, क्योंकि मैं औरतों के बुर्का पहनने की जहालत समझता हूं। इससे मुसलमान औरतें नौकरी या कामधंधा करने से वंचित रह जाती हैं और अपने ही घर में कैद हो जाती हैं। बुर्का पहनने वाली औरतों के एक उल्लेखनीय चैंपियन डॉ. जाकिर नायक हैं। बुर्का पहनने के उनके तर्क पर मुझे हंसी आती है। उनका कहना है कि मान लो तीन औरतें चहलकदमी कर रही हैं। दो ने बुर्का पहना है और एक ने नहीं। अगर वह सड़कछाप मजनुओं के गैंग के सामने से गुजरती हैं तो वह किसके साथ छेड़खानी करेंगे? जाहिर है जिसने बुर्का नहीं पहना है उससे, क्योंकि वह उसका चेहरा देख सकते हैं बाकी दो का नहीं। इस तरह बुर्के से सुरक्षा मिलती है। अगर आप मामले पर जरा गंभीरता से गौर करें तो आप पाएंगे कि बुर्के ज्यादातर निम्न मध्यम वर्ग की औरतें पहनती हैं। उच्च वर्ग की महिलाएं शिक्षित और पश्चिमी शैली में रहती हैं। सबसे निचला वर्ग खासतौर से जो खेतीबाड़ी में लगा है वह अपने मर्दो के साथ रहती हैं और बुर्का नहीं पहनतीं। केवल निम्न वर्ग की औरतें अपने आप को बुर्के से आजाद नहीं करना चाहती, क्योंकि वह ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं। मुझे उम्मीद थी कि दार-उल-उलूम हिजाब खत्म करने के पक्ष में फतवा जारी करेगा, लेकिन शायद ही संभव हो सके। मुझे यह भी उम्मीद थी कि कैरो में अल अजहर फ्रेंच सरकार के समर्थन में कुछ कहेंगे। जिसने बुर्का पहनने को दंडनीय अपराध करार दिया है। फ्रांस में किसी भी दूसरे यूरोपियन देश से ज्यादा मुसलमान रहते हैं। उनमें से ज्यादातर पुरानी कालोनियां हैं। हिजाब अपराध नहीं है, लेकिन उससे चिढ़ होती है। इस चिढ़ को हटाने के लिए दूसरे तरीके खोजने चाहिए। मुझे तुर्की के अतातुर्क कमाल पाशा की याद आती है जिसने एक ही झटके में ऐसी संस्थाओं को खत्म कर दिया था जो वक्त के साथ नहीं चल रही थीं। उन्होंने खलीफागिरी को समाप्त किया और भारत के खिलाफत आंदोलन की हवा निकाल दी। गांधी ने भारतीय मुसलमानों का समर्थन हासिल करने की उम्मीद में खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया था और इसमें वह असफल रहे। कमाल पाशा ने बुर्का पहनने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। यही वजह है कि तुर्की आज दुनिया का सबसे आधुनिक मुस्लिम देश है। हमें एक और कमाल पाशा चाहिए। हवा खारिज करना : सबके बीच जोर से हवा खारिज करने को ठीक ही गलत समझा जाता है और इसे अशिष्टता माना जाता है। बुरी बात यह है कि वह खराब आदत केवल मर्दो में पाई जाती है। मुझे एक भी ऐसी महिला नहीं मिली जो सबके सामने हवा खारिज करती हो। मेरा सबसे ज्यादा यादगार अनुभव 50 साल पहले हुआ जब मैं काबुल में एक काम के सिलसिले में गया था। मेरे साथ एक सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर थे। शहर में केवल एक ही होटल मिला और हम दोनों को एक कमरे में रहना पड़ा। यह शर्मा बंधु पक्के शाकाहारी थे और दाल या सब्जी के सथ पुलाव तक नहीं खाते थे, लेकिन दूसरी रात को शर्मा का पेट गुब्बारे की तरह फूल गया। मैंने जैसे ही बत्ती बुझाई उन्होंने बम फोड़ने शुरू कर दिए। मैंने कहा भगवान के लिए यह बंद करो, लेकिन इसकी बजाय उसने मुझे लंबा भाषण दे दिया (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Wednesday, April 20, 2011
जबरन धर्म परिवर्तन
पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की आवाज मुखर हो रही है जबकि बढ़ती हिंसा और धमकियों के बीच मानवाधिकार तथा सहिष्णुता की आवाज अलग-थलग पड़ती जा रही है। यह सचाई वहां के मानव अधिकार आयोग (एचआरसीपी) की हालिया रिपोर्ट का हिस्सा है। पिछले साल की स्थिति पर जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि देश में हिंदू और सिख समुदाय के लोगों की हालत बेहद दयनीय है। हमेशा आशंका, डर और आतंक के साये में जीना उनकी मजबूरी है। अन्य अल्पसंख्यकों की हालत भी कोई अच्छी नहीं है। मजहबी हिंसा की वजह से अल्पसंख्यक अहमदी समुदाय के 99 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। गौर करने की बात है कि एचआरसीपी की रिपोर्ट उन तथ्यों पर आधारित है जो पाकिस्तान की पुलिस ने दर्ज किए हैं और जिनके आधार पर इस आयोग ने इसे तैयार किया है। इससे असली तस्वीर का अंदाज लगाया जा सकता है। खुद पाकिस्तान सरकार कुबूल कर चुकी है कि उसकी जानकारी में है कि देश में दमन, हिंसा और जोर-जबर्दस्ती के सभी मामले पुलिस एजेंसी के द्वारा दर्ज नहीं किए जाते हैं। एचआरसीपी की रिपोर्ट का दूसरा पहलू और भी खौफनाक तस्वीर पेश करता है। इसमें कहा गया है- हिंदू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है जिससे अल्पसंख्यक समुदाय बहुत चिंतित है। पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन का ढंग कुछ अन्य धर्मो के प्रचारकों की भांति लोभ-लालच से आकर्षित या प्रभावित करके अपने धर्म में खींचने का नहीं है बल्कि यह बहुत आदिम, बर्बर और मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाने वाला है। रिपोर्ट ही कहती है कि नाबालिग और हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया जाता है। बाद में उन्हें धर्म बदलने के लिए विवश किया जाता है। इस तरह के मामले शिकायत के स्तर तक किसी तरह पहुंचते हैं तो 12-13 साल की लड़कियों को भी उनके अभिभावकों के संरक्षण में नहीं छोड़ा जाता। झूठी दलील दी जाती है कि लड़की ने इस्लाम मजहब को कुबूल कर लिया है। उसकी मुस्लिम व्यक्ति से शादी हो गई है तथा वह पुराने धर्म में नहीं लौटना चाहती। वहां की सीनेट की स्थायी समिति ने गत वर्ष अक्टूबर में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस उपाय करने का सरकार से आग्रह किया था मगर उसे अनसुना कर दिया गया। इससे जाहिर है कि सरकार की या तो इस तरह के मामलों में मिलीभगत है, या फिर इसे रोक पाना उसके बस में नहीं है और वह कठमुल्लाओं के समक्ष घुटने टेक चुकी है। लेकिन भारत को क्या इसी बिना पर यह मुद्दा छोड़ देना चाहिए कि यह एक सम्प्रभु देश का आंतरिक मामला है? भारत में इस तरह की कोई घटना होती तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय मामले को सिर पर उठा लेता! संक्षेप में 'पाक' कहे जाने वाले पाकिस्तान में मानवाधिकार विरोधी नापाक हरकतों पर दुनिया, खासकर भारत सरकार तथा यहां धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार चुप क्यों हैं? बहुत जरूरी है कि भारत इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाए तथा ऐसी बर्बरता को रोकने के लिए कूटनयिक स्तर से लेकर सभी जरूरी पहल करे नहीं तो दोनों देशों के रिश्ते कभी पटरी पर नहीं आ सकेंगे!
Tuesday, April 12, 2011
फ्रांस में लागू हुआ बुर्के पर प्रतिबंध, नकाबपोश महिलाएं गिरफ्तार
यूरोप के सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले देश फ्रांस में बुर्का पहनने पर लगाया प्रतिबंध सोमवार से लागू हो गया। अब महिलाएं सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का नहीं पहन सकेंगी। नए कानून के अमल में आने के बाद प्रधानमंत्री निकोलस सरकोजी की जमकर आलोचना हो रही हैं। नए कानून के मुताबिक पुलिस को बुर्का पहनी किसी भी महिला का चेहरा देखने का अधिकार होगा। इंकार करने वाली महिला को साढ़े नौ हजार रुपये जुर्माना देना पड़ेगा। बुर्के पर पाबंदी के खिलाफ शनिवार को प्रदर्शन किया गया था, जिसमें 59 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 19 महिलाएं शामिल थीं। इन्होंने बुर्का पहनकर प्रदर्शन किया। सोमवार से प्रतिबंध लागू होने के बाद भी कई महिलाएं सार्वजनिक स्थलों पर नकाब पहनकर दिखाई थीं। पुलिस ने कानून का उल्लंघन करने के आरोप में अब तक दो महिलाओं को गिरफ्तार किया है|
फाइलों में ही गुम हो गया अल्पसंख्यक एजेंडा
बड़े-बड़े वादे करके दो साल पहले फिर से सत्ता में लौटी सरकार का अल्पसंख्यक एजेंडा सरकारी फाइलों में ही गुम होकर रह गया है। आलम यह है कि वादे के बावजूद न समान अवसर आयोग बना और न ही अवैध कब्जे की गिरफ्त में फंसी हजारों करोड़ की वक्फ संपत्तियों के संरक्षण के लिए कानून। केंद्रीय व राज्य वक्फ बोर्डों को अलग से मदद की योजना भी परवान नहीं चढ़ सकी। सरकार के वादों का ही असर था कि अल्पसंख्यक बहुल 121 जिलों में कांग्रेस को 2004 के मुकाबले 2009 के लोकसभा चुनाव में 30 सीटें ज्यादा मिली थीं। तब उसने पढ़ाई व नौकरियों में वंचित समूहों को तवज्जो के लिए समान अवसर आयोग गठन की बात कही थी। सालभर के भीतर ही उसके विधेयक को भी संसद में पेश करना था। दो साल बीतने को हैं। विधेयक को संसद में पेश होना तो दूर, उसे कैबिनेट तक की मंजूरी नहीं मिल सकी। वजह सिर्फ यह है कि खुद सरकार के मंत्रियों में उसके गठन और अधिकार को लेकर खींचतान है। मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में है। राज्यों के वक्फ बोर्ड आर्थिक रूप से गरीब मुसलमानों की मदद में हाथ बंटाते हैं। लिहाजा केंद्रीय व राज्यों के वक्फ बोर्डों के मदद के लिए नई योजना शुरू होनी थी। बजट में अलग से धन का प्रावधान होना था। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय योजना आयोग इसके लिए राजी ही नहीं हुआ। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सारे सपने धरे के धरे रह गए। देश के लगभग सभी शहरों में हजारों करोड़ की वक्फ संपत्तियां हैं। उन पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे हैं। राज्यसभा के उप सभापति के. रहमान खान की अगुवाई में बनी एक संयुक्त संसदीय समिति उन संपत्तियों को बचाने और बेहतर इस्तेमाल के लिए लगभग तीन साल पहले वक्फ कानून में संशोधन की सिफारिश की थी। उसका विधेयक लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में पारित होने से पहले ही खुद सरकार ने ही उसे प्रवर समिति को सौंपने की पहल कर दी। लगभग सालभर से वह वहीं अटका पड़ा है। वक्फ संपत्तियों की बदइंतजामी का आलम यह है कि खुद सरकार को भी सही-सही नहीं पता कि ये संपत्तियों हैं कितनी। लिहाजा वक्फ संपत्तियों की सही स्थिति व उनके संरक्षण के लिए सारे वक्फ रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण किया जाना था। लगभग दो साल होने को हैं और यह काम भी आधा-अधूरा पड़ा है। केंद्र ने राज्यों से कहा है कि वे वक्फ संपत्तियों को डाटा तैयार करें|
Sunday, April 10, 2011
गर्भ निरोध नहीं, भ्रूण हत्या है गैरइस्लामी
इन उपायों को लेकर इस्लामिक समाज में भी जागरूकता आ रही है। जब व्यक्ति शिक्षित होगा और अपनी जिम्मेदारी को समझेगा तो निश्चित तौर पर ऐसे व्यक्ति का परिवार छोटा ही होगा
कोई महिला गर्भवती न हो, इसके लिए पहले से कोई उपाय किया जाए और किसी बच्चे की गर्भ में ही हत्या कर दी जाए, ये दोनों बिल्कुल अलग- अलग बातें हैं। बर्थ कंट्रोल और एबॉर्शन को एक पलड़े पर रखकर नहीं तौला जा सकता। इस्लाम में कभी इस बात की मनाही नहीं है कि कोई महिला गर्भवती होने से बचने के लिए गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करे। इस्लाम पुरुष की नसबंदी और उसके द्वारा कंडोम के इस्तेमाल की भी इजाजत देता है।
इस्लाम में गर्भपात हराम
यदि महिला एक बार गर्भवती हो जाए, उसके बाद बच्चे को गिराना इस्लाम में हराम है। आज सोनोग्राफी के जरिये लिंग जांच और उसके बाद गर्भपात की जो घटनाएं सुनने में आती हैं, इस तरह की घटनाएं गैर इस्लामिक हैं। इस्लाम गर्भपात की बिल्कुल इजाजत नहीं देता। या कोई बच्ची दुनिया में आ जाएं और उसके लिंग का पता चल जान के बाद उसे जान से मार दिया जाए। यह बिल्कुल हत्या होगी, जिसकी इजाजत इस्लाम में नहीं है।
गर्भनिरोधक की है इजाजत
मुसलमान सबसे पवित्र किताब 'कुरआन' को मानते हैं। दूसरी जो पवित्र किताब है, उसे कहते हैं 'बुखारी'। उसके अनुसार रसुल्लाह के साथी इस बात का ध्यान रखते थे कि महिलाएं गर्भवती न हों, इसके लिए कुछ तरकीब का इस्तेमाल करते थे। इस बात के लिए मोहम्मद साहब ने उन्हें कभी मना नहीं किया। यदि किसी बात को वे जानते हुए मना न करें तो इसे इस्लाम में उनका समर्थन ही माना जाता है जिसे आप रसूल का मौन समर्थन कह सकते हैं। इस तरह गर्भ न ठहरने के लिए की जाने वाली युक्तियों को इस्लाम में गलत नहीं ठहराया गया। यह जनसंख्या के नियंतण्रमें भी सहायक है।
एबॉर्शन नाजायज
यह तो धीरे-धीरे रिवाज बनता जा रहा है। गर्भ में बच्ची है तो उसे गिरा दो। भारत में इसका रिवाज कुछ ज्यादा ही है। इसके खिलाफ कानून बनाया गया लेकिन उसका भी कुछ खास फायदा नजर नहीं आता। सुनते हैं कि पंजाब में एबॉर्शन का चलन ज्यादा है। इस बात को किसी भी प्रकार से जायज नहीं ठहराया जा सकता। यह बिल्कुल गलत है। जो बच्चा गर्भ में आ गया है,उस बच्चे को मार नहीं सकते। इस्लाम में तो स्त्री और पुरुष दोनों को बराबर का हक मिला है। कहते हैं कि जिस प्रकार सेब के दो भाग करने के बाद दोनों तरफ एक सी बराबरी होती है। उसी प्रकार इस्लाम में स्त्री और पुरुष के बीच का रिश्ता है।
गर्भपात का गुनाह हत्या के बराबर
इस्लाम के कानून के अनुसार गर्भ में पल रही बच्ची को गर्भ में मारा गया तो यह उतना ही संगीन अपराध है जितना हम हत्या को मानते हैं। गर्भ को गिराने वाला हत्या का अपराधी माना जाएगा। इसमें सबसे अधिक दोषी वह डॉक्टर माना जाएगा, जिसने मां-बाप के कहने पर गर्भपात जैसे संगीन अपराध को अंजाम दिया। इसके लिए डॉक्टर को मौत की सजा मिलेगी। मां-बाप को भी कोड़ों की सजा मिलेगी या उन पर आर्थिक जुर्माना लगाकर छोड़ा जाएगा। वह व्यक्ति बिल्कुल सजा का सबसे बड़ा भागीदार है, जिसके हाथों गर्भपात जैसे घिनौना काम का अंजाम दिया गया है। अब धीरे-धीरे गर्भ निरोध के उपायों को लेकर इस्लामिक समाज में भी जागरूकता आ रही है। अधिक बड़ा परिवार धार्मिक मसला कम, अशिक्षा का परिणाम अधिक है। जब व्यक्ति शिक्षित होगा और अपनी जिम्मेदारी को समझेगा तो निश्चित तौर पर ऐसे व्यक्ति का परिवार छोटा ही होगा।
नवजात से 6 वर्ष के बच्चे का लिंगानुपात और 1961-2011 तक के सकल लिंगानुपात
देश में लिंगानुपात 940 है जो 1971 से सर्वाधिक है । लिंगानुपात में 2001 की जनगणना की तुलना में सात अंकों की वृद्धि हुई है। अधिकतर राज्य जहां लिंगानुपात में ज्यादा अंतर था, अब समस्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। बिहार औ र जम्मू - कश्मीर दो राज्य हैं, जहां लिंगानु पात में कोई वृद्धि नहीं हुई है। बच्चों के लिं गानुपात में 1961 से ही गिरावट बनी हुई है। 2011 की जनगणना में तो यह सबसे निचले स्तर 914 पर पहुंच गईहै। (मौलाना वहीदुद्दीन से आशीष कुमार 'अंशु' की बातचीत पर आधारित)
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