अमेरिका के फोरम ऑन रीलिजन एंड पब्लिक लाइफ प्रोजेक्ट के एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में मुसलमानों की आबादी अगले दो दशकों में गैर मुसलमान आबादी की तुलना में दोगुनी रफ्तार से बढ़ेगी और दुनिया की आबादी का एक चौथाई हो जाएगी। इस अध्ययन से अमेरिका और यूरोप में बहस छिड़ सकती है क्योंकि मुस्लिम आबादी बढ़ने का सबसे ज्यादा असर यहीं होगा। 2010 में अमेरिका में मुस्लिम आबादी 2.6 मिलियन है जोकि 2030 में 6.2 मिलियन हो जाएगी। 2030 में मुसलमान दुनिया की पूरी आबादी का 26.4 प्रतिशत हो जाएंगे और उनकी संख्या 8.3 अरब के करीब होगी। दो दशक बाद पाक दुनिया में सबसे अधिक मुसलमानों वाला देश हो जाएगा। इस समय इंडोनेशिया में सबसे अधिक मुसलमान रहते हैं। इतना ही नहीं दुनिया के हर दस मुसलमानों में से छह मुसलमान एशिया प्रशांत क्षेत्र में होंगे। भारत अभी भी मुसलमानों की आबादी के मामले में दुनिया का तीसरा देश है। शोध कहता है कि बीस साल बाद भी उसकी स्थिति यही होगी। इस शोध के अनुसार अफ्रीका के देशों में भी मुस्लिम आबादी में बड़ा बदलाव होगा। इस समय अफ्रीकी देशों में मिस्र में सबसे अधिक मुसलमान हैं, जबकि बीस साल बाद नाइजीरिया उसे पीछे छोड़ देगा। आंकड़ों के अनुसार यूरोप में अगले बीस वषरें में मुसलमान आबादी 4.41 करोड़ हो जाएगी जो यूरोप की आबादी का छह प्रतिशत होगा। फोरम ने यूरोप के कई देशों के लिए अलग-अलग आकड़े जारी किए हैं, लेकिन दुनिया के अन्य धर्मो जैसे कि ईसाई, हिंदू, बौद्ध, सिख या यहूदियों की जनसंख्या के कोई आकड़े नहीं दिए हैं। मुसलमानों में भी बड़ी संख्या सुन्नी मुसलमानों की होने वाली है। शियाओं की संख्या कम होने के पीछे ईरान में जन्म दर का कम होना है।
Sunday, January 30, 2011
दुनिया भर में 20 साल में दोगुनी हो जाएगी मुस्लिम आबादी
अमेरिका के फोरम ऑन रीलिजन एंड पब्लिक लाइफ प्रोजेक्ट के एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में मुसलमानों की आबादी अगले दो दशकों में गैर मुसलमान आबादी की तुलना में दोगुनी रफ्तार से बढ़ेगी और दुनिया की आबादी का एक चौथाई हो जाएगी। इस अध्ययन से अमेरिका और यूरोप में बहस छिड़ सकती है क्योंकि मुस्लिम आबादी बढ़ने का सबसे ज्यादा असर यहीं होगा। 2010 में अमेरिका में मुस्लिम आबादी 2.6 मिलियन है जोकि 2030 में 6.2 मिलियन हो जाएगी। 2030 में मुसलमान दुनिया की पूरी आबादी का 26.4 प्रतिशत हो जाएंगे और उनकी संख्या 8.3 अरब के करीब होगी। दो दशक बाद पाक दुनिया में सबसे अधिक मुसलमानों वाला देश हो जाएगा। इस समय इंडोनेशिया में सबसे अधिक मुसलमान रहते हैं। इतना ही नहीं दुनिया के हर दस मुसलमानों में से छह मुसलमान एशिया प्रशांत क्षेत्र में होंगे। भारत अभी भी मुसलमानों की आबादी के मामले में दुनिया का तीसरा देश है। शोध कहता है कि बीस साल बाद भी उसकी स्थिति यही होगी। इस शोध के अनुसार अफ्रीका के देशों में भी मुस्लिम आबादी में बड़ा बदलाव होगा। इस समय अफ्रीकी देशों में मिस्र में सबसे अधिक मुसलमान हैं, जबकि बीस साल बाद नाइजीरिया उसे पीछे छोड़ देगा। आंकड़ों के अनुसार यूरोप में अगले बीस वषरें में मुसलमान आबादी 4.41 करोड़ हो जाएगी जो यूरोप की आबादी का छह प्रतिशत होगा। फोरम ने यूरोप के कई देशों के लिए अलग-अलग आकड़े जारी किए हैं, लेकिन दुनिया के अन्य धर्मो जैसे कि ईसाई, हिंदू, बौद्ध, सिख या यहूदियों की जनसंख्या के कोई आकड़े नहीं दिए हैं। मुसलमानों में भी बड़ी संख्या सुन्नी मुसलमानों की होने वाली है। शियाओं की संख्या कम होने के पीछे ईरान में जन्म दर का कम होना है।
Sunday, January 23, 2011
बारूद के ढेर पर पाकिस्तान
लेखक कट्टरपंथियों के निरंतर बढ़ते प्रभाव को पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए खतरा मान रहे हैं….
हाल ही में एमजे अकबर की पुस्तक टिंडर बॉक्स प्रकाशित हुई है, जिसमें पाकिस्तान के मौजूदा हालात का ब्यौरा दिया गया है। इसे लेकर पाकिस्तानी काफी नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं। टिंडर बॉक्स का मतलब होता है विस्फोटक से भरा डिब्बा। अकबर के मुताबिक पाकिस्तान बारूद से भरा एक डिब्बा बन चुका है, जो कभी भी तबाह हो सकता है। असलियत भी यही है। पिछले दिनों लाहौर से वहां संसद सदस्य रह चुके तारिक बांडे के भाई खालिद बांडे भारत आए थे। उनका कहना था कि वहां कट्टरपंथियों का दबदबा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर की हत्या ने सबकी आंखें खोल दी हैं। उनकी हत्या के जरिए कट्टरपंथी मौलानाओं ने जरदारी सरकार को संदेश दिया है कि सब कुछ हमारे हाथ में है। तुम्हें जिस पुलिस और फौज का भरोसा है उसे भी हम ही नियंत्रित करते हैं। हमारे कहने पर पुलिस वाले जिसकी चाहे उसकी हत्या कर देते हैं। सबको मालूम है कि गवर्नर की हत्या उनकी सुरक्षा में तैनात पुलिस वाले ने की और बाद में मौलानाओं और कट्टरपंथी वकीलों ने उसे फूलमालाएं पहनाईं। गवर्नर के जनाजे में कोई शामिल नहीं हुआ और सुपुर्दे खाक के वक्त फातिया पढ़ने के लिए मौलवी या मौलाना आतंकवादियों के डर से नहीं आया। बाद में उनको सरकारी देखरेख में दफन कर दिया गया। सलमान तसीर एक खुले दिमाग के पढ़े-लिखे इंसान थे। उन्होंने पाकिस्तान की पढ़ी- लिखी समझदार जनता की हमेशा नुमाइंदगी की। वह मजहब के नाम पर किसी के साथ भेदभाव के खिलाफ थे। किस्सा कुछ यूं हुआ कि एक ईसाई महिला की उसके मोहल्ले की कुछ औरतों से नल के पानी को लेकर कहासुनी हो गई। उन मुस्लिम औरतों ने थाने में झूठी शिकायत दर्ज करा दी कि इसने इस्लाम के खिलाफ बोला है। पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक ने मौलानाओं को खुश करने के लिए एक कानून बनाया था कि यदि पुलिस में कोई मुस्लिम किसी गैर मुस्लिम के खिलाफ शिकायत दर्ज करता है कि उसने इस्लाम के खिलाफ बोला तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लेना चाहिए। इस कानून का पाकिस्तान में जमकर दुरुपयोग हो रहा है। इसके खिलाफ कई पढ़े-लिखे मुस्लिम कई बार सक्रिय हुए हैं, लेकिन मौलानाओं ने उन्हें दबा दिया। पिछले कुछ दिनों से वहां मंत्री रहीं शेरी सरदार ने बीड़ा उठाया कि इस कानून में बदलाव लाना चाहिए और जेल में डालने के पहले शिकायत की तफ्तीश होनी चाहिए। इस बात का समर्थन पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर ने भी किया और उन्होंने उस ईसाई महिला को राहत दिलाने की कोशिश की। इस बात से उनके साथ तैनात सुरक्षाकर्मी चिढ़ गया और वह मौलानाओं के संपर्क में आया। कट्टरपंथी मौलानाओं ने उसे भड़काया तथा उसने गवर्नर की हत्या उस समय कर दी जब वह इस्लामाबाद किसी मीटिंग के सिलसिले में आए हुए थे। पाकिस्तान के तमाम समझदार वकीलों ने इसके खिलाफ आवाज भी उठाई और ऐसे वकीलों की निंदा की जिन्होंने हत्यारे के अदालत में पेश होने के वक्त उसको फूलों की माला पहनाई। पाकिस्तान के तमाम समझदार लोगों का कहना है कि पता नहीं कहां से इतना कट्टरपंथ उनके देश में फैलता जा रहा है। खालिद बांडे की पत्नी ने बताया कि लाहौर जैसे शहर में अब यह माहौल हो गया है कि बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल में मौलाना घूमते हैं और औरतों को चेतावनी देते हैं कि वे अपना सिर ढकें और कौन से कपड़े पहनें। वह बचपन से वहां रह रही हैं और उनका कहना है कि ऐसा लाहौर में कभी नहीं हुआ था। लाहौर हमेशा से एक आजाद, उदार, खुले दिल का शहर रहा, जहां पश्चिमी सभ्यता फैली रही और युवक-युवतियों पर कभी कोई पाबंदी नहीं रही। अब दिनोंदिन माहौल बदलता जा रहा है। कट्टरपंथी इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को ही मार रहे हैं और मुसलमानों को ही तंग किया जा रहा है। पहले पुलिस ऐसे लोगों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करती थी, लेकिन आज आलम यह है कि पुलिस वाले इनसे डर रहे हैं। आए दिन मस्जिदों में बम लगाए जा रहे हैं। शिया और अहमदी मुसलमानों को तो जमकर रोज मारा जा रहा है। इनके आगे सरकार भी बेबस है। सरकार में बैठे लोगों को भी यह डर लगा रहता है कि उन्हें कभी भी मारा जा सकता है इसलिए ये लोग अपनी हिफाजत में ही लगे रहते हैं। आम जनता आज भी कट्टरपंथियों के खिलाफ है। जिन लोगों के पास पैसा है वे या तो दुबई जाकर बस रहे हैं या मलेशिया चले जा रहे हैं। पढ़े-लिखे लोगों की समस्या यह है कि अब पश्चिमी देश उन्हें वीजा नहीं देते हैं। इसलिए उनके पास दुबई, अबूधाबी, बहरीन, मलेशिया के अलावा और कहीं जाने का चारा नहीं है। दुबई में भी अब पाकिस्तानियों के लिए वर्क परमिट बहुत मुश्किल काम हो गया है। दुबई सरकार बहुत सोच-समझ कर पाकिस्तानियों को आने देती है। शेरी ने इस कानून के खिलाफ अभी भी अपनी लड़ाई जारी रखी है। कट्टरपंथी उन्हें भी कभी भी मार सकते हैं। इन हालात में पाकिस्तान सरकार को उन्हें कड़ी सुरक्षा देनी चाहिए। दरअसल, जनरल जिया ने जाते-जाते पाकिस्तान को यह रोग लगा दिया था। शुरू में वह भी इस्लामिक कट्टरपंथ के बहुत खिलाफ थे, लेकिन जब उनका विरोध बहुत बढ़ गया और वह जनता में अलोकप्रिय हो गए तो उन्होंने मजहबी कार्ड खेला और शरीयत कानून लागू करवा दिया। यही नहीं, उन्होंने मौलानाओं के दबाव में एक ऐसा कानून बनाया जिसमें पैगंबर के खिलाफ या इस्लाम के खिलाफ बोलने वाले को कड़ी सजा का प्रावधान है। इस कानून में यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि उस व्यक्ति ने सचमुच ऐसा बोला है या नहीं। यदि कोई इस्लाम का मानने वाला दूसरे के खिलाफ शिकायत कर देता है, भले ही वह झूठी हो तो उसे पुलिस को मानना ही पड़ेगा। पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान में गैर इस्लामी लोगों के खिलाफ इस कानून का बेइंतहा बेजा इस्तेमाल हुआ है। तमाम मुसलमानों ने इसके खिलाफ जमकर आवाज उठाई, लेकिन उनकी आवाज दबा दी गई। अकबर ने सही कहा है कि यदि पाकिस्तान के हालात ऐसे ही रहे तो यह अपने अंदर बढ़ रहे बारूद से खुद ब खुद खाक हो जाएगा। बेहतर हो कि पाकिस्तान के लोग पहले से ही चेत जाएं और इस तरह की चीजों पर अंकुश लगाएं। उनके खिलाफ अभी से ही पहल करके लड़ाई शुरू कर दें और एक प्रगतिशील खुले विचारों वाले पाकिस्तान को बनाने का प्रयास करें। अभी तो कट्टरपंथियों का साम्राज्य शहरों और कस्बों में चल रहा है, जिस दिन वे गांवों में घुसना शुरू करेंगे तब कोई भी सरकार हालात को सुधार नहीं पाएगी। वहां तालिबान का कब्जा हो जाएगा। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
तसीर मामले पर पाकिस्तानी मीडिया भी कट्टर ही दिखा
पंजाब प्रांत के राज्यपाल और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के कद्दावर तथा शोला बयान नेता सलमान तसीर को उनके अंगरक्षक मुमताज कादरी ने गोलियों से छलनी कर दिया। कहा जाता है कि उसने ये कृत्य इसलिए किया, क्योंकि तसीर ने पैगंबर-ए-इस्लाम की कथित बेइज्जती करने और मौत की सजा पाने वाली महिला आसिया मसीह का पक्ष लिया था और रिसालत कानून (जिसका संबंध हजरत मुहम्मद के रसूल होने से है) को काला कानून करार दिया था। इस घटना और उसके बाद के हालात पर नजर डालते हुए कुछ अखबारों की राय। दैनिक खबरें कहता है कि पाक के धार्मिक कट्टरपंथी अपने विरोधियों को रास्ते से हटाने से गुरेज नहीं करते। अफसोस ये कि जमायत अहले-सुन्नत पाकिस्तान के उलमा ने एलान किया था कि तासीर की नमाज-ए-जनाजा ही न पढ़ाई जाए। उन्होंने तसीर के कातिल को आशिक-ए-रसूल और गाजी (योद्धा) कह कर प्रशंसा की। कुछ वकीलों ने कादरी को अदालत में पेशी के समय फूलों से लाद दिया। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे संगठनों और उसके सदस्य भी मतभेद को बातचीत से हल नहीं करना चाहते। उनके लिए, उनके द्वारा इस्लाम की जो व्याख्या की गई है वही सही है। ऐसे उलमा इस्लामी इतिहास को विकृत करके पेश कर रहे हैं। वो हजरत मुहम्मद और खलीफाओं के दौर की घटनाएं ऐसे पेश करते हैं कि लगता है गोया तब लोगों को व्यक्तिगत बेइज्जती करने पर कत्ल कर दिया जाता था। ये हमारे नबी (मुहम्मद) पर एक तुहमत है। उम्मत के अनुसार रसूल के अवतार लेने संबंधी कानून को काला कानून बताने पर राज्यपाल तसीर की हत्या हो गई। पीपुल्स पार्टी तथा अन्य संगठनों के कथित रोशन खयाल लोगों को गहरा धक्का लगा और पाक को एक सेक्युलर राज्य बनाने के उनके सपने चकनाचूर हो गए हैं। इसके साथ ही पंजाब सरकार में शामिल पीपीपी को नवाज शरीफ की ओर से पेश की गई मांगों का इंतजार है। हालांकि कराची के बिलावल हाउस में नए राज्यपाल के लिये इंटरव्यू चल रहे थे। लोगों को इस्लामाबाद और लाहौर से बुलाया गया था। इनमें शोला बयान बाबर एवान सबसे आगे थे, लेकिन बदले हालात में लतीफ खोसा की मध्यमार्गी शख्सियत भी ठीक लग रही है। इस्लामाबाद के जिन्ना अखबार ने लिखा है कि तसीर की हत्या के बाद पीपुल्स पार्टी और नवाज शरीफ की पार्टी के बीच नए राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर मतभेद गहरा सकते हैं। जरदारी वहां ऐसा गवर्नर नियुक्त करेंगे जो तसीर की ही तरह उनकी पार्टी को बढ़ावा दे, जबकि नवाज पार्टी का कहना है कि नए राज्यपाल की नियुक्ति पर उनसे सलाह लेनी चाहिए। तासीर अपने बयानों से नवाज पार्टी को मुसीबत में डाले रखते थे। फिर भी पंजाब के मुख्यमंत्री के अनुसार तसीर की मौजूदगी उनके लिए नुकसान के बजाए फायदे में थी। तसीर के चले जाने से पीपीपी का नुकसान होगा वहीं नवाज पार्टी को भी घाटा होगा। जंग लिखता है कि तासीर कहते थे कि वह अदालती कार्यवाही में दखल नहीं देना चाहते, पर वो कोशिश करेंगे कि आसिया को उस जुर्म की सजा न मिले जो उसने किया ही नहीं है। इस बयान की तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इसके बाद ही एक महिला सांसद ने राष्ट्रीय असेंबली में तौहीन-ए-रसालत कानून में संशोधन का बिल पेश किया तो लगा कि सरकार इस कानून को बदलना चाहती है। उस महिला सदस्य का कहना था कि वो अपनी जिंदगी इस कानून के लिए न्योछावर कर सकती है लेकिन मेरा इस बिल को पेश करने का उद्देश्य इसके दुरुपयोग को रोकना था। औसाफ का कहना है कि तसीर के बयान को अनेक लोगों ने गैर जिम्मेदाराना करार दिया था। आसिया के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने वाले इमाम का कहना था कि उसने गवाहों को कुरान शरीफ पर शपथ दिला कर प्रमाणित किया कि उस महिला ने रसालत की तौहीन की थी।
रूढि़यों के ताले में मुस्लिम महिलाएं
यह सही है कि धर्म अथवा मजहब के सिद्धांतों के अनुरूप ही मनुष्य को आचरण करना चाहिए, क्योंकि मजहब कभी भी हमें गलत सीख नहीं देता। हां, इतना जरूर है कि मजहब के नाम पर रूढि़यों की बेड़ी से जकड़ने से बचना चाहिए, क्योंकि वह कभी-कभार विकास में बाधक भी बनने लगता है। इसके दूरगामी परिणाम काफी प्रतिकूल होते हैं। देश-दुनिया में मुस्लिम महिलाओं के साथ आज कमोबेश यही सब हो रहा है। मुस्लिम महिलाएं जब भी सशक्त होने के लिए आगे बढ़ती हैं, उनके सामने मजहबी अवरोध और फतवों की दीवार खड़ी करके उन्हें रोक दिया जाता है और इसका नुकसान उनके पूरे समाज को होता है। वर्तमान विकास के मौजूदा हालात में महिला सशक्तिकरण किसी भी समाज एवं राष्ट्र के विकास का मूल आधार बन गया है। महिलाओं की बढ़ती हुई शक्ति व जागरूकता ने आज विश्र्व मंच पर अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की है। भारत की महिलाएं भी अब रूढि़यों को तोड़कर सचेत होने लगी हैं। हालांकि अभी तक भारतीय समाज की सभी वर्गो, संप्रदायों, जातियों और धर्मो की महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जा सका है। यहां की मुस्लिम एवं दलित वर्ग की महिलाएं अभी तक अनेक रूढि़गत कुरीतियों में जकड़ी और अपेक्षाकृत पिछड़ी हुई हैं। यदि हम वैश्वीकरण के इस युग में विकास की ओर तीव्रगति से उन्मुख होना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि सभी भारतीय महिलाओं की समान सहभागिता सुनिश्चित की जाए। जब तक हम ऐसा कर पाने में सफल नहीं हो पाते हैं तब तक हम पूर्ण विकास के लक्ष्य को शायद ही प्राप्त कर पायेंगे। भारत में तो महिलाओं के लिए लगातार अनुकूल हालात बनते जा रहे हैं। इसका लाभ लेने के लिए समाज के हर वर्ग की महिलाओं को आगे आना चाहिए। कोई इस बात को स्वीकार करे या न करे, लेकिन भारतीयों ने वास्तविक महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ी छलांग लगा ली है। महिला सशक्तिकरण का इससे बेहतर और क्या उपाय होगा कि देश की संसद और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो जाए। यह काम एक महिला नेता सोनिया गांधी के हाथों ही होने जा रहा है जो अपने आपमें एक ऐतिहासिक कदम है। इसका कारण यह है कि पुरुष प्रधान समाज में महिला आरक्षण के लिए एक महिला का राजनीतिक साहस जुटाना कोई आसान बात नहीं थी। इसमें कोई शक नहीं है कि इतिहास सोनिया गांधी को महिला सशक्तिकरण के लिए याद करेगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी ने सबसे पहले 1930 के दशक में ही जबकि समाज में आरक्षण को लेकर बहुत विरोध चल रहा था सबसे दबे, कुचले और दलित वर्गो के सशक्तिकरण के लिए आरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार किया था। इसी प्रकार दूसरी पिछड़ी जातियों के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण निर्धारित कर दिया। अब सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण विधेयक के जरिये महिला सशक्तिकरण का बीड़ा उठाया है। आज इस तरह का आरक्षण किए बिना दबे-कुचले वर्गो और महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं किया जा सकता। कम से कम भारतीय राजनीति में तो आरक्षण को ही पिछड़ों के सशक्तिकरण का उपाय मान लिया गया है। आरक्षण न केवल सशक्तिकरण, बल्कि सामाजिक न्याय का भी एक मजबूत हथियार सिद्ध हुआ है। फिर वह चाहे दलित हों या पिछड़े, प्रत्येक आरक्षित वर्ग आरक्षण के बाद अधिक सशक्त हुआ है। यहां मूल विषय यह है कि रूढि़यों की बेड़ी में जकड़ी मुस्लिम महिलाओं को भी आज सशक्त बनाने की दिशा में प्रयास किए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि राजनीतिक-सामाजिक सशक्तिकरण के अलावा धार्मिक सशक्तिकरण भी जरूरी है। इसके लिए बीच में आने वाली हर तरह की मजहबी दीवार को रोकने की जरूरत है। यदि हाल-फिलहाल में मुस्लिम महिलाओं के लिए जारी किए गए कानूनों की चर्चा करें तो यह पता चलेगा कि उन्हें किस दौर से गुजरना पड़ता होगा। कहा गया है कि मुस्लिम महिलाएं जींस नहीं पहनेंगी, मोबाइल फोन पर बात नहीं करेंगी, इंटरनेट नहीं चलाएंगी, नौकरी नहीं करेंगी, सार्वजनिक रूप से कहीं भी नहीं जाएंगी। वह किसी राजनीतिक अथवा सामाजिक मंच से भाषण नहीं दे सकतीं और वह जज जैसे पदों पर बैठने के योग्य नहीं हैं। एक कलाकार के रूप में दुनिया भर में अपनी पहचान स्थापित करने वाली पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक के विरुद्ध यह कहते हुए मुकदमा दर्ज करा दिया जाता है कि उनके आचरण इस्लाम विरोधी हैं। चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन का विरोध इसलिए किया जाता है कि वह बेबाक तरीके से अपनी बातें रखतीं हैं। विभिन्न फतवों व मंचों के उलेमा और शिक्षाविद इस तरह के फरमान जारी करते रहते हैं। यह अलग बात है उनके इन फरमानों में कोई ना कोई सकारात्मक पहलू जरूर होंगे पर जिस बात की चर्चा होती है वह मुस्लिम महिलाओं में नकारात्मक भाव पैदा करते हैं। इस स्थिति में मुस्लिम महिलाएं यह सोच भी नहीं पातीं कि उन्हें स्वावलंबी बनना है तथा देश-समाज के उत्थान में अपनी भूमिका निभानी है। यह हालात न तो मुस्लिम महिलाओं के लिए ठीक हैं और न ही उनके परिवार, राष्ट्र व समाज के लिए। आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिम महिलाओं में अशिक्षा ज्यादा है। छोटी उम्र में लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता और बाद में अशिक्षित रहते हुए उनका बाल-विवाह कर दिया जाता है। समय से पहले मां बनने के बाद जब बच्चा बड़ा होता है तो वह भी शिक्षा के प्रति प्रेरित नहीं हो पाता। इसके पीछे कारण यही है कि उसकी मां अशिक्षित होती है। बहरहाल अब स्थितियां बदल रही हैं। इस स्थिति में आज सभी को जागरूक होने की जरूरत है कि मुस्लिम महिलाएं भी इसी समाज की हिस्सा हैं और उन्हें स्वावलंबी बनाना है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्प्णीकार हैं)
Wednesday, January 19, 2011
पाकिस्तान में ईसाइयों पर फिर टूटा ईशनिंदा कानून का कहर
ईशनिंदा के आरोप में जेल में बंद ईसाई महिला, आसिया बीबी के मुखर समर्थक गवर्नर सलमान तासीर की हत्या की खबर ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि ईशनिंदा के और मामले से खलबची मच गई है। यहां पर दो ईसाई महिलाओं को भीड़ ने सार्वजनिक रूप से पीटा और अपमानित किया। प्रताडि़त महिलाओं का परिवार हत्या के डर से छिप गया है। एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्वी लाहौर में इस विवाद की शुरुआत मंगलवार को एक मुस्लिम महिला और उसकी ईसाई रिश्तेदार के बीच मामूली बात को लेकर हुई थी। उस समय मामला शांत हो गया था। बुधवार को जब पति काम पर चला गया, तो मुस्लिम महिला ने सड़क पर जा कर चिल्लाना शुरू कर दिया कि उसकी ईसाई रिश्तेदार ने पैगंबर मुहम्मद की निंदा की। ईसाई महिला के भाई ने बताया कि इसके तुरंत बाद मुहम्मद समीर के नेतृत्व में लोगों का एक समूह उसकी बहन के घर जा पहुंचा और उसे पीटने लगा। उसने बताया, पड़ोस के अन्य पुरुष और महिलाएं भी घर के पास जमा हो गए और मेरी बहन और मां को पीटने लगे। घर में बस वही लोग थे। समीर के दामाद खादिम हजूर ने कहा कि ईसाई महिलाओं के चेहरे काले कर दिए गए और उन्हें जूतों का हार पहनाया गया। दोनों को गधे पर बैठा कर इलाके में घुमाया गया। दोनों ईसाई महिलाएं लोगों के सामने गिड़गिड़ाती रही कि उन्होंने कोई ईशनिंदा नहीं की। इसके बावजूद भीड़ ने उनकी एक नहीं सुनी और उनसे ईशनिंदा के लिए माफी मांगने पर जोर देती रही। समीर को अपनी पत्नी द्वारा इन महिलाओं की बेरहमी से पिटाई करने पर फक्रहै। उसने कहा, मेरी पत्नी ने उन्हें इतना पीटा कि उसका हाथ सूज गया है। घटना के तुरंत बाद ईसाई महिला के परिवार ने इलाका छोड़ दिया।
Friday, January 14, 2011
बिलावल का ऐलान
कोई भी धर्म या मजहब बुरा नहीं होता। मानने वाले अपनी आस्थाओं, मान्यताओं के आधार पर उसे तब अच्छा या बुरा बना देते हैं जब विचारों के प्रति उनकी सोच उदार या अनुदार हो जाती है। पूरी दुनिया में सभी जातियों-धर्मो के बीच कट्टर लोगों की कमोबेश एक जमात होती है। वह धर्म की आड़ में अपने ‘व्यभिचार’ को ही व्यवहार बताकर उसे वैसा निरूपित करती है। पाकिस्तान में यही हो रहा है। और यह बात पिछले दिनों पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के बाद दुनिया में शिद्दत से महसूस की जा रही है। इस घटना के बाद पाकिस्तानी हुक्मरानों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। लंदन स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में एक शोकसभा में पीपीपी के अध्यक्ष बिलावल ने अपने देश में कट्टरपंथियों के खिलाफ ‘जेहाद’ छेड़ने का संकल्प लिया है। अपनी सत्ता को चुनौती देने वाली ताकतों की हरकतों के खिलाफ उनका यह संकल्प त्वरित, उचित और अपेक्षित है लेकिन क्या इसमें व्यावहारिक संजीदगी भी है! क्योंकि पीपीपी के युवा नेता बिलावल ने अपने संकल्प को अमली जामा पहनाने के तरीके का ऐलान भी नहीं किया है और न ही बताया है कि इसके लिए उनका हरावल दस्ता कौन बनेगा? सवाल यह भी है कि वहां मौजूदा सत्ता में क्या इसके लिए जरूरी कुव्वत है और विलावल की घोषणा के प्रति उसका इरादा फौलादी है? हुक्मरान पार्टी पीपीपी के सीनियर लीडर जरदारी देश के राष्ट्रपति हैं, शासन की बागडोर गिलानी के हाथ में है मगर पीपीपी का रिमोट बिलावल के हाथ में माना जाता है जो अप्रकट कारणों से देश की सियासत में एक्टिव होने का जज्बा अभी खुद में नहीं पैदा कर पाये हैं। लिहाजा उनकी घोषणा तात्कालिक प्रतिक्रिया से ज्यादा महत्व रखती नहीं लगती। पाकिस्तान में मजहब के नाम पर सीधे सत्ता से मोर्चा लिए हुए कट्टरपंथियों का खात्मा हो, यह वहां के ज्यादातर लोग चाहते हैं। वि जनमत इसके पक्ष में है लेकिन पाकिस्तान की असल आका, वहां की फौज और उनके फर्माबरदार ऐसा चाहते हैं क्या? जब तक ये ताकतें नहीं चाहेंगी, न तो मजहबी कट्टरपंथ, न ही इसकी खुराक से फैले आतंकवाद पर काबू किया जा सकता है। पाकिस्तान जानता है कि सलमान की हत्या आतंकवादी कार्रवाई का नतीजा है। दुनिया में आतंकवाद के रूप में फैली मजहबी कट्टरता ने तीन साल पहले बिलावल की मां बेनजीर भुट्टो की जान ले ली थी। बिलावल ने आज माना भी है कि उनकी मां मजहब का गलत रूप पेश करने वालों के विरुद्ध चलाये गये अपने जेहाद के चलते शहीद हुई थीं मगर अब इसका विशिष्ट अर्थ है जो धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद को अलग-अलग खाने में रखकर देखता है जबकि हकीकत यह नहीं है। लादेन से लेकर दुनिया के सभी आतंकवादियों की लड़ाई मजहब के नाम पर ही चल रही है। हालांकि 2007 में बेनजीर की हत्या को योजनाबद्ध तरीके से सियासी रंग में रंगा गया था। पाकिस्तान आज ऐसी कार्रवाइयों को कट्टरपंथी हरकत बता रहा है तो इसलिए कि आतंकवाद उसकी फैलायी विषबेल है। इसी ताने-बाने में वह अफगानिस्तान और भारत को भी लपेटे हुए है। यह संजाल मजहबी कट्टरता का आतंकवाद से सीधा रिश्ता मानकर ही नेस्तनाबूद किया जा सकता है।
पाक में ईशनिंदा के लिए इमाम व बेटे को उम्रकैद
पाकिस्तान की एक अदालत ने एक इमाम और उसके बेटे को विवादास्पद ईशनिंदा कानून का उल्लंघन करने के जुर्म में उम्र कैद की सजा सुनाई है। दोनों पर कुरान की आयत लिखे पोस्टर को हटाने और फाड़ने का आरोप है। पंजाब के डेरा गाजी खान में एक आतंकवाद निरोधी अदालत के न्यायाधीश राव अयूब ने 45 वर्षीय मुहम्मद शफी और उसके 20 वर्षीय बेटे मुहम्मद असलम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया। लाहौर से चार सौ किलोमीटर दूर मुजफ्फरगढ़ में एक मस्जिद के इमाम शफी और उसके बेटे को उनकी किराने की दुकान के बाहर लगे एक धार्मिक जलसे से संबंधित पोस्टर को हटाने को लेकर पिछले साल अप्रैल में गिरफ्तार किया गया था। अधिकारियों के मुताबिक पोस्टर पर कुरान की आयत लिखी थीं। पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन की वर्षगांठ के सिलसिले में आयोजित किए गए इस जलसे के आयोजकों ने शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था दोनों ने पोस्टर को फाड़ा और पैरों तले कुचल दिया। ईशनिंदा का दोषी पाए जाने के बाद जज अयूब ने दोनों को अन्य धर्मो और विश्वासों का अपमान करने के जुर्म में 10 साल की अतिरिक्त कैद की सजा भी सुनाई है। साथ ही 10-10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि इस फैसले को लाहौर उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों को ईशनिंदा का दोषी इसलिए ठहराया गया, क्योंकि उनके देवबंद के साथ मतभेद थे। उल्लेखनीय है ईशनिंदा के आरोप में ईसाई महिला आसिया बीबी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। पंजाब के गवर्नर सलमान तसीर ने इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए इसमें संशोधन की वकालत की थी। इससे नाराज होकर उनके सुरक्षाकर्मी ने पिछले दिनों तसीर की गोली मारकर हत्या कर दी थी।
Monday, January 10, 2011
भारी पड़ेगी यह उदासीनता
साल की शुरुआत में ही मिस्र के अलेक्जेंड्रिया शहर में सेंट्स चर्च के बाहर हुए एक आत्मघाती हमले ने मध्य पूर्व में ईसाइयों पर हो रहे हमलों की शृंखला में एक कड़ी और जोड़ दी। ईसाई और इसलामी चरपंथियों के बीच जारी हमलों का सिलसिला अच्छा संकेत नहीं है।
इन हमलों के बाद ईसाई धर्मगुरु पोप बेनेडिक्ट 16वें और मिस्र के सबसे बड़े मुसलिम धार्मिक नेता इमाम अहमद अल-तैयब की तरफ से जारी बयान दोनों समुदायों की संकीर्णता को धार देने वाले ही लगते हैं। पोप ने मध्य पूर्व में ईसाइयों को लगातार निशाना बनाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए दुनिया भर के नेताओं से ईसाइयों की रक्षा का आह्वान किया। जबकि मिस्र के सर्वोच्च इसलामी शिक्षा केंद्र अल-अजहर के प्रमुख इमाम अहमद अल-तैयब ने पोप की प्रतिक्रिया को न केवल मिस्र के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप बताया, बल्कि राष्ट्रीय समाचार एजेंसी के जरिये सवाल भी पूछा कि जब इराक में मुसलमानों की हत्या होती है, तो वह उनकी सुरक्षा की बात क्यों नहीं करते। जाहिर है, वेटिकन के पास इसका कोई सीधा और सरल जवाब नहीं है। यह सवाल तो अपनी जगह है ही कि पश्चिमी दुनिया ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के नाम पर इराक को सिर्फ ध्वंस और नरसंहार के सिवा क्या दिया? लेकिन उन देशों से वेटिकन सिटी की तरफ से कभी कोई अपील नहीं की गई। हालांकि इससे ईसाइयों पर हुए ताजा हमलों को किसी भी नजरिये से उचित नहीं माना जा सकता।
इसके ब्योरे हैं कि अमेरिका और यूरोप के साथ-साथ मध्यपूर्व तथा अफ्रीका में ईसाई लगातार इसलामी चरमपंथियों का शिकार बन रहे हैं। अलेक्जेंड्रिया के हमले से पहले आतंकवादियों ने मिस्र सहित नाइजीरिया, इराक और पाकिस्तान में चर्चों पर हमले किए। विगत 31 अक्तूबर को बगदाद में प्रसिद्ध ‘अवर लेडी ऑफ साल्वेशन चर्च’ पर हमले में दो पादरियों और सात सुरक्षाकर्मियों समेत 44 ईसाई मारे गए थे। उसकी जिम्मेदारी ‘अल-कायदा इन इराक’ नामक संगठन ने ली थी। उसी समय इस संगठन ने मिस्र के ईसाइयों पर शीघ्र हमले करने की धमकी भी दी थी। अगर इस हमले के पीछे अल कायदा के होने की पुष्टि होती है, तो यह ‘वॉर अनड्यूरिंग फ्रीडम’ पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न होगा, जिसके नाम पर अमेरिका ने बड़े-बड़े ध्वंस किए हैं।
खाड़ी देशों में मिस्र ऐसा देश है, जहां ईसाइयों की आबादी सर्वाधिक है। एलेक्जेंड्रिया की घटना के बाद कॉप्टिक ईसाइयों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू कर दिए, क्योंकि उन्हें लगता है कि प्रशासन पर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं करा रहा। लगातार हो रही इन घटनाओं ने मध्य पूर्व से ईसाई समुदायों को पलायन के लिए विवश कर दिया है। एक अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2003 के बाद से, जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, इराक में रह रहे आधे से ज्यादा ईसाई पलायन कर चुके हैं।
क्या यह सभ्यताओं का संघर्ष है अथवा कुछ और? किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह देखना जरूरी है कि आखिर इसलामी दुनिया में आतंकवाद ने फलना-फूलना उसी समय क्यों शुरू किया, जब वहां पश्चिमी पूंजीवाद ने अपने चतुर कदम रखने शुरू किए। मध्य पूर्व में समय-समय पर जो सैन्य कार्रवाइयां होती रहीं, चाहे वे सीधे अमेरिका के नेतृत्व में हुई हों या फिर उसकी छतरी के नीचे किसी अन्य देश द्वारा, सभी नवसाम्राज्यवाद के लिए शक्ति परीक्षण का जायज उपाय थीं। आतंकवाद इन्हीं जायज उपायों की नाजायज उपज था। अराजक वित्त ने इसका पालन-पोषण किया। पश्चिमी पोषण के दौरान ही जेहादियों ने साम्राज्यवादियों की असलियत भी जान ली। जेहादियों की निष्ठा पूंजीवादी साम्राज्यवादियों के प्रति तभी तक बनी रह सकती थी, जब तक कि उसका यथोचित पोषण पूंजीवादी दुनिया करती रहे।
लेकिन इसके उलट अफगानिस्तान और इराक का ध्वंस किया गया। इसके बाद से पश्चिम और इसलामी समुदायों के बीच गलतफहमियों की खाई चौड़ी होती गई और इसलामी आतंकवाद समाप्त होने के बजाय बहुआयामी होता गया। साम्राज्यवाद के इन वृहत हस्तक्षेपों को इसलामी खतरे के रूप में देखा गया, जो अब तक न तो कमजोर पड़े हैं और न ही इसमें कोई बदलाव हुआ है। पर इस सिलसिले को जारी नहीं रहने दिया जा सकता, क्योंकि यह दो समुदायों के लिए ही नहीं, पूरी मानवता के लिए खतरनाक है।
Subscribe to:
Comments (Atom)