इस्लामाबाद में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तसीर का कत्ल होना यह साबित करता है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथ और आतंकवाद किस हद तक अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है। जिस तरह देश की राजधानी में उनकी दिन दहाड़े हत्या कर दी गई, उससे साफ है कि पाकिस्तानी हुकूमत देश में स्थिरता लाने की काबिलियत खोती जा रही है। दिसंबर, 2007 में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो और बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब अकबर खान बुग्ती की हत्या के बाद यह पाकिस्तान के दूसरे बड़े राजनीतिक व्यक्ति की हत्या है। गवर्नर सलमान तसीर का कत्ल सिर्फ कट्टरपंथ और दहशतगर्दी की एक और घटना नहीं है, बल्कि यह मुल्क में मुश्किलें बढ़ने का संकेत भी है। सत्ताधारी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी पीपीपी के कद्दावर नेता तसीर की मौत के बाद हालात और खराब हो सकते हैं। दरअसल, उन्हें इंसानी हक की बात कहने की सजा मिली यानी वह सच, जिस पर किसी न किसी तरह का पर्दा डालने का काम पाकिस्तान में मौजूद कट्टरपंथी धार्मिक गुट और उससे वास्ता रखने वाली सियासी पार्टियां कर रही हैं। अपनी आजाद ख्याली और उदारवादी सोच के लिए मशहूर सलमान तसीर पाकिस्तान की मौजूदा सियासत में ऐसी शख्सियत थे, जो बेबाकी से अपनी राय रखते थे। कट्टरपंथियों के खिलाफ लगातार मुहिम चलाने की वजह से उन्हें अपनी जान देनी पड़ी। दरअसल, इंसानी जान का दुश्मन बने ईश-निंदा कानून को उन्होंने पिछले दिनों काला कानून करार दिया था। वे इस घिनौने कानून के शिकंजे में फंसी इसाई महिला आसिया बीबी को मौत की सजा से बचाने की कोशिशों में जुटे थे। इसी सिलसिले में पिछले दिनों सलमान ने लाहौर की जेल में बंद आसिया से मुलाकात कर उसे सरकार से माफी दिलाने का आश्वासन दिया था। उनकी इस पहल को मुल्क में सक्रिय तालिबान और कई धार्मिक गुटों ने चेतावनी दी थी कि अगर किसी भी सूरत में आसिया बीबी को माफी दी जाती है तो इसकी कीमत चुकाने के लिए पाकिस्तानी हुकूमत तैयार रहे। हालांकि खुद सलमान को भी इस बाबत धमकियां मिल चुकी थी, जिसका खुलासा उन्होंने अपनी मौत से चंद रोज पहले सोशल नेटवर्किग साइट ट्विटर पर भी किया था। ट्विटर पर सलमान तसीर ने लिखा था, ईश-निंदा कानून की मुखालफत करने की वजह से मुझ पर धमकियों और दबाव बनाने का सिलसिला जारी है। हो सकता है कि इसकी मुझे महंगी कीमत चुकानी पड़े या अपने चाहने वालों के लिए यह मेरी आखिरी पोस्ट साबित हो, लेकिन मैं इंसानियत पर हो रहे जुल्म का विरोध करता रहूंगा। सलमान तसीर की हत्या करने वाला मुमताज कादिर जो उनका अंगरक्षक था, उसने गिरफ्तारी के बाद कहा कि वह अल्लाह पाक की शान में गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं कर सकता। लिहाजा उसने यह कदम उठाया। ताज्जुब की बात है कि देखते ही देखते कादिर पाकिस्तान में मौजूद उन लोगों के लिए हीरो बन गया, जो ईश-निंदा कानून के पैरोकार हैं। कई ने तो उसे गाजी का खिताब भी दिया। यहां यह बात मौजूं है कि आशिया को फांसी की सजा सुनाने वाले जज नवीद इकबाल ने कहा था कि उसकी सजा कम करने की कोई परिस्थितियां मौजूद नहीं हैं। अब जबकि सलमान तासिर का कातिल पुलिस की गिरफ्त में है, क्या उसे सजा मिलेगी या यह कहा जाएगा कि उसने इस्लाम की रक्षा की है? असल में पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता को सींचने और खाद-पानी देने का काम जनरल जिया-उल-हक ने किया, जो मौजूदा समय में पाकिस्तान की खुश ख्याली और मुल्क की एकता को डसने को तैयार है। जिया के समय में संविधान में ऐसा संशोधन किया गया, जिससे शरियत कोर्ट के अधिकारों का दायरा काफी बढ़ गया। 1956 में पाकिस्तान का संविधान बना। उसके बाद सभी सरकारों के लिए यह जरूरी हो गया कि ऐसे कानून बनाए जाएं, जो इस्लाम के अनुकूल हों। वर्ष 1973 में भी संविधान में नए प्रावधान जोड़े गए, जो इस्लामिक सिद्धांत के मद्देनजर लिखे गए। बुनियादी सवाल यह है कि इस्लामी विचारधारा की व्याख्या तथा उसकी नई परिकल्पना करने का अधिकार क्या सिर्फ जजों और इस्लाम के विद्वानों को है। क्या यह हक इस्लाम को मानने वाले सामान्य अनुयायियों के पास नहीं? इस सवाल का जबाव ढूंढ़ना लाजिमी है। अपने निरंकुश शासन को धार्मिक वैधता दिलवाने के लिए जिया ने यह खेल खेला था, जो अब पाकिस्तान की सामाजिक व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने में लगा है, लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस्लाम के अनुयायी ही आज कट्टरपंथियों की गिरफ्त में बंद हैं। हालात इस कदर बन चुके हैं कि आज धर्म निंदा कानून के चलते ये कट्टरपंथी माननीय बनते जा रहे हैं। पाकिस्तानी कट्टरपंथी सरकार को साफ लफ्जों में चेतावनी देते हुए कह रहे हैं कि मौजूदा ईश-निंदा कानून को जस-का-तस रहने देना चाहिए, क्योंकि यह कानून इस्लाम के मुताबिक ही है। लेकिन अकेले में वे अपने डर का भी इजहार करते हैं कि अगर इस कानून में तब्दीली की गई तो वे अपना सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार खो बैठेंगे। 1991 से अब तक ईश-निंदा कानून के दर्जनों मुकदमे अल्पसंख्यक इसाइयों और हिंदुओं के खिलाफ दायर किए गए। इन आंकड़ों से अधिक भयावह है इसका समाज पर पड़ने वाला प्रभाव। पाकिस्तान की पिछली कई सरकारें इस कानून को नहीं बदल सकीं। लिहाजा, यह कानून मजबूत होता गया, जो पाकिस्तान की एकता के लिए सबसे खतरनाक कानून बन गया। पंजाब प्रांत की स्थिति यह है कि उसके हर गांव में कुछ ईसाई परिवार जरूर रहते हैं। तहरीक-ए-तालिबान के कुछ कमांडर जैसे कारी हुसैन और तारिक अफरीदी कट्टर शिया विरोधी हैं, जबकि पाकिस्तान की आजादी में शिया और सुन्नी दोनों मुस्लिम समुदायों ने महत्वपूर्ण रोल अदा किया था। दोनों की मिली-जुली कोशिशों के बाद ही पाकिस्तान की स्थापना हुई थी। शियाओं ने न केवल पाकिस्तान की स्थापना में महत्वपूर्ण रोल अदा किया, बल्कि इसे एक मजबूत देश बनाने में भी हर संभव मदद की। 1988 ऐसा साल था, जिसमें बड़ी संख्या में शियाओं को मारा गया था और उनकी जायदाद तबाह कर दी गई थी। वर्ष 1992 में भी उन पर बड़े जुल्म ढाए गए, लेकिन तत्कालीन सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई। बहरहाल, सलमान तसीर की हत्या उस वक्त हुई है, जब पाकिस्तान गंभीर मुसीबतों से गुजर रहा है। जहां एक तरफ राजनीतिक खींचतान बढ़ रही है, वहीं दूसरी और कट्टरपंथी ताकतें मुल्क को अपने मनमाफिक चलाना चाहती हैं। लिहाजा, सलमान अपनी शहादत देते हुए पाकिस्तानी अवाम के लिए एक सबक छोड़कर गए हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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