Friday, January 14, 2011

बिलावल का ऐलान

कोई भी धर्म या मजहब बुरा नहीं होता। मानने वाले अपनी आस्थाओं, मान्यताओं के आधार पर उसे तब अच्छा या बुरा बना देते हैं जब विचारों के प्रति उनकी सोच उदार या अनुदार हो जाती है। पूरी दुनिया में सभी जातियों-धर्मो के बीच कट्टर लोगों की कमोबेश एक जमात होती है। वह धर्म की आड़ में अपने व्यभिचारको ही व्यवहार बताकर उसे वैसा निरूपित करती है। पाकिस्तान में यही हो रहा है। और यह बात पिछले दिनों पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के बाद दुनिया में शिद्दत से महसूस की जा रही है। इस घटना के बाद पाकिस्तानी हुक्मरानों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। लंदन स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में एक शोकसभा में पीपीपी के अध्यक्ष बिलावल ने अपने देश में कट्टरपंथियों के खिलाफ जेहादछेड़ने का संकल्प लिया है। अपनी सत्ता को चुनौती देने वाली ताकतों की हरकतों के खिलाफ उनका यह संकल्प त्वरित, उचित और अपेक्षित है लेकिन क्या इसमें व्यावहारिक संजीदगी भी है! क्योंकि पीपीपी के युवा नेता बिलावल ने अपने संकल्प को अमली जामा पहनाने के तरीके का ऐलान भी नहीं किया है और न ही बताया है कि इसके लिए उनका हरावल दस्ता कौन बनेगा? सवाल यह भी है कि वहां मौजूदा सत्ता में क्या इसके लिए जरूरी कुव्वत है और विलावल की घोषणा के प्रति उसका इरादा फौलादी है? हुक्मरान पार्टी पीपीपी के सीनियर लीडर जरदारी देश के राष्ट्रपति हैं, शासन की बागडोर गिलानी के हाथ में है मगर पीपीपी का रिमोट बिलावल के हाथ में माना जाता है जो अप्रकट कारणों से देश की सियासत में एक्टिव होने का जज्बा अभी खुद में नहीं पैदा कर पाये हैं। लिहाजा उनकी घोषणा तात्कालिक प्रतिक्रिया से ज्यादा महत्व रखती नहीं लगती। पाकिस्तान में मजहब के नाम पर सीधे सत्ता से मोर्चा लिए हुए कट्टरपंथियों का खात्मा हो, यह वहां के ज्यादातर लोग चाहते हैं। वि जनमत इसके पक्ष में है लेकिन पाकिस्तान की असल आका, वहां की फौज और उनके फर्माबरदार ऐसा चाहते हैं क्या? जब तक ये ताकतें नहीं चाहेंगी, न तो मजहबी कट्टरपंथ, न ही इसकी खुराक से फैले आतंकवाद पर काबू किया जा सकता है। पाकिस्तान जानता है कि सलमान की हत्या आतंकवादी कार्रवाई का नतीजा है। दुनिया में आतंकवाद के रूप में फैली मजहबी कट्टरता ने तीन साल पहले बिलावल की मां बेनजीर भुट्टो की जान ले ली थी। बिलावल ने आज माना भी है कि उनकी मां मजहब का गलत रूप पेश करने वालों के विरुद्ध चलाये गये अपने जेहाद के चलते शहीद हुई थीं मगर अब इसका विशिष्ट अर्थ है जो धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद को अलग-अलग खाने में रखकर देखता है जबकि हकीकत यह नहीं है। लादेन से लेकर दुनिया के सभी आतंकवादियों की लड़ाई मजहब के नाम पर ही चल रही है। हालांकि 2007 में बेनजीर की हत्या को योजनाबद्ध तरीके से सियासी रंग में रंगा गया था। पाकिस्तान आज ऐसी कार्रवाइयों को कट्टरपंथी हरकत बता रहा है तो इसलिए कि आतंकवाद उसकी फैलायी विषबेल है। इसी ताने-बाने में वह अफगानिस्तान और भारत को भी लपेटे हुए है। यह संजाल मजहबी कट्टरता का आतंकवाद से सीधा रिश्ता मानकर ही नेस्तनाबूद किया जा सकता है।

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