Monday, January 10, 2011

भारी पड़ेगी यह उदासीनता

साल की शुरुआत में ही मिस्र के अलेक्जेंड्रिया शहर में सेंट्स चर्च के बाहर हुए एक आत्मघाती हमले ने मध्य पूर्व में ईसाइयों पर हो रहे हमलों की शृंखला में एक कड़ी और जोड़ दी। ईसाई और इसलामी चरपंथियों के बीच जारी हमलों का सिलसिला अच्छा संकेत नहीं है।
इन हमलों के बाद ईसाई धर्मगुरु पोप बेनेडिक्ट 16वें और मिस्र के सबसे बड़े मुसलिम धार्मिक नेता इमाम अहमद अल-तैयब की तरफ से जारी बयान दोनों समुदायों की संकीर्णता को धार देने वाले ही लगते हैं। पोप ने मध्य पूर्व में ईसाइयों को लगातार निशाना बनाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए दुनिया भर के नेताओं से ईसाइयों की रक्षा का आह्वान किया। जबकि मिस्र के सर्वोच्च इसलामी शिक्षा केंद्र अल-अजहर के प्रमुख इमाम अहमद अल-तैयब ने पोप की प्रतिक्रिया को न केवल मिस्र के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप बताया, बल्कि राष्ट्रीय समाचार एजेंसी के जरिये सवाल भी पूछा कि जब इराक में मुसलमानों की हत्या होती है, तो वह उनकी सुरक्षा की बात क्यों नहीं करते। जाहिर है, वेटिकन के पास इसका कोई सीधा और सरल जवाब नहीं है। यह सवाल तो अपनी जगह है ही कि पश्चिमी दुनिया ने ऑपरेशन इराकी फ्रीडमके नाम पर इराक को सिर्फ ध्वंस और नरसंहार के सिवा क्या दिया? लेकिन उन देशों से वेटिकन सिटी की तरफ से कभी कोई अपील नहीं की गई। हालांकि इससे ईसाइयों पर हुए ताजा हमलों को किसी भी नजरिये से उचित नहीं माना जा सकता।
इसके ब्योरे हैं कि अमेरिका और यूरोप के साथ-साथ मध्यपूर्व तथा अफ्रीका में ईसाई लगातार इसलामी चरमपंथियों का शिकार बन रहे हैं। अलेक्जेंड्रिया के हमले से पहले आतंकवादियों ने मिस्र सहित नाइजीरिया, इराक और पाकिस्तान में चर्चों पर हमले किए। विगत 31 अक्तूबर को बगदाद में प्रसिद्ध अवर लेडी ऑफ साल्वेशन चर्चपर हमले में दो पादरियों और सात सुरक्षाकर्मियों समेत 44 ईसाई मारे गए थे। उसकी जिम्मेदारी अल-कायदा इन इराकनामक संगठन ने ली थी। उसी समय इस संगठन ने मिस्र के ईसाइयों पर शीघ्र हमले करने की धमकी भी दी थी। अगर इस हमले के पीछे अल कायदा के होने की पुष्टि होती है, तो यह वॉर अनड्यूरिंग फ्रीडमपर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न होगा, जिसके नाम पर अमेरिका ने बड़े-बड़े ध्वंस किए हैं।
खाड़ी देशों में मिस्र ऐसा देश है, जहां ईसाइयों की आबादी सर्वाधिक है। एलेक्जेंड्रिया की घटना के बाद कॉप्टिक ईसाइयों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू कर दिए, क्योंकि उन्हें लगता है कि प्रशासन पर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं करा रहा। लगातार हो रही इन घटनाओं ने मध्य पूर्व से ईसाई समुदायों को पलायन के लिए विवश कर दिया है। एक अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2003 के बाद से, जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, इराक में रह रहे आधे से ज्यादा ईसाई पलायन कर चुके हैं।
क्या यह सभ्यताओं का संघर्ष है अथवा कुछ और? किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह देखना जरूरी है कि आखिर इसलामी दुनिया में आतंकवाद ने फलना-फूलना उसी समय क्यों शुरू किया, जब वहां पश्चिमी पूंजीवाद ने अपने चतुर कदम रखने शुरू किए। मध्य पूर्व में समय-समय पर जो सैन्य कार्रवाइयां होती रहीं, चाहे वे सीधे अमेरिका के नेतृत्व में हुई हों या फिर उसकी छतरी के नीचे किसी अन्य देश द्वारा, सभी नवसाम्राज्यवाद के लिए शक्ति परीक्षण का जायज उपाय थीं। आतंकवाद इन्हीं जायज उपायों की नाजायज उपज था। अराजक वित्त ने इसका पालन-पोषण किया। पश्चिमी पोषण के दौरान ही जेहादियों ने साम्राज्यवादियों की असलियत भी जान ली। जेहादियों की निष्ठा पूंजीवादी साम्राज्यवादियों के प्रति तभी तक बनी रह सकती थी, जब तक कि उसका यथोचित पोषण पूंजीवादी दुनिया करती रहे।
लेकिन इसके उलट अफगानिस्तान और इराक का ध्वंस किया गया। इसके बाद से पश्चिम और इसलामी समुदायों के बीच गलतफहमियों की खाई चौड़ी होती गई और इसलामी आतंकवाद समाप्त होने के बजाय बहुआयामी होता गया। साम्राज्यवाद के इन वृहत हस्तक्षेपों को इसलामी खतरे के रूप में देखा गया, जो अब तक न तो कमजोर पड़े हैं और न ही इसमें कोई बदलाव हुआ है। पर इस सिलसिले को जारी नहीं रहने दिया जा सकता, क्योंकि यह दो समुदायों के लिए ही नहीं, पूरी मानवता के लिए खतरनाक है।

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