सलमान तासीर की हत्या से पाकिस्तान फिर बेनकाब हुआ है
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर की अपने अंगरक्षक द्वारा की गई हत्या एक बार फिर साबित करती है कि हमारा यह पड़ोसी मुल्क कट्टरपंथी मुसलिम धर्मगुरुओं और उनके पिछलग्गुओं के कब्जे में है। लगातार बरबादी के ढलवां रास्ते पर चलते चले जाने के कारण अब यह संभावना भी खत्म हो गई है कि पाकिस्तान एक ऐसा आधुनिक मुसलिम राष्ट्र बन पाएगा, जहां सभ्य समाज के कायदे-कानून चलते हों। तासीर पाकिस्तान में उस ईशनिंदा कानून के खिलाफ साहस के साथ उठ खड़े हुए थे, जिसे जनरल जियाउल हक ने लागू किया था और जिस कानून का हालिया शिकार एक ईसाई महिला हुई है। सलमान तासीर की हत्या से यह संदेश गया है कि केवल नाममात्र का लोकतंत्र होने से कोई देश भारत जैसा वास्तविक लोकतंत्र नहीं बन सकता। पाकिस्तान जम्हूरियत से बहुत दूर है, क्योंकि सरकार का कामकाज वहां सेना की मंजूरी से होता है, और मुल्क कमोबेश कठमुल्लों के कब्जे में है।
सलमान तासीर ने आतंकवादियों और कठमुल्लों के खिलाफ खड़े होने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। विडंबना देखिए कि पाकिस्तान का कोई राजनेता उनके समर्थन में खड़ा नहीं हुआ, और न ही किसी ने उनके उस अंगरक्षक की भर्त्सना की, जो वहां अब नायक बन चुका है। उल्लेखनीय है कि मध्ययुगीन इसलाम और कट्टर समाज की गिरफ्त में फंसे पाकिस्तान में नायकों की कोई लंबी सूची नहीं है। सलमान तासीर के हत्यारे के लिए, जो 26 साल का धार्मिक कट्टरवादी है, पाक समाज का नायक बन जाना भले ही आसान हो, लेकिन उसके जैसे कट्टर युवा आम तौर पर पश्चिम के लिए और खासकर दुनिया भर के उदारवादियों के लिए सिरदर्द हैं।
दरअसल आज का पाकिस्तान इसलाम से जुड़े मिथ और अज्ञानता की गिरफ्त में फंसा हुआ है। ऐसे में, मजहब वहां के ज्यादातर लोगों के लिए हथियार बन चुका है; एक ऐसा हथियार, जिसके जरिये व्यक्तिगत तौर पर लोगों से निपटा या उन्हें निपटाया जा सकता है। मजहब के बहाने किसी को गालियां दी जा सकती है या गलत आरोप (ईशनिंदा) लगाया जा सकता है, जैसा कि एक ईसाई महिला आसिया बीवी के साथ हुआ, जो ईशनिंदा के कथित आरोप में सजा-ए-मौत का इंतजार कर रही हैं, और जिन्हें बचाने के क्रम में ही पंजाब प्रांत के साहसी गवर्नर सलमान तासीर की नृशंस हत्या हुई। क्या विडंबना है कि इस तरह के तमाम गर्हित काम वहां अल्लाह को खुश करने के नाम पर किए जाते हैं।
जहां तक सबसे ताकतवर सेना की बात है, तो उसने राजनेताओं द्वारा पतन के रास्ते पर ठेल दिए गए पाकिस्तान को धार्मिक कट्टरवाद से बाहर निकालने की अभी तक कोई कोशिश नहीं की है। इस मामले में चुने हुए राजनेताओं का नजरिया भी निंदनीय ही रहा है। ईशनिंदा कानून हालांकि सैनिक तानाशाह जियाउल हक ने लागू किया था, लेकिन प्रधानमंत्री रहते हुए नवाज शरीफ ने इस कानून को मजबूती देने का ही काम किया था। शेरी रहमान वह एकमात्र सांसद हैं, जिन्होंने धार्मिक कठमुल्लों से सीधी लड़ाई मोल लेते हुए संसद में इस कानून के खिलाफ आवाज उठाई थी। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सदस्य और मरहूम बेनजीर भुट्टो की नजदीकी दोस्त शेरी रहमान की पाकिस्तान से बाहर भी एक भद्र महिला और प्रभावी वक्ता के रूप में पहचान है। वह लंबे समय से इस विवादास्पद कानून के संशोधन के पक्ष में हैं, जिसने कई जानें ली हैं। लेकिन दुर्भाग्य से न तो संसद में कोई उनके समर्थन में है, न फौज में और न ही मीडिया में।
हालांकि इसलामी समाज में ईशनिंदा कानून नया नहीं है, सऊदी अरब जैसे मुल्कों में भी इसका अस्तित्व है, लेकिन सुरक्षा बलों के बीच इस कट्टर कानून का ऐसा अंधा समर्थन देखते हुए पाकिस्तान के भविष्य के बारे में वाकई बहुत चिंता होती है। तीसरी दुनिया के कुछ अन्य देशों की तरह वहां भी राजनीतिक हत्या का लंबा इतिहास है। जिस देश में अभी तक जियाउल हक और बेनजीर भुट्टो के हत्यारों की ही शिनाख्त नहीं हो पाई है, वहां सलमान तासीर की हत्या के असली रणनीतिकार पहचाने जाएंगे और सजा पाएंगे, यह कल्पना करना कुछ ज्यादा ही उम्मीद पालना है। यह इसलिए भी कठिन है, क्योंकि किसी न किसी तरह सत्ता पर काबिज होने को आतुर वहां के राजनेता कट्टरता और आतंकवाद के प्रति उदासीन हैं। उनकी इस उदासीनता का खामियाजा पाकिस्तान भुगत रहा है, जहां कट्टर इसलाम दिनोंदिन मजबूत होता जा रहा है। इसी का नतीजा है कि वहां का समाज एक के बाद एक खतरा झेल रहा है। यह इसलिए भी हो रहा है, क्योंकि वहां का राजनीतिक नेतृत्व आगे बढ़कर इस चुनौती से निपटने के लिए तैयार नहीं है, जिस कारण वहां के आम नागरिक और उदारवादी हताश हैं।
यह सिर्फ समय की बात है कि हमारे पड़ोस में इस खूनी धर्मांधता का अगला बड़ा शिकार कौन होता है। यह कम खौफनाक नहीं कि वहां के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उन कठमुल्लों के समर्थन में है, जो हत्या और तोड़फोड़ जारी रखते हुए पाकिस्तान को आने वाले दिनों में और खतरनाक मुल्क बना देने का इरादा रखते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई उन कठमुल्लों के खिलाफ जाने का साहस रखता है। अगर अब भी इसलामाबाद ने हस्तक्षेप की कोशिश नहीं की, तो अपने पड़ोस की इस धर्मांधता पर भारत को चिंतित होना ही पड़ेगा, क्योंकि इससे सिर्फ हिंसा ही नहीं फैलेगा, बल्कि पड़ोस से आतंकवादियों के साथ-साथ शरणार्थियों के आने की आशंका भी एकाएक बढ़ जाएगी।
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